home page

ट्रांसजेंडर अधिकार संशोधन विधेयक का कोलकाता में विरोध

 | 

कोलकाता, 21 मार्च (हि.स.)। प्रस्तावित ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर कोलकाता में क्वीयर समुदाय के सदस्यों और कानूनी विशेषज्ञों ने गंभीर आपत्ति जताई है। उनका आरोप है कि यह विधेयक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-पहचान के अधिकार को सीमित कर सकता है।

हाल ही में केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री वीरेंद्र कुमार द्वारा संसद में पेश किए गए विधेयक की आलोचना इस आधार पर हो रही है कि इसमें ट्रांसजेंडर की परिभाषा को संकुचित करने और कानूनी मान्यता के लिए अतिरिक्त प्रक्रियात्मक शर्तें जोड़ने का प्रस्ताव है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव 2014 के ऐतिहासिक नालसा बनाम भारत संघ फैसले की भावना के विपरीत है, जिसमें उच्चतम न्यायालय ने बिना अनिवार्य चिकित्सीय हस्तक्षेप के अपनी लैंगिक पहचान स्वयं तय करने के अधिकार को मान्यता दी थी।

प्रख्यात क्वीयर लेखक और अधिकार कार्यकर्ता पवन धाली ने कहा कि नया विधेयक ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित करता है और कानूनी पहचान के लिए चिकित्सीय प्रमाण की आवश्यकता का प्रस्ताव करता है। उन्होंने कहा कि इस विधेयक से ट्रांसजेंडर समुदाय की स्वतंत्र इच्छा प्रभावित होगी और उन्हें चिकित्सीय जांच की प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उन्होंने मांग की कि विधेयक को पुनर्विचार के लिए संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाना चाहिए।

कलकत्ता उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता कौशिक गुप्ता ने भी इस विधेयक पर चिंता जताते हुए कहा कि इसमें ट्रांसजेंडर की नई परिभाषा के कारण ट्रांस-मैन समुदाय प्रभावित हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पहचान के लिए प्रस्तावित स्क्रीनिंग प्रक्रिया भेदभावपूर्ण है और इस विषय पर देशव्यापी परामर्श किया जाना चाहिए था।

क्वीयर अधिकार कार्यकर्ता और सामाजिक माध्यम प्रभावक देविका बरुआ ने सवाल उठाया कि आखिर ट्रांसजेंडर समुदाय को ही अपनी पहचान का प्रमाण क्यों देना पड़ता है, जबकि पुरुष और महिला वर्ग से ऐसा कोई प्रमाण नहीं मांगा जाता। उन्होंने इसे मानवाधिकार और निजता के अधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया।

ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ता डॉ. रंजीता सिन्हा ने कहा कि प्रस्तावित विधेयक से संवैधानिक मूल्यों के कमजोर होने का खतरा है और इससे लैंगिक विविधता वाले कई लोगों को कानूनी पहचान और संरक्षण से बाहर किए जाने की आशंका है।

उन्होंने कहा कि लैंगिक पहचान को किसी चिकित्सीय निदान या प्रशासनिक प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं किया जा सकता, बल्कि यह गरिमा और आत्मनिर्णय से जुड़ा व्यक्तिगत और संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय लंबे समय से भेदभाव और सामाजिक कलंक का सामना करता रहा है, इसलिए ऐसे कानूनों को उनके अधिकारों को सीमित करने के बजाय मजबूत करना चाहिए। ------------------

हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर