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भाषा व्याकरण से नहीं, बल्कि उसे बोलने वाले समाज के सामर्थ्य और शक्ति से महान बनती हैः प्रो. योगेश सिंह

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भाषा व्याकरण से नहीं, बल्कि उसे बोलने वाले समाज के सामर्थ्य और शक्ति से महान बनती हैः प्रो. योगेश सिंह


नई दिल्ली, 08 सितंबर (हि.स.)। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के हिंदी विभाग ने मंगलवार को कला संकाय स्थित वंदे मातरम् सभागार में “विकसित भारत: हिंदी भाषा और साहित्य” विषय पर एक दिवसीय परिचर्चा का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह मुख्य अतिथि के रुप में उपस्थित रहे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि भाषा की शक्ति उसके बोलने वालों की शक्ति होती है। उन्होंने कहा कि केवल व्याकरण किसी भाषा को शक्तिशाली नहीं बनाता।

कुलपति ने हिंदी को सहज, सरल और सभी भाषाओं के शब्दों को स्वीकार करने वाली भाषा बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश की उन्नति हिंदी की उन्नति से जुड़ी है। प्रो. योगेश सिंह ने अपील की कि हमें 22वीं सदी को ध्यान में रखकर लिखना चाहिए।

इस अवसर पर विशिष्ट अतिथियों के रूप में प्रो. बलराम पाणि, प्रो. रजनी अब्बी एवं विभागाध्यक्ष प्रो. सुधा सिंह के साथ सुप्रसिद्ध साहित्यकार ममता कालिया, डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र आदि उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के आरंभ में विभागाध्यक्ष प्रो. सुधा सिंह ने विषय-परिचय प्रस्तुत करते हुए हिंदी भाषा के भविष्य, तकनीक और भाषा के संबंध तथा शास्त्रीय भाषा के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भाषा बचेगी तो समाज और सभ्यता भी बचेगी तथा भाषा का जनता से जुड़ना जनचेतना के विकास के लिए आवश्यक है।

इस अवसर पर साहित्यकार ममता कालिया ने साहित्य और कहानी के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जैसे हम बड़े होते जाते हैं, उपन्यास बनते चले जाते हैं। उन्होंने तलवार से अधिक कलम की शक्ति पर जोर देते हुए कहानी को दिमाग को जगाने वाला माध्यम बताया।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने भाषा को “बहता नीर” बताते हुए कहा कि भाषा को रोका नहीं जा सकता। उन्होंने भाषा और संस्कृति के गहरे संबंध तथा अनुवाद के महत्व पर प्रकाश डाला और अपनी कविताओं के माध्यम से भी विचार प्रस्तुत किए।

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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी