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भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व ज्ञान-विमर्श को नई दिशा दे सकती है : मुकुल कानिटकर

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भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व ज्ञान-विमर्श को नई दिशा दे सकती है : मुकुल कानिटकर


- भारत की सभी भाषाएं क्षेत्रीय नहीं, अखिल भारतीय; ‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा है भाषा : कानिटकर

- भाषा समागम-2026 में बोले, भारत में ज्ञान नई निर्मिति नहीं, शाश्वत सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया

वाराणसी, 13 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य मुकुल कानिटकर ने रविवार को कहा कि दुनिया ज्ञान को लगातार नई खोजों और निर्मितियों के रूप में देखती रही है, जबकि भारत की ज्ञान-दृष्टि इससे कहीं व्यापक है। भारतीय परंपरा में ज्ञान किसी नई वस्तु की निर्मिति नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य के साक्षात्कार की प्रक्रिया है। विविधताओं के बीच एकत्व को पहचानना ज्ञान है और उसी एक सत्य के विशेष रूप में प्रकट होने को समझना विज्ञान। भारतीय ज्ञान परंपरा की यही दृष्टि आज वैश्विक ज्ञान-विमर्श को नई दिशा दे सकती है।

वाराणसी स्थित महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गांधी अध्ययन पीठ सभागार में हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर बहुभाषी समाचार एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार की ओर से आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा, क्षेत्रीय भाषाएं और समृद्ध भारत’ विषयक भारतीय भाषा समागम-2026 में मुख्य वक्ता के रूप में कानिटकर ने भारतीय ज्ञान, विज्ञान, भाषाओं और तकनीक के संबंध को व्यापक संदर्भ में सामने रखा।

समागम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में विद्वान वह नहीं है जो यह दावा करे कि उसने दुनिया को कोई बिल्कुल नई बात दी है। यहां विद्वता उस विनम्रता में है, जिसमें व्यक्ति कहता है कि उसने कोई नया सत्य नहीं बनाया, बल्कि शास्त्रों में पहले से विद्यमान सत्य का साक्षात्कार किया है। पश्चिमी आधुनिक शोध पद्धति में नई खोज विद्वता का आधार हो सकती है, लेकिन भारतीय दृष्टि में ज्ञान पहले से अस्तित्वमान है और साधक उसका साक्षात्कार करता है।

न्यूटन से ऋषि तक, खोज नहीं साक्षात्कार की परंपरा

स्वामी विवेकानंद का संदर्भ देते हुए कानिटकर ने कहा कि पश्चिम के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि भारत में कोई व्यक्ति तब तक पूर्ण विद्वान नहीं माना जाता, जब तक वह अपने ज्ञान को स्वयं की निर्मिति न बताकर पूर्व में साक्षात्कार किए गए सत्य से जोड़कर न देखे। वेद व्यास ने महाभारत में जीवन के असंख्य आयामों को समाहित किया। भारतीय परंपरा में ज्ञान को आगे बढ़ाने का अर्थ केवल नया घोषित करना नहीं, बल्कि पूर्व में प्राप्त ज्ञान को समझना, उसका साक्षात्कार करना और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

एकत्व का ज्ञान ज्ञान, विशेषता की पहचान विज्ञान

कानिटकर ने कहा कि भारत में ज्ञान का मूल अर्थ ही एकत्व की दृष्टि है। भौतिकी पदार्थ के सत्य को समझती है, जीव विज्ञान जीवन और चेतना के रहस्य तलाशता है और रसायन विज्ञान पदार्थों की विशेषताओं को पहचानता है। हर विद्या में उस ‘एक’ को पहचानना ज्ञान है और वह एक किस विशेष रूप में प्रकट हुआ, उसे समझना विज्ञान है।

प्रफुल्लचंद्र राय की ‘हिस्ट्री ऑफ हिंदू केमिस्ट्री’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की रसविद्या में भी एकत्व की दृष्टि दिखाई देती है। जिस व्यापक सत्ता में लोहा है, उसी में स्वर्ण भी है। इसी भाव से लोहे को स्वर्ण में बदलने वाले तत्व को पारस कहा गया। भारतीय रसायन विद्या पदार्थों के प्रयोग तक सीमित नहीं थी, बल्कि उसके पीछे मौजूद व्यापक सत्ता को समझने की जिज्ञासा भी उसमें थी।

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ में विश्व कल्याण का दर्शन

मुकुल कानिटकर ने कहा कि भारतीय दृष्टि किसी एक पंथ या मत की श्रेष्ठता की लड़ाई नहीं है। भारत ने अलग-अलग मार्गों में एक ही सत्य की संभावना को स्वीकार किया। इसलिए भारतीय प्रार्थना केवल अपने लिए सुख की कामना नहीं करती, बल्कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव रखती है। उन्होंने कहा कि भारतीय शांति मंत्र में केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, अग्नि और समूची सृष्टि में शांति की कामना की गई है। यही व्यापकता भारतीय ज्ञान परंपरा को स्थानीय सीमाओं से निकालकर वैश्विक मानवता के लिए प्रासंगिक बनाती है।

गंगा की तरह निरंतर बहती रही ज्ञानधारा

मुकुल कानिटकर ने कहा कि परंपरा का अर्थ ही वह है जो निरंतर चलता रहे। जिस तरह गंगा की धारा युगों से बह रही है, उसी तरह भारत में ज्ञान की धारा भी अनादिकाल से प्रवाहित रही है।

गुरुकुलों की खोज का अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि शुरुआत में लगा कि गुरुकुल परंपरा समाप्त हो चुकी है, लेकिन खोज करने पर पता चला कि आज भी सैकड़ों गुरुकुल चल रहे हैं। धनुर्वेद के गुरुकुलों की खोज में डेढ़ सौ से अधिक गुरुकुल मिले। पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी विद्या का हस्तांतरण भी गुरुकुल परंपरा का ही स्वरूप है। पिता से पुत्र और गुरु से शिष्य तक ज्ञान का प्रवाह भारतीय सभ्यता की निरंतरता का आधार रहा है।

हजारों वर्षों की ज्ञान-यात्रा का प्रतीक है काशी

काशी को इस ज्ञानधारा का जीवंत प्रतीक बताते हुए कानिटकर ने कहा कि यहां कला, विद्या, मर्दन, योग, आयुर्वेद और अनेक विद्याओं की गुरुकुल परंपराओं के प्रमाण मिलते हैं। कला से जुड़े ग्रंथों के भी डेढ़ सौ से अधिक प्रमाणिक स्रोत मिले हैं। यह ज्ञान परंपरा केवल संस्कृत तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत की विभिन्न भाषाओं में इसका निरंतर लेखन और प्रवाह हुआ। उन्होंने कहा कि काशी केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की अनवरत ज्ञान-यात्रा का प्रतीक है। अब आवश्यकता है कि काशी से भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच संवाद का नया सेतु तैयार हो।

भारत की हर भाषा अखिल भारतीय

भारतीय भाषाओं को ‘क्षेत्रीय’ कहे जाने पर कानिटकर ने कहा कि किसी भारतीय भाषा की पहचान केवल उसके भौगोलिक क्षेत्र से नहीं हो सकती। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, गुजराती, असमिया, हिंदी या कोई अन्य भारतीय भाषा हो, भाषा अलग हो सकती है, लेकिन उसमें व्यक्त भाव भारत का ही है। ‘दो कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में भाषा बदलती रही, लेकिन भाव नहीं बदला। नानक देव, श्रीमंत शंकरदेव, समर्थ रामदास और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुषों ने अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों में यात्राएं कीं और संवाद स्थापित किया। इसका आधार यही था कि भाषा बदल सकती है, भाव नहीं।

मुकुल कानिटकर ने कहा कि भारत की भाषाएं क्षेत्रीय नहीं, अखिल भारतीय हैं। तमिल, असमिया, मराठी, गुजराती या हिंदी में लिखे जाने के बावजूद उनमें अभिव्यक्त भारत एक ही है। सभी भाषाएं देश की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक एकता की वाहक हैं।

‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा है भाषा

कानिटकर ने कहा कि भाषा का उद्देश्य केवल सूचना देना या अपनी बात व्यक्त करना नहीं है। भाषा ‘मैं’ से ‘हम’ होने की प्रक्रिया है। वाणी की साधना अहंकार के विसर्जन की साधना है। जब हृदय से हृदय जुड़ता है, तभी वास्तविक संवाद जन्म लेता है।

दक्षिणामूर्ति की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत में मौन भी ज्ञान का माध्यम रहा है। गुरु के मौन से शिष्य के संशय दूर होने की परंपरा रही है। वाणी परा से पश्यंती, पश्यंती से मध्यमा और मध्यमा से वैखरी तक आती है। शब्द जब अंकित होता है तो अक्षर बनता है और जिसका क्षरण नहीं होता, वही अक्षर है।

पांडुलिपि से मोबाइल और एआई तक पहुंची अक्षर की यात्रा

मुकुल कानिटकर ने कहा कि अक्षर की यात्रा आज डिजिटल युग में प्रवेश कर चुकी है। टेलीप्रिंटर से कंप्यूटर, सीडी और इंटरनेट होते हुए अक्षर मोबाइल तक पहुंचा। आधुनिक तकनीक के माध्यम से आज किसी भी विषय की जानकारी तत्काल प्राप्त की जा सकती है। यह केवल तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही वाणी, अक्षर और ज्ञान की यात्रा का नया पड़ाव है।

कानिटकर ने कहा कि हिन्दुस्थान समाचार विश्व की एकमात्र बहुभाषी समाचार परंपरा है। काशी में वाणी की इस साधना को आगे बढ़ाने के लिए पिछले वर्षों से किए जा रहे प्रयासों की सराहना करते हुए उन्होंने भारतीय भाषा समागम के आयोजन को भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपरा के व्यापक पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बताया।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी