विजेंद्र गुप्ता ने संस्कृत महाकाव्य मंगल महर्षि चरितम् का किया विमोचन
नई दिल्ली, 10 जुलाई (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने शुक्रवार को विधानसभा परिसर में संस्कृत महाकाव्य मंगल महर्षि चरितम् का विमोचन किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं है, बल्कि यह भारत की सभ्यतागत चेतना और सांस्कृतिक पहचान की जीवंत आधारशिला है। संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन का प्रत्येक प्रयास हमारे राष्ट्र के भविष्य में किया गया एक निवेश है।
इस अवसर पर संस्कृत के विद्वान, विशिष्ट अतिथि, दिल्ली विधानसभा के अधिकारी तथा साहित्य जगत से जुड़े अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। इस महाकाव्य का संपादन संस्कृत एवं हिंदी के प्रख्यात विद्वान परशुराम शर्मा ने किया है।
सभा को संबोधित करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने संस्कृत की शाश्वत प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संस्कृत विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक एवं सुव्यवस्थित भाषाओं में से एक है। उन्होंने कहा कि संस्कृत की तार्किक व्याकरणिक संरचना आधुनिक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं से उल्लेखनीय समानता रखती है, जिससे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और प्रौद्योगिकी के वर्तमान युग में इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है।
भारत की समृद्ध भाषाई परंपरा का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि मलयालम सहित अनेक भारतीय भाषाएं संस्कृत से व्यापक रूप से प्रभावित रही हैं, जो भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा पर संस्कृत के गहरे प्रभाव को दर्शाता है। उन्होंने संस्कृत के अध्ययन एवं व्यापक उपयोग को प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि यह भाषा आज भी बौद्धिक चिंतन को प्रेरित करती है, भारतीय भाषाओं को समृद्ध बनाती है तथा राष्ट्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विजेंद्र गुप्ता ने संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन भाषा तथा मानव ज्ञान की सबसे समृद्ध धरोहरों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि वेद, उपनिषद, पुराण, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, ज्योतिष तथा अन्य शास्त्रीय ग्रंथों ने भारत की बौद्धिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं को आकार दिया, जिसके कारण भारत को विश्वगुरु के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। उन्होंने कहा कि विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के लंबे कालखंड के बावजूद भारत के ऋषियों, मनीषियों एवं विद्वानों ने अपने समर्पण और अथक प्रयासों से देश की कालजयी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखा।
विधानसभा अध्यक्ष ने कहा कि केंद्र सरकार तथा विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा देश और विदेश में संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार हेतु अनेक महत्वपूर्ण पहल की गई हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सामूहिक प्रयासों से भारत पुनः ज्ञान एवं संस्कृति के वैश्विक केंद्र के रूप में अपना गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त करेगा।
मंगल महर्षि चरितम् का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने इसे उच्च कोटि का साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक महाकाव्य बताया, जो संस्कृत साहित्य के संवर्धन तथा सनातन मूल्यों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
विधानसभा अध्यक्ष ने महाकाव्य के संपादक परशुराम शर्मा की सराहना करते हुए उन्हें संस्कृत एवं हिंदी के प्रतिष्ठित विद्वान तथा महाकाव्य के नायक महर्षि मंगदत्त के परिवार के वरिष्ठतम सदस्य के रूप में उल्लेखित किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2007 में दिल्ली संस्कृत अकादमी ने संस्कृत के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया था। उन्होंने बताया कि शर्मा ने भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों में कार्य करते हुए देश एवं विदेश में राजभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा वर्ष 1985 में निदेशक (राजभाषा) के पद से सेवानिवृत्त होने के पश्चात भी वे निरंतर सनातन संस्कृति तथा संस्कृत एवं हिंदी भाषा की सेवा में समर्पित हैं।
महाकाव्य का विमोचन करते हुए विधानसभा अध्यक्ष ने आशा व्यक्त की कि मंगल महर्षि चरितम् भावी पीढ़ियों को संस्कृत, भारत की शास्त्रीय ज्ञान परंपरा तथा सनातन संस्कृति के शाश्वत मूल्यों को समझने और आत्मसात करने के लिए प्रेरित करेगा। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की विद्वतापूर्ण कृतियां राष्ट्र की सभ्यतागत स्मृति को संरक्षित रखने तथा भारत की सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ बनाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

