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(अपडेट) 'पुलिस की नहीं, हमारे परिवार की पीड़ा भी सुनी जाए', संसद मार्च में घायल जवानों के परिजनों का दर्द छलका

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नई दिल्ली, 31 जुलाई (हि.स.)। जंतर-मंतर से 20 जुलाई को निकले 'संसद चलो' मार्च के दौरान हुई हिंसा में घायल पुलिसकर्मियों के परिजन पहली बार खुलकर सामने आए। शुक्रवार को कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि अब तक पूरे घटनाक्रम में पुलिस पर लगाए गए आरोपों और प्रदर्शनकारियों की चोटों की चर्चा हुई, लेकिन ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के दर्द पर किसी ने बात नहीं की।

प्रेस वार्ता में एसीपी की पत्नी उपनीत कौर, एएसआई की पत्नी सीमा, दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा कुंजल और घायल एसीपी के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने अपने अनुभव साझा किए। इस दौरान एक वीडियो प्रस्तुति भी दिखाई गई, जिसमें दावा किया गया कि हिंसा में 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। परिजनों के अनुसार, 110 से ज्यादा बैरिकेड, 300 बॉडी प्रोटेक्टर, 350 हेलमेट, 20 लाउडहेलर, 10 हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर, एक एक्स-रे बैगेज स्कैनर तथा 25 से अधिक सरकारी वाहन और अन्य संपत्तियां क्षतिग्रस्त हुईं।

एसीपी की पत्नी उपनीत कौर ने बताया कि उनके पति संसद की सुरक्षा में तैनात थे। देर रात जब वह घायल अवस्था में घर लौटे तो पूरा परिवार दहशत में आ गया। उन्होंने कहा कि पुलिस लगातार भीड़ से शांति बनाए रखने की अपील कर रही थी, लेकिन इसके बावजूद पुलिसकर्मियों पर पत्थर, बोतलें, चप्पल और अन्य सामान फेंके गए। उनके पति का सुरक्षा हेलमेट पूरी तरह टूट गया। उपनीत ने कहा, हर वर्दी के पीछे सिर्फ एक पुलिस अधिकारी नहीं, बल्कि उसका पूरा परिवार होता है। अगर हेलमेट के बाद एक और पत्थर लगता तो शायद मेरे पति आज जिंदा नहीं होते।

एएसआई की पत्नी सीमा ने बताया कि उनके पति 33 वर्ष पहले कांस्टेबल के रूप में दिल्ली पुलिस में भर्ती हुए थे। 20 जुलाई को उन्होंने फोन कर बताया था कि जंतर-मंतर पर भीड़ बढ़ रही है और संसद मार्च की तैयारी है। कुछ देर बाद सूचना मिली कि उन्हें घायल अवस्था में एलएनजेपी अस्पताल ले जाया गया है। सीमा ने कहा कि उनके पति ने बताया था कि भीड़ में शामिल कुछ लोगों ने पत्थरों, गमलों, चप्पलों और जूतों से हमला किया। रात 11 बजे जब वह घर लौटे तो उनका हेलमेट टूटा हुआ था। उन्होंने कहा, अगर हेलमेट के बाद एक और पत्थर सिर पर लगता तो जान भी जा सकती थी। संसद में घायल पुलिसकर्मियों की चर्चा भी होनी चाहिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा कुंजल ने बताया कि उनके पिता दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर हैं और 15 वर्ष तक भारतीय नौसेना में मरीन कमांडो रह चुके हैं। उनका दावा है कि हिंसा के दौरान भीड़ ने उनके पिता के साथ मारपीट की, जिसके बाद उन्हें आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने सोशल मीडिया देखा तो उनके पिता को ही अपराधी की तरह पेश किया जा रहा था। अगर दूसरे पक्ष को सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार है तो हमें भी न्याय मांगने का अधिकार है। इसलिए हम भी सुप्रीम कोर्ट गए हैं।

घायल एसीपी के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने बताया कि अस्पताल में सिर पर टांके लगे पिता को देखकर वह सहम गए थे। उनके अनुसार, पिता ने बताया कि प्रदर्शन में आए सभी लोग हिंसक नहीं थे, लेकिन कुछ उपद्रवियों ने अचानक हमला कर दिया। लक्ष्य ने कहा, हर जगह पुलिस को ही अपराधी बताया जा रहा है। हम सिर्फ चाहते हैं कि देश दोनों पक्षों को सुने और घायल पुलिसकर्मियों की पीड़ा पर भी चर्चा हो।

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हिन्दुस्थान समाचार / कुमार अश्वनी