विधायी प्रक्रियाओं में एकरूपता अब संस्थागत आवश्यकता बन चुकी है : विजेंद्र गुप्ता
मैसूर/नई दिल्ली, 12 मई (हि.स.)। “डिजिटल विधानसभाओं और प्रौद्योगिकी आधारित शासन व्यवस्था के इस युग में विधायी प्रक्रियाओं में एकरूपता अब केवल अपेक्षित नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संस्थागत आवश्यकता बन चुकी है। प्रक्रियाओं के समन्वित नियम पारदर्शिता, कार्यपालिका की जवाबदेही तथा देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं में समरूपता को सुदृढ़ करने में मदद करेंगे,” यह बात दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने मंगलवार को कर्नाटक के मैसूर में आयोजित “विधायी निकायों के लिए प्रक्रिया एवं कार्य संचालन के समान मॉडल नियम तैयार करने के लिए पीठासीन अधिकारियों की समिति” की प्रारंभिक बैठक में कही। इस समिति की बैठक उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता में आयोजित की गई है।
विजेंद्र गुप्ता ने पटना में हुए 85वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में लिए गए निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम एक ऐतिहासिक एवं दूरदर्शी संस्थागत सुधार है, जो देशभर की विधानसभाओं के कार्य संचालन में अधिक समन्वय, पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करेगा। विधायी प्रक्रियाओं से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए गुप्ता ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 118 संसद के दोनों सदनों को अपनी प्रक्रिया एवं कार्य संचालन के नियम बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 208 राज्यों की विधानसभाओं को भी समान अधिकार प्रदान करता है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली शासन अधिनियम, 1991 की धारा 33 दिल्ली विधानसभा को अपने प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियम बनाने का अधिकार देती है, बशर्ते वे लोकसभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों के अनुरूप हों। उन्होंने कहा कि ये संवैधानिक प्रावधान विधानसभाओं को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली विनियमित करने की संप्रभुता प्रदान करते हैं, साथ ही व्यापक लोकतांत्रिक हित में स्थापित संसदीय परंपराओं, प्रक्रियाओं एवं नवीनताओं को स्वेच्छा से अपनाने का अवसर भी देते हैं।
विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद देशभर की विधानसभाओं के नियमों में संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप आवश्यक संशोधन किए गए और समय-समय पर लोकतांत्रिक तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप उनमें परिवर्तन होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि अधिकांश राज्य विधानसभाओं ने ऐतिहासिक रूप से लोकसभा के नियमों के व्यापक ढांचे का अनुसरण किया है, हालांकि स्थानीय आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों के अनुसार उनमें कुछ परिवर्तन किए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप देश की विधायी संस्थाओं में प्रक्रियात्मक रूप से पर्याप्त समानता विकसित हुई है। गुप्ता ने कहा कि विधायी नियम स्थिर या अपरिवर्तनीय दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक ढाँचे हैं जिन्हें समकालीन संस्थागत आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित होना चाहिए।
इस पहल के संस्थागत महत्व को रेखांकित करते हुए गुप्ता ने कहा कि प्रक्रिया एवं कार्य संचालन के समान मॉडल नियम विधानसभाओं के बीच समरूपता को मजबूत करेंगे, विधायी कार्यों की दक्षता बढ़ाएंगे, प्रक्रियात्मक अस्पष्टताओं को कम करेंगे तथा कार्यपालिका की जवाबदेही को और सुदृढ़ करेंगे। उन्होंने आगे कहा कि समन्वित प्रक्रियाएं विधानसभाओं के कार्य संचालन में पारदर्शिता तथा जनसामान्य की समझ को बेहतर बनाएंगी और प्रक्रियात्मक व्याख्याओं में विरोधाभास कम होने से न्यायिक स्पष्टता भी बढ़ेगी।
विधानसभा अध्यक्ष ने राष्ट्रीय ई-विधान एप्लीकेशन (नेवा) के माध्यम से विधानसभाओं के तेजी से हो रहे डिजिटलीकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि डिजिटल दस्तावेजीकरण, ई-समितियों तथा प्रौद्योगिकी आधारित विधायी निगरानी जैसी आधुनिक संसदीय प्रणालियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रक्रियात्मक समन्वय अत्यंत आवश्यक हो गया है।
विजेंद्र गुप्ता ने यह भी कहा कि ऐसा कोई भी ढांचा विधानसभाओं की संवैधानिक स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए अनिवार्य नहीं बल्कि परामर्श-आधारित स्वरूप का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राजनीतिक दलों एवं सरकारों के बीच व्यापक सहमति आवश्यक होगी, साथ ही क्षेत्रीय आवश्यकताओं, स्थानीय परंपराओं तथा राज्यों की विशिष्ट राजनीतिक परिस्थितियों के लिए पर्याप्त लचीलापन भी बनाए रखना होगा।
विजेंद्र गुप्ता ने विधायी संस्थाओं में श्रेष्ठ प्रक्रियाओं के आदान-प्रदान के महत्व पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि किसी एक विधानसभा द्वारा अपनाए गए सफल प्रक्रियात्मक नवीनताओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया जाना चाहिए तथा जहाँ उपयुक्त हो, उन्हें अन्य विधानसभाओं में भी लागू किया जाना चाहिए ताकि सभी विधायी संस्थाएं सामूहिक रूप से संस्थागत अनुभव एवं संसदीय ज्ञान का लाभ उठा सकें।
बैठक में अपने संबोधन का समापन करते हुए गुप्ता ने कहा कि प्रक्रिया एवं कार्य संचालन के समान मॉडल नियमों को अपनाना भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को और अधिक सशक्त बनाने तथा देशभर में अधिक पारदर्शी, जवाबदेह एवं समन्वित संसदीय संस्कृति विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

