सोमनाथ पुस्तक भारतीय आत्मसम्मान, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक पुनर्जागरण की प्रतीकः साहित्यकार
नई दिल्ली, 27 अप्रैल (हि.स.)। अखिल भारतीय साहित्य परिषद् ने सोमवार को प्रवासी भवन में जय सोमनाथ पुस्तक पर एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम में विभिन्न साहित्यकारों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए इस कृति को भारतीय आत्मसम्मान, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक पुनर्जागरण की प्रतीक बताया।
वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र अरोड़ा ने कहा कि यह पुस्तक हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और आत्मसम्मान तथा विजय के अटूट भाव की गाथा प्रस्तुत करती है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस कृति को जन-जन तक पहुंचना चाहिए और समाज को अपने वास्तविक शत्रुओं की पहचान करनी चाहिए।
साहित्यकार कुमार सुबोध ने इसे महमूद गजनवी के आक्रमण के समय सोमनाथ मंदिर के विनाश और उसके पुनर्निर्माण की महागाथा बताया। वहीं सारिका कालरा ने कहा कि उपन्यास में चौलादेवी और भीमदेव जैसे पात्रों के माध्यम से प्रेम, त्याग और राष्ट्रभक्ति का प्रभावशाली चित्रण किया गया है।
लेखिका प्रिया वरुण कुमार ने कहा कि लेखक कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने 1026 में हुए आक्रमण का जीवंत चित्रण करते हुए इतिहास और कल्पना का अनूठा समन्वय प्रस्तुत किया है। पत्रकार राजीव कुमार ने इस कृति को भारतीय सांस्कृतिक अस्मिता के पुनरुत्थान का प्रतीक बताया।
गोष्ठी का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी अंकित दूबे ने किया। उन्होंने कहा कि यह ऐतिहासिक उपन्यास भारतीय सभ्यता की निरंतरता और जीवंतता को दर्शाता है। वर्ष 2026 को सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी का आक्रमण के 1000 वर्ष पूर्ण होने के रूप में देखा जा रहा है, जिसे भारत सरकार ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के रूप में मना रही है।
इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा सहित कई साहित्यकार और बुद्धिजीवी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भारतीय संस्कृति की जिजीविषा और निरंतरता पर विशेष जोर दिया गया।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

