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राज्य के पांच कृषि विश्वविद्यालयों में बनेंगे एक जैसे नियम, दुर्गापुरा में मंथन

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राज्य के पांच कृषि विश्वविद्यालयों में बनेंगे एक जैसे नियम, दुर्गापुरा में मंथन


जयपुर, 04 अगस्त (हि.स.)।

श्री कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय (एसकेएनएयू), जोबनेर की अधीनस्थ इकाई राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (आरएआरआई), दुर्गापुरा में राज्य के पांचों कृषि विश्वविद्यालयों के कुलगुरुओं की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता एसकेएनएयू, जोबनेर के कुलगुरु प्रोफेसर डॉ पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने की। बैठक में राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों की प्रशासनिक, शैक्षणिक एवं वित्तीय व्यवस्थाओं में एकरूपता स्थापित करने तथा समान नियमावली तैयार करने पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया।

बैठक में राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर के कुलगुरु प्रोफेसर डॉ आर. बी. दुबे, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलगुरु प्रोफेसर डॉ प्रताप सिंह, कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर के कुलगुरु प्रोफेसर डॉ वी. एस. जेतावत तथा कृषि विश्वविद्यालय, कोटा की कुलगुरु प्रोफेसर डॉ विमला डुकवाल ने भाग लिया। इस अवसर पर राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे।

बैठक में सेवा नियमों, भर्ती एवं पदोन्नति प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली, शैक्षणिक कैलेंडर, अनुसंधान गतिविधियों, वित्तीय प्रबंधन तथा विद्यार्थियों से संबंधित विभिन्न व्यवस्थाओं में समानता लाने पर सहमति बनी। कुलगुरुओं ने कहा कि वर्तमान में विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों में अलग-अलग प्रक्रियाएं लागू होने से प्रशासनिक एवं शैक्षणिक स्तर पर अनेक व्यावहारिक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं। एक समान नियमावली से इन जटिलताओं का प्रभावी समाधान संभव होगा।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रोफेसर डॉ डॉ.पुष्पेन्द्र सिंह चौहान ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय शिक्षा, अनुसंधान एवं कृषि प्रसार के प्रमुख केंद्र हैं। यदि सभी विश्वविद्यालयों में समान नियम एवं प्रक्रियाएं लागू होती हैं तो प्रशासनिक पारदर्शिता, जवाबदेही और कार्यकुशलता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इससे शिक्षकों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को समान अवसर प्राप्त होंगे तथा कृषि शिक्षा की गुणवत्ता भी और सुदृढ़ होगी।

बैठक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी-2020) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की नीतियों के अनुरूप विश्वविद्यालयों की कार्यप्रणाली को आधुनिक, नवाचार आधारित एवं परिणामोन्मुख बनाने पर भी बल दिया गया। कुलगुरुओं ने जलवायु परिवर्तन, जल संकट, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण तथा कृषि में आधुनिक तकनीकों के बढ़ते महत्व को ध्यान में रखते हुए पाठ्यक्रमों एवं अनुसंधान कार्यक्रमों को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता व्यक्त की।

प्रोफेसर डॉ आर. बी. दुबे ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालयों की वास्तविक शक्ति उनके वैज्ञानिक अनुसंधान तथा क्षेत्रीय कृषि समस्याओं के समाधान में निहित है। विश्वविद्यालयों के बीच संसाधनों, विशेषज्ञता एवं अनुभवों का साझा उपयोग किसानों के हित में महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। उन्होंने सहयोगात्मक अनुसंधान परियोजनाओं को बढ़ावा देने का सुझाव दिया।

प्रोफेसर डॉ प्रताप सिंह ने कृषि शिक्षा को अधिक व्यावहारिक एवं रोजगारोन्मुख बनाने पर बल देते हुए कहा कि विद्यार्थियों को डिजिटल कृषि, जैविक खेती, कृषि प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं छात्र विनिमय कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करने का सुझाव दिया।

प्रोफेसर डॉ वी. एस. जेतावत ने पश्चिमी राजस्थान की शुष्क एवं अर्ध-शुष्क परिस्थितियों के अनुरूप सूखा सहनशील फसल किस्मों, जल संरक्षण तकनीकों तथा संरक्षित खेती पर संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। वहीं प्रोफेसर डॉ विमला डुकवाल ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण को समय की मांग बताते हुए कहा कि इससे पारदर्शिता और दक्षता दोनों में वृद्धि होगी।

बैठक में परीक्षा प्रणाली एवं शैक्षणिक कैलेंडर में एकरूपता लाने पर विशेष चर्चा हुई। स्नातक, स्नातकोत्तर एवं पीएच.डी. कार्यक्रमों के लिए न्यूनतम समान शैक्षणिक मानक निर्धारित करने का प्रस्ताव रखा गया, ताकि राज्य के सभी कृषि विश्वविद्यालयों में डिग्रियों की गुणवत्ता एवं विश्वसनीयता सुनिश्चित की जा सके।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश