‘साहित्य परिक्रमा’ के संवाद कार्यक्रम में साहित्य, समाज और मीडिया के बदलते सरोकारों पर हुई चर्चा
नई दिल्ली, 26 मई (हि.स.)। हिंदी पत्रकारिता के द्वि शताब्दी वर्ष के अवसर पर मंगलवार को द्वारका स्थित साहित्य परिक्रमा कार्यालय में आयोजित “साहित्यिक पत्र-पत्रिका संवाद” कार्यक्रम में साहित्य, पत्रकारिता और समाज के गहरे रिश्तों पर गंभीर विमर्श हुआ।
वरिष्ठ साहित्यकारों, शिक्षाविदों और युवा साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति में साहित्यिक पत्रकारिता की परंपरा, उसकी सामाजिक भूमिका और डिजिटल दौर की चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार एवं राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होना भारतीय भाषाई चेतना और सांस्कृतिक विरासत के लिए गौरव का विषय है।
उन्होंने कहा कि हिंदी पत्रकारिता ने केवल समाचारों का प्रसार नहीं किया, बल्कि समाज, साहित्य और राष्ट्रीय चेतना को भी दिशा देने का कार्य किया। साहित्यिक पत्रकारिता ने पत्रकारिता को संवेदनशील और विचारप्रधान स्वर प्रदान किया तथा ‘रिपोर्ताज’ जैसी विधाओं को जन्म दिया।
उन्होंने हिंदी पत्रकारिता के जनक-पंडित जुगल किशोर शुक्ल, भारतेन्दु हरिश्चंद्र और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिंदी साहित्य को नई पहचान दी और अनेक साहित्यकारों को मंच प्रदान किया।
उन्होंने कहा कि ‘समालोचक’, ‘दिनमान’, ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं ने पाठकीय चेतना को मजबूत करने के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्शों को भी व्यापक स्वर दिया।
डॉ. तत्पुरुष ने कहा कि आज साहित्य परिक्रमा जैसी पत्रिका साहित्य जगत में अपना विशेष स्थान बना चुकी है। साहित्य अमृत, अक्षरा, साक्षात्कार और साहित्य परिक्रमा जैसी पत्रिकाएं आज भी राष्ट्रीय सांस्कृतिक दायित्व का निर्वाह करते हुए साहित्य और समाज को जोड़ने का कार्य कर रही हैं।
कार्यक्रम में इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के अध्यक्ष डॉ. विनोद बब्बर ने कहा कि साहित्य समाज को सही दिशा देने का कार्य करता है और हिंदी पत्रकारिता समाज तथा साहित्य के बीच सेतु की भूमिका निभाती रही है। उन्होंने कहा कि साहित्यिक पत्रिकाओं ने नए लेखकों और विचारकों को मंच दिया है। उन्होंने कहा, “पत्रिकाएं पढ़ी जानी चाहिए, पड़ी नहीं रहनी चाहिए।”
प्रो. नीलम राठी ने कहा कि ‘उदंत मार्तंड’ के 200 वर्ष हिंदी पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में पत्रकारिता एक मिशन थी, जिसमें साहित्यकार, पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी समाज और राष्ट्र की आवाज बनकर उभरे। उन्होंने वर्तमान समय में सार्थक और गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम में डिजिटल युग में साहित्यिक पत्रकारिता की प्रासंगिकता पर भी चर्चा हुई।
इस अवसर पर डॉ. विनिता कुमारी, मीना दहिया, हरिप्रकाश पांडेय, मनीष, सौम्य पांडेय और निशु कुमारी सहित अनेक साहित्यप्रेमी और युवा मौजूद रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / माधवी त्रिपाठी

