home page

86वें एआईपीओसी में छह संकल्प किय गए अंगीकृत, संसदीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने पर जाेर

 | 
86वें एआईपीओसी में छह संकल्प किय गए अंगीकृत, संसदीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने पर जाेर


-पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के समापन के बाद लाेकसभा अध्यक्ष ने पत्रकाराें से की वार्ता-संसदीय लोकतंत्र सुदृढ़ व उत्तरदायी बनाने में महत्वपूर्ण उपलब्धि है यह सम्मेलन: ओम बिरला

लखनऊ, 21 जनवरी (हि.स.)। अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी (एआईपीओसी) सम्मेलन के अंतिम दिन बुधवार को छह संकल्प सर्वसम्मति से पारित कर अंगीकृत किये गए। इनमें पारदर्शिता व नागरिक केंद्रित विधायी प्रक्रियाओं के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग, विधायकों की क्षमता वृद्धि कर कार्य कुशलता में सुधार, लोकतांत्रिक शासन को सुदृढ़ करना और जनता के प्रति विधायिकाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना और विधायी कार्याें के मूल्यांकन के लिए राष्ट्रीय विधाई सूचकांक नेशनल लेजिसलेटिव इंडेक्स का निर्माण करना शामिल है। उत्तर प्रदेश विधानभवन में आयोजित एआईपीओसी के समापन के बाद विधान भवन के तिलक सभागार में लोकसभा अध्यक्ष ने पत्रकारों को पूरे सम्मेलन की विस्तार से जानकारी दी। पत्रकार वार्ता के दाैरान राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह, उप्र विधान सभा के अध्यक्ष सतीश महाना, उप्र विधान परिषद के सभापति कुंअर मानवेन्द्र सिंह भी मौजूद रहे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि आज संपन्न 86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) भारतीय संसदीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हुआ है।उन्होंने बताया कि 1921 में संसदीय पद्धतियों एवं प्रक्रियाओं को विकसित करने के उद्देश्य से एआईपीओसी की पहली बार शुरुआत हुई। इस बार उप्र में यह चौथी बार आयोजित किया गया है। इससे पूर्व दिसंबर 1961, अक्टूबर 1985, जनवरी-फरवरी 2015 में आयोजित हुआ था।

उन्होंने बताया कि 86वें एआईपीओसी में हमने छह संकल्प लिए हैं। इसके अलावा तीन महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गयी। इनमें पारदर्शी कुशल एवं नागरिक केंद्रित विधायी प्रक्रियाओं हेतु प्रौद्योगिकी का उपयोग, विधायकों की क्षमता वृद्धि द्वारा कार्य कुशलता में सुधार एवं लोकतांत्रिक शासन को सुदृढरण करना और जनता के प्रति विधायिकाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना शामिल है।

उन्होंने बताया कि हमने चर्चा की है कि सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं में एक आदर्श नेतृत्व स्थपित हो। विधान मंडलों में तथ्यपूर्ण एवं ज्ञानवर्धक चर्चा हो। रिसर्च विंग हो। पुरानी नई लाइब्रेरी डिजिटल हो ताकि आने वाले समय में हमारे विधायकों की सरलता के साथ सहभागिता हो। तुलनात्मक आंकलन के लिए नेशनल स्तर पर कमेटी बनेगी ताकि मनकों के आधार पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो।

उन्होंने कहा कि संस्थाओं को जवाबदेही बनाने, पीठासीन अधिकारी की निष्पक्षता पर सार्थक चर्चा की। मुझे आशा है कि इस सम्मेलन के माध्यम से विधायी संस्थाओं को और भी सशक्त एवं जवदेही बनाएंगे।

पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि विधानसभा स्वायत्त होती हैं। हम प्रयास करेंगे कि कम से कम 30 दिन विधानसभा चले। इसके लिए विधानसभाओं से मेरी आग्रह है। राजनीतिक दलों से बात करेंगे कि 30 दिन सदन चले। हमने नियम बनाकर 30 दिन चलाने की बात नहीं की है।

एक सवाल के जवाब में लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि सदन में लगातार नियोजित गतिरोध और व्यवधान देश के लोकतंत्र के लिए उचित नहीं हैं। जब सदन में व्यवधान होता है, तो सबसे अधिक नुकसान उस नागरिक का होता है, जिसकी समस्या पर चर्चा होनी थी। सदन का प्रत्येक क्षण बहुमूल्य होता है। सदन चर्चा, संवाद और समिति कार्यों के लिए होते हैं, न कि गतिरोध के लिए। विरोध राजनीतिक रूप से हो सकता है, लेकिन शब्दों और तर्कों का मंच सदन होना चाहिए, ताकि सार्थक परिणाम निकलें और जनता का विश्वास बना रहे।

ओम बिरला ने सम्मेलन की सफलता के लिए उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा एवं राज्यसभा सचिवालय तथा सभी प्रतिभागी पीठासीन अधिकारियों और प्रतिनिधियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि 86वां अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआईपीओसी) भारतीय संसदीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़, उत्तरदायी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध हुआ है।

एआइपीओसी में 24 राज्य व तीन केन्द्र शासित प्रदेशों से 36 पीठासीन अधिकारियों ने भागीदारी की। कुल 31 प्रधान सचिव व सचिव शामिल हुए। सम्मेलन में सात राज्याें के प्रतिनिधि अनुपस्थित रहे।

एआईपीओसी में अंगीकृत छह संकल्प

पहला संकल्प- हम अपनी-अपनी विधायिकाओं के कार्य संचालन के प्रति स्वयं को पुनः समर्पित करेंगे। ताकि वर्ष 2047 तक विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य की प्राप्ति में योगदान दिया जा सके।

संकल्प दो- सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाकर राज्य विधायी निकायों की न्यूनतम 30 बैठकें प्रतिवर्ष की जाए तथा विधायी कार्यों के लिए उपलब्ध समय और संसाधनों का रचनात्मक एवं प्रभावी उपयोग किया जाए। ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता के प्रति उत्तरदायी हो सके।

संकल्प तीन- विधायी कार्यों की सुगमता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को निरंतर शुद्ध किया जाएगा। ताकि जनता और उनकी विधायिकाओं के बीच प्रभावी संपर्क स्थापित हो सके और सार्थक सहभागी शासन सुनिश्चित किया जा सके।

संकल्प चार- सहभागी शासन की सभी संस्थाओं को आदर्श नेतृत्व प्रदान करना निरंतर जारी रखेंगे। ताकि हमारे राष्ट्र की लोकतांत्रिक परंपराएं और मूल्य और अधिक गहरी तथा सशक्त बन सके।

संकल्प पांच- विशेष रूप से डिजिटल प्रौद्योगिकी के कुशल उपयोग के क्षेत्र में अपने सांसदों एवं विधायकों की क्षमता निर्माण का निरंतर समर्थन करेंगे तथा विधायीकाओं में होने वाली बहसों और चर्चाओं में जनप्रतिनिधियों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु शोध एवं अनुसंधान सहायता को सुदृढ़ करेंगे।

संकल्प छह- हमारे विधायी निकायों के कार्य संपादन का वस्तुनिष्ठ मानकों के आधार पर मूल्यांकन एवं तुलनात्मक आकलन बेंच मार्किंग करने के लिए एक राष्ट्रीय विधाई सूचकांक नेशनल लेजिसलेटिव इंडेक्स का निर्माण किया जाए जिससे जनहित में अधिक उत्तरदायित्व के साथ स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करने हेतु अनुकूल वातावरण स्थापित हो सके।

हिन्दुस्थान समाचार / दिलीप शुक्ला