सदियों पुराने हैं भारत-रूस के संबंध, आने वाले दिनों में और मजबूत होंगे : महावाणिज्यदूत कोजलोव
कोलकाता, 31 अगस्त (हि.स.)। भारत और रूस के संबंध केवल कूटनीतिक और रणनीतिक साझेदारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक आदान-प्रदान, आपसी सम्मान और लोगों के बीच गहरे संबंधों पर आधारित हैं। आने वाले समय में यह साझेदारी और मजबूत होगी। कोलकाता में रूस के महावाणिज्यदूत मैक्सिम वी. कोजलोव ने सोमवार को संपर्क–भारत-रूस द्विपक्षीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए यह बात कही।
कोजलोव ने कोलकाता में सम्मेलन आयोजित किए जाने का स्वागत करते हुए कहा कि भारत-रूस संबंधों को लेकर होने वाली चर्चाएं अब तक मुख्य रूप से नई दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों तक केंद्रित रही हैं। ऐसे में पूर्वी भारत से इस तरह की पहल की शुरुआत महत्वपूर्ण है। उन्होंने उम्मीद जताई कि संपर्क आने वाले समय में भारत और रूस के बीच नियमित संवाद और सहयोग का प्रभावी मंच बनेगा।
भारत और रूस के ऐतिहासिक संबंधों का उल्लेख करते हुए कोजलोव ने रूसी यात्री अफानासी निकितिन, विद्वान गैरेसिम लेबेदेव और चित्रकार वासिली वेरेशचागिन के भारत से जुड़े योगदान को याद किया। उन्होंने कहा कि साहित्य, सिनेमा और कला के माध्यम से दोनों देशों के लोगों के बीच ऐसा भावनात्मक संबंध बना है, जो आज भी द्विपक्षीय रिश्तों की मजबूत बुनियाद है।
आर्थिक संबंधों का जिक्र करते हुए रूसी महावाणिज्यदूत ने कहा कि दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए व्यापार को अधिक संतुलित और विविध बनाना होगा तथा रूसी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ानी होगी।
उन्होंने भारत और यूरेशियाई आर्थिक संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत में तेजी लाने की जरूरत बताई। साथ ही दोनों देशों के बीच व्यापार को सुगम बनाने के लिए प्रभावी तंत्र विकसित करने और आपसी लेन-देन में राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने पर जोर दिया।
कोजलोव ने परिवहन संपर्क को भारत-रूस आर्थिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे और उत्तरी समुद्री मार्ग की संभावनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि बेहतर संपर्क व्यवस्था से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी, परिवहन समय और लागत में कमी आएगी तथा व्यापार और निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।
उन्होंने कहा कि नागरिक विमानन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा केंद्र, उन्नत प्रौद्योगिकी और महत्वपूर्ण खनिज जैसे क्षेत्र भारत-रूस सहयोग के नए केंद्र बन सकते हैं। जहाज निर्माण, रेलवे, धातुकर्म और पेट्रो रसायन जैसे पारंपरिक क्षेत्रों के साथ ऊर्जा ढांचे, गैस और अन्य क्षेत्रों में भी सहयोग की व्यापक संभावनाएं हैं।
परमाणु ऊर्जा को दोनों देशों के बीच सहयोग का प्रमुख क्षेत्र बताते हुए कोजलोव ने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को भारत-रूस तकनीकी सहयोग का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि अब दोनों देश उन्नत परमाणु तकनीक और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों में भी सहयोग की संभावनाएं तलाश सकते हैं।
उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, क्वांटम कंप्यूटिंग, उन्नत सामग्री, रोबोटिक्स, जैव प्रौद्योगिकी और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग की संभावनाएं हैं। भारत और रूस की वैज्ञानिक एवं इंजीनियरिंग क्षमताओं, बाजार और मानव संसाधनों को एक साथ लाकर संयुक्त प्रौद्योगिकी पार्क, शोध केंद्र और नवाचार मंच विकसित किए जा सकते हैं।
महत्वपूर्ण खनिजों को भी उन्होंने भविष्य के सहयोग का महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। उन्होंने भू-वैज्ञानिक खोज, खनन, खनिजों के निष्कर्षण और प्रसंस्करण में संयुक्त प्रयासों की संभावनाओं पर जोर दिया। कृषि क्षेत्र में भी ऊर्जा संसाधनों, उर्वरकों और कृषि उत्पादों की आपूर्ति के साथ नए प्रोजेक्ट, बेहतर परिवहन व्यवस्था और बाजार तक पहुंच बढ़ाने की संभावनाएं बताईं।
कोजलोव ने कहा कि भारत-रूस साझेदारी की संभावनाएं बेहद व्यापक हैं, लेकिन अब जरूरत इन संभावनाओं को ठोस परिणामों में बदलने की है। उनके अनुसार, दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद विश्वास और मित्रता को नए आर्थिक, तकनीकी और व्यावसायिक सहयोग में बदलना समय की जरूरत है।
संपर्क सम्मेलन में दोनों देशों के बीच सहयोग के नए क्षेत्रों पर विस्तार से चर्चा हुई। सम्मेलन के माध्यम से नीति-निर्माताओं, राजनयिकों, शिक्षाविदों, कारोबारी नेताओं, शोधकर्ताओं और युवाओं को एक मंच पर लाकर भारत-रूस संबंधों की अगली दिशा पर विचार-विमर्श किया गया। --------------
हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर

