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बिना शंकराचार्य की अनुमति संन्यास अमान्य: शास्त्रार्थ निष्कर्ष

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बिना शंकराचार्य की अनुमति संन्यास अमान्य: शास्त्रार्थ निष्कर्ष


देवभूमि विद्वत परिषद के गठन का निर्णय

हरिद्वार, 26 मार्च (हि.स.)। नगर के भूपतवाला स्थित शांभवी पीठ में गुरुवार को महाकुंभ, अर्धकुंभ एवं अखाड़ा परिषद से जुड़े विषयों पर एक महत्वपूर्ण शास्त्रार्थ चर्चा हुई। इसकी अध्यक्षता शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप महाराज ने की। शास्त्रार्थ के दौरान सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में यह बात सामने आई कि बिना शंकराचार्य की पूर्वानुमति और उनके दिए गए विधिवत मंत्र के कोई भी व्यक्ति संन्यासी नहीं बन सकता और न ही किसी को संन्यास दे सकता है। विद्वानों ने इसे सनातन परंपरा की मूल मर्यादा बताते हुए इसके पालन पर बल दिया।

विद्वानों ने चर्चा के दौरान यह भी चिंता व्यक्त की गई कि वर्तमान समय में बिना विशेष योगदान के कुछ व्यक्तियों को संत घोषित किया जा रहा है, जिससे परंपरा की गरिमा प्रभावित हो रही है। कुंभ मेला जैसे विशाल धार्मिक आयोजनों में भागीदारी के लिए स्पष्ट पात्रता निर्धारित करने की आवश्यकता पर भी सहमति बनी। इस अवसर पर “देवभूमि विद्वत परिषद” के गठन का निर्णय लिया गया तथा शंकराचार्य पद की नियुक्ति में मर्यादानुसार सिद्धांतों के पालन पर जोर दिया गया।

शास्त्रार्थ में प्रो. मोहन चंद्र बलोदी, डॉ. भोला झा, प्रो. राधेश्याम चतुर्वेदी, डॉ. दिनेश चंद्र पाण्डेय, डॉ. पद्म प्रसाद सुवेदी, डॉ. श्रीप्रकाश भट्ट और डॉ. हरिगोपाल शास्त्री सहित कई विद्वान उपस्थित रहे। शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने इस आयोजन का उद्देश्य सनातन परंपराओं को सुदृढ़ करना तथा कुंभ आयोजन को अधिक व्यवस्थित और प्रभावी बनाना बताया गया।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला