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कॉमनवेल्थ का मूल्यांकन घोषणापत्रों से नहीं, समाधानों से होना चाहिए : विजेंद्र गुप्ता

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कॉमनवेल्थ का मूल्यांकन घोषणापत्रों से नहीं, समाधानों से होना चाहिए : विजेंद्र गुप्ता


नई दिल्ली, 17 सितंबर (हि.स.)। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि कॉमनवेल्थ का मूल्यांकन उसके द्वारा अपनाए गए घोषणापत्रों से नहीं, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि हम किन संस्थाओं को मजबूत करते हैं और क्या समाधान प्रदान करते हैं। यह बात विजेंद्र गुप्ता ने दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन में आयोजित 69वें कॉमनवेल्थ संसदीय सम्मेलन में कही। उन्होंने ‘कॉमनवेल्थ के लिए नए नेतृत्व के अवसर: लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने के लिए संसदीय कार्रवाई’ विषय पर सत्र को संबोधित किया। यह जानकारी आज एक बयान में दी गई।

सशस्त्र संघर्ष, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, संस्थाओं में घटते विश्वास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों पर गुप्ता ने कहा कि संसदों को ऐसे संस्थानों के रूप में काम करना होगा, जो जनता की चिंताओं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं को कानून, निगरानी और जवाबदेह कार्रवाई में बदल सकें। चुनाव लोगों को लोकतांत्रिक अधिकार देते हैं, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती चुनावों के बीच की अवधि में दिखाई देती है। इसके लिए विधायी समीक्षा, सरकारी खर्च में पारदर्शिता, प्रभावी समितियां और नागरिकों की सार्थक भागीदारी जरूरी है। लगभग 56 देशों वाले कॉमनवेल्थ में दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी रहती है। इसकी विविधता के कारण कॉमनवेल्थ के पास यह दिखाने का महत्वपूर्ण अवसर है कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और कानून के शासन के प्रति साझा प्रतिबद्धताओं को केवल घोषणाओं तक सीमित न रखकर वास्तविक और मापनीय संस्थागत बदलावों में कैसे बदला जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं स्वयं लागू नहीं होतीं। वैश्विक दायित्वों को लागू करने के लिए घरेलू कानून, बजटीय सहयोग और संसदीय निगरानी आवश्यक है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 51 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय संधियों, विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के क्रियान्वयन की समीक्षा में विधायिकाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पिछली सदी में बनाई गई इन संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए और उभरती अर्थव्यवस्थाओं, छोटे देशों तथा कमजोर समुदायों के हितों की भी रक्षा होनी चाहिए।

विधायिकाओं में तकनीक के बढ़ते उपयोग पर विजेंद्र गुप्ता ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान और जानकारी तक लोगों की पहुंच को आसान बना सकती है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना, हेरफेर और लोगों के बाहर रह जाने का खतरा भी है। प्रौद्योगिकी लोकतांत्रिक जवाबदेही का साधन बनी रहनी चाहिए, उसका विकल्प नहीं।

भारत की पेपरलेस विधायी पहलों, राष्ट्रीय ई-विधान एप्लीकेशन और बहुभाषी तकनीकों का उल्लेख करते हुए उन्होंने दिल्ली विधानसभा के एआई-सक्षम विधायी अनुसंधान सहायक ‘विधान साथी’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक की सफलता केवल उसकी नई तकनीक होने में नहीं, बल्कि इस बात में है कि वह संसदीय निगरानी को कितना मजबूत करती है, संस्थागत संसाधनों की बचत करती है और नागरिकों को विधायिकाओं के और करीब लाती है।

विधानसभा अध्यक्ष ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की क्षमता और सभी वर्गों की भागीदारी को भी कॉमनवेल्थ के संसदीय एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की बात कही। उन्होंने कहा कि छोटे देशों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर, अत्यधिक मौसम, कर्ज के दबाव और सीमित संस्थागत क्षमता के कारण अधिक जोखिमों का सामना करना पड़ता है। इसलिए संसदों को जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं की समीक्षा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उपलब्ध संसाधन कमजोर समुदायों तक पहुंचें।

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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव