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'त्रिकाल संध्या’ आपातकाल के विरुद्ध साहित्यिक प्रतिरोध का ऐतिहासिक दस्तावेज : शकुंतला मित्तल

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'त्रिकाल संध्या’ आपातकाल के विरुद्ध साहित्यिक प्रतिरोध का ऐतिहासिक दस्तावेज : शकुंतला मित्तल


नई दिल्ली, 27 जून (हि.स.)। भवानी प्रसाद मिश्र की कृति ‘त्रिकाल संध्या (आपातकाल की कविताएं)’ केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि आपातकाल की क्रूरता के विरुद्ध साहित्यिक प्रतिरोध का ऐतिहासिक दस्तावेज है। कवि ने इन कविताओं के माध्यम से न केवल तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रहार किया, बल्कि अंधकार के बीच उम्मीद और लोकतांत्रिक मूल्यों की लौ भी प्रज्वलित रखी।

यह विचार सुप्रसिद्ध साहित्यकार शकुंतला मित्तल ने शनिवार को इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती (अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से संबद्ध) द्वारा प्रवासी भवन, नई दिल्ली में आयोजित ‘त्रिकाल संध्या (आपातकाल की कविताएं)’ पुस्तक चर्चा कार्यक्रम में व्यक्त किए।

शकुंतला मित्तल ने कहा कि इस पुस्तक में भवानी प्रसाद मिश्र ने वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों को लेकर अपनी पीड़ा, आक्रोश, वेदना और प्रतिरोध को अत्यंत सहज, किंतु धारदार भाषा में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि कवि केवल शिकायत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपनी कविताओं को ही संघर्ष और प्रतिरोध का सक्रिय माध्यम बना देते हैं।

वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा ने कहा कि आपातकाल के दौरान जब देश में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई, लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाए गए, उस समय भवानी प्रसाद मिश्र नियमित रूप से दिन में तीन बार—सुबह, दोपहर और शाम—कविताएं लिख रहे थे। यही कारण है कि इस काव्य-संग्रह का नाम ‘त्रिकाल संध्या’ रखा गया। उन्होंने कहा कि यह कवि के क्रांतिकारी चिंतन का प्रमाण है, जिसने समाज को गहराई से प्रभावित किया।

साहित्यकार डॉ. नवीन नीरज ने कहा कि आपातकाल के दौर में अनेक कवि सत्ता के भय से मौन हो गए थे, जबकि भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी लेखनी के माध्यम से निर्भीक प्रतिरोध दर्ज कराया। युवा लेखिका गुंजन शर्मा ने कहा कि जटिल और दमनकारी परिस्थितियों के बावजूद भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी सहज, सरल और बोलचाल की भाषा को बनाए रखा, जिससे उनकी कविताएं आम जनमानस तक प्रभावी ढंग से पहुंचीं।

युवा पत्रकार विवेक वशिष्ठ ने कहा कि ‘त्रिकाल संध्या’ स्वतंत्रता, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में लिखा गया एक ऐतिहासिक काव्य-प्रतिरोध है, जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।

कार्यक्रम का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक मोनिका जायसवाल ने किया। इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के प्रांत टोली सदस्य मुन्ना रजक, शिवम पांडेय, वैभव कृष्ण तिवारी और विकास आनंद सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी