शोध केवल उपाधि नहीं, समाज परिवर्तन का माध्यम बने — कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल
अजमेर, 19 मार्च(हि.स.)। महर्षि दयानंद सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर में आयोजित 15 दिवसीय पीएच.डी. कोर्स वर्क के समापन अवसर पर कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने शोधार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि शोध केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका उद्देश्य समाज और राष्ट्र के विकास में ठोस योगदान देना होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज देश में शोध कार्यों की संख्या तो अधिक है, लेकिन उनका वास्तविक प्रभाव नगण्य दिखाई देता है। ऐसे में आवश्यक है कि प्रत्येक शोधार्थी अपने शोध को समाज की आवश्यकताओं से जोड़े और ऐसा कार्य करे, जो दीर्घकालीन उपयोगिता रखता हो।
कुलगुरु ने शोध के मूलभूत स्वरूप को स्पष्ट करते हुए ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेस के बीच अंतर बताया। उन्होंने कहा कि सोशल साइंसेस में जहां ‘हाइपोथेसिस’ आधारित शोध होता है, वहीं ह्यूमैनिटीज में ‘रिसर्च क्वेश्चंस’ प्रमुख होते हैं, और यही दोनों के बीच का आधारभूत अंतर है।
उन्होंने इस कोर्स वर्क की विशिष्टताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि विश्वविद्यालय में पहली बार सोशल साइंसेस, ह्यूमैनिटीज, साइंस, मैनेजमेंट और फिजिकल एजुकेशन को अलग-अलग समूहों में व्यवस्थित रूप से प्रशिक्षण दिया गया, जिससे शोध की गुणवत्ता में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है।
प्रो. अग्रवाल ने शोधार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि जब तक शोध अपनी संस्कृति और जड़ों से नहीं जुड़ता, तब तक वह मौलिक और सार्थक नहीं हो सकता। उन्होंने ऋषि परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय विद्वानों ने समाजोपयोगी शोध किए, जो आज भी प्रासंगिक हैं।
उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे ऐसा विषय चुनें, जो समाज के लिए उपयोगी हो और जिसके परिणामस्वरूप कोई ठोस उत्पाद, नीति, शिक्षण पद्धति या समाधान विकसित हो सके।
कार्यक्रम में शोधार्थियों की अनुशासनप्रियता की सराहना करते हुए कुलगुरु ने कहा कि इतने बड़े समूह में भी अनुशासन बनाए रखना सराहनीय है और यह उनके उज्ज्वल भविष्य का संकेत है।
निदेशक शोध प्रो. सुब्रतो दत्ता ने अपने उद्बोधन में कहा कि इस 15 दिवसीय प्रशिक्षण ने शोधार्थियों को केवल प्रक्रिया ही नहीं सिखाई, बल्कि शोध के वास्तविक उद्देश्य और सामाजिक योगदान की भावना भी विकसित की है।
अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. सुभाष चन्द्र ने जानकारी दी कि लगभग 200 शोधार्थियों ने इस कोर्स वर्क में भाग लिया, सभी ने 75 प्रतिशत से अधिक उपस्थिति दर्ज कराई तथा सफलतापूर्वक अपने असाइनमेंट, परीक्षण और प्रस्तुतियाँ पूर्ण कीं।
कार्यक्रम के अंत में शोधार्थियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि इस कोर्स वर्क ने उन्हें न केवल शोध की तकनीकी जानकारी दी, बल्कि जीवन में निरंतर सीखने और परिवर्तनों को स्वीकार करने की प्रेरणा भी प्रदान की।
समापन समारोह में सभी प्रतिभागियों को उज्ज्वल भविष्य की शुभकामनाएँ दी गईं तथा यह विश्वास व्यक्त किया गया कि विश्वविद्यालय के शोधार्थी भविष्य में ऐसे उत्कृष्ट शोध प्रस्तुत करेंगे, जिन पर विश्वविद्यालय को गर्व होगा।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संतोष

