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होली : इंटरनेशनल कल्चरल डेस्टिनेशन की ओर यूपी, धार्मिक पर्यटन को विश्व मंच पर उतारने की तैयारी

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होली : इंटरनेशनल कल्चरल डेस्टिनेशन की ओर यूपी, धार्मिक पर्यटन को विश्व मंच पर उतारने की तैयारी


- सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत आज भी उसी जीवंतता के साथ आगे बढ़ रही

लखनऊ, 01 मार्च (हि.स.)। इस बार योगी सरकार उत्तर प्रदेश को इंटरनेशनल कल्चरल डेस्टिनेशन बनाने और धार्मिक पर्यटन को विश्व मंच पर उतारने की तैयारी कर रही है। इसके लिए सरकार होली को फाल्गुनी उत्सव की मूल भावना से जोड़ते हुए ग्लोबल पिलग्रिम फेस्टिवल के रूप में प्रस्तुत करने जा रही है। इससे ऋतु, धर्म, संस्कृति और पर्यटन एकसूत्र में पिरोए जाएंगे।

उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों पर मनाई जाने वाली होली सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को आज भी उसी जीवंतता से आगे बढ़ा रही है। फाल्गुन का महीना जैसे ही दस्तक देता है, उत्तर भारत की हवाओं में एक अलग ही मादकता घुल जाती है। आम्र-मंजरियों की सुगंध, कोयल की कू, ढोल-मंजीरों की थाप और फाग गीतों की गूंज यह संकेत देती है कि रंगों का महापर्व आ गया है।

उत्तर प्रदेश के पूर्व पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ. नीलकंठ तिवारी की मानें तो होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है। इसका मूल अर्थ है असत्य पर सत्य की जीत, अहंकार पर भक्ति की विजय और विभाजन पर मिलन का उत्सव। इसी अर्थ को आधार बनाकर इस बार धार्मिक स्थलों की होली को वैश्विक पर्यटन से जोड़ने की योजना है। इसका उद्देश्य होली के आध्यात्मिक संदेश को विश्व मंच तक पहुंचाना और इसे फेस्टिवल ऑफ हार्मनी के रूप में स्थापित करना है।

उन्होंने बताया कि इस बार लक्ष्य केवल पारंपरिक उत्सव नहीं, बल्कि ग्लोबल फेथ एंड कल्चर फेस्टिवल की अवधारणा के साथ होली को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। सरकार, पर्यटन उद्योग, सांस्कृतिक संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन मिलकर ऐसा मॉडल तैयार किए हैं, जो भारत की आध्यात्मिक विरासत को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचा सके।

सनातन परंपरा का प्रतीक होलिका दहन

वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार सियाराम पाण्डेय ने बताया कि होली का पहला अध्याय होलिका दहन से शुरू होता है, जो भक्त प्रह्लाद की कथा से जुड़ा है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन का संदेश है। अहंकार और अन्याय का अंत निश्चित है। गांव-गांव और शहर-शहर में जलती होलिका भारतीय संस्कृति की उस जड़ों से जुड़ी आस्था का प्रतीक है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ब्रज और काशी के धार्मिक स्थलों पर होलिका दहन को सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आयोजन के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी है, ताकि विदेशी पर्यटक इसके दार्शनिक अर्थ को समझ सकें।

ब्रज : राधा-कृष्ण की लीलाओं से जन्मी रंग परंपरा

मथुरा और वृंदावन में होली का अर्थ केवल रंग खेलना नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का उत्सव है। बांके बिहारी मंदिर की फूलों की होली इस भाव को जीवंत करती है, जहां रंग नहीं, भावनाएं बरसती हैं। बरसाना की लट्ठमार होली भी प्रतीकात्मक है। यह नारी-पुरुष के मधुर संवाद और सांस्कृतिक परंपरा का जीवंत रूप है। इस बार इन आयोजनों को इस तरह प्रस्तुत करने की योजना है कि विश्वभर से आने वाले पर्यटक केवल दृश्य नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे सांस्कृतिक अर्थ को भी समझ सकें।

काशी : अध्यात्म और लोक का संगम

वाराणसी में होली का अर्थ है जीवन की क्षणभंगुरता के बीच आनंद की स्वीकृति। काशी विश्वनाथ मंदिर और गंगा घाटों पर फाग गीतों के साथ मनाई जाने वाली होली यह संदेश देती है कि जीवन रंगों की तरह विविध है और हर रंग का अपना महत्व है। यहां होली को स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस के रूप में प्रचारित करने की तैयारी है, ताकि विदेशी पर्यटक इसे केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव के रूप में ग्रहण करें। काशी में होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि 'जीवन एक उत्सव है' की भारतीय अवधारणा का प्रदर्शन है। यहां साधु-संतों से लेकर आम जन तक, सभी एक ही रंग में रंग जाते हैं समरसता के रंग में।

अयोध्या : फाल्गुन में मर्यादा का रंग

अयोध्या में होली का अर्थ रामराज्य की उस अवधारणा से जुड़ता है, जहां समाज में समानता और प्रेम सर्वोपरि है। सरयू तट पर आयोजित कार्यक्रमों में यह संदेश देने की योजना है कि रंग सभी भेद मिटा देते हैं। जाति,वर्ग और भाषा की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। सरयू तट पर भजन-कीर्तन और रंगोत्सव भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को मजबूत करते हैं, जिसमें उत्सव समाज को जोड़ने का माध्यम है।

विश्व पर्यटन से जुड़ाव

पर्यटन एवं परम्परा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होली के मूल अर्थ सत्य, प्रेम और समरसता को केंद्र में रखकर आयोजन किए जाएं तो यह उत्सव वैश्विक शांति और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बन सकता है। ट्रैवल कंपनियां 'होली विद मीनिंग' थीम के तहत ऐसे पैकेज तैयार करने पर विचार कर रही हैं, जिनमें पर्यटक धार्मिक कथाओं, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक दर्शन को समझ सकें। इससे पर्यटन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ज्ञान और अनुभव का माध्यम बनेगा।

आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभाव

समाजसेवी डॉ अखिलेश वर्मा ने कहा कि होली के अर्थ से जुड़े आयोजनों से स्थानीय कलाकारों, पुजारियों, गाइडों और हस्तशिल्प कारीगरों को भी लाभ मिलेगा। जब पर्यटक किसी त्योहार का दर्शन समझते हैं, तो वे उससे जुड़ी वस्तुओं और परंपराओं में अधिक रुचि लेते हैं। इस प्रकार होली का आध्यात्मिक संदेश पर्यटन और अर्थव्यवस्था दोनों को नई दिशा दे सकता है।

लोककला, संगीत और साहित्य का पर्व

लोकगायक धर्मेन्द्र पाण्डेय ने कहा कि होली भारतीय लोककला और साहित्य से भी गहराई से जुड़ी है। फाग, ठुमरी, दादरा और शास्त्रीय संगीत की विशेष प्रस्तुतियां इस पर्व का हिस्सा हैं। तुलसी, सूर और कबीर की रचनाओं में होली का वर्णन भारतीय साहित्यिक परंपरा की समृद्धि को दर्शाता है।

संस्कृति से पर्यटन तक

जब किसी उत्सव के पीछे इतनी गहरी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि हो, तो वह विश्व पर्यटन के लिए भी आकर्षण बनता है। विदेशी पर्यटक केवल रंग देखने नहीं आते, बल्कि भारतीय संस्कृति को समझने की जिज्ञासा लेकर आते हैं। उत्तर प्रदेश इस बार होली को इंडियन कल्चरल एक्सपीरियंस के रूप में प्रस्तुत करने की तैयारी में है, जहां पर्यटक धार्मिक कथा,लोक परंपरा,संगीत और सामाजिक दर्शन का अनुभव कर सकें।

भारतीयता का रंग

समाजसेवी राजकिशोर की मानें तो होली भारतीय संस्कृति का वह दर्पण है, जिसमें आस्था, प्रेम, कला, संगीत, दर्शन और सामाजिक समरसता एक साथ दिखाई देते हैं। उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थलों पर मनाई जाने वाली होली इस सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रमाण है। जब ब्रज में भक्ति रंग बनकर उड़ती है, काशी में अध्यात्म गुलाल बनकर बिखरता है और अयोध्या में मर्यादा प्रेम के साथ घुलती है, तब होली केवल पर्व नहीं रहती,वह भारतीय संस्कृति की आत्मा बन जाती है।

रंगों से पहले उम्मीदों की आहट

होली की तैयारियों की गूंज बता रही है कि इस बार रंग केवल चेहरे नहीं, अर्थव्यवस्था और पर्यटन की तस्वीर भी बदल सकते हैं। इस बार होली उत्तर प्रदेश के लिए ऐतिहासिक पर्यटन मॉडल का रूप ले सकती है, जहां आस्था, संस्कृति और विकास एक साथ खिल उठेगी।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश