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समुद्र की गहराइयों से हिमालय की ढलानों तक, आपदा निगरानी में तकनीक कार्यप्रणाली बनी मजबूत ‘ढाल’

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समुद्र की गहराइयों से हिमालय की ढलानों तक, आपदा निगरानी में तकनीक कार्यप्रणाली बनी मजबूत ‘ढाल’


समुद्र की गहराइयों से हिमालय की ढलानों तक, आपदा निगरानी में तकनीक कार्यप्रणाली बनी मजबूत ‘ढाल’


समुद्र की गहराइयों से हिमालय की ढलानों तक, आपदा निगरानी में तकनीक कार्यप्रणाली बनी मजबूत ‘ढाल’


-प्रतिनिधि मंडल ने हैदराबाद में समझी सुनामी चेतावनी, उपग्रह, रडार और जियोस्पेशियल तकनीक की कार्यप्रणाली

हैदराबाद, 01 सितंबर (हि.स.)। समुद्र की गहराइयों में उठी हलचल से लेकर हिमालय की ढलानों पर होने वाले भूस्खलन तक, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक अब आपदाओं की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। उपग्रहों, रडार, भूकंपीय नेटवर्क और जियोस्पेशियल डेटा के समन्वित उपयोग से आपदा प्रबंधन और पूर्व चेतावनी प्रणाली को नई मजबूती मिली है।

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), देहरादून की ओर से आयोजित पांच दिवसीय हैदराबाद प्रेस अध्ययन दौरे पर आए उत्तराखंड के 15 सदस्यीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को अध्ययन दौरे के पहले दिन पीआईबी हैदराबाद और भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (आईएनसीओआईएस) का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व पीआईबी देहरादून के सहायक निदेशक संजीव सुंद्रियाल कर रहे हैं।

प्रतिनिधिमंडल ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन कार्यरत आईएनसीओआईएस में भारत की महासागर निगरानी व्यवस्था, इंडियन सुनामी अर्ली वार्निंग सेंटर, उपग्रह आधारित सूचना प्रणाली, जियोस्पेशियल डेटा और आपदा चेतावनी तंत्र की कार्यप्रणाली को विस्तार से समझा।

आईएनसीओआईएस के वैज्ञानिक ‘ई’ डॉ एन. श्रीनिवास राव और वैज्ञानिक अजय ने अलग-अलग प्रस्तुतियों के माध्यम से पत्रकारों को संस्थान की वैज्ञानिक सेवाओं और आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि इंडियन सुनामी अर्ली वार्निंग सेंटर समुद्री और भूकंपीय गतिविधियों पर लगातार नजर रखता है। समुद्र के भीतर शक्तिशाली भूकंप आने की स्थिति में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का तत्काल विश्लेषण कर यह आकलन किया जाता है कि उससे सुनामी उत्पन्न होने की संभावना है या नहीं। आवश्यकता पड़ने पर हिंद महासागर क्षेत्र के पड़ोसी देशों को भी सुनामी संबंधी सूचनाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

विशेषज्ञों ने बताया कि आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली में समय सबसे महत्वपूर्ण कारक है। भूकंपीय गतिविधि की पहचान से लेकर समुद्र की स्थिति के विश्लेषण और संभावित प्रभावित क्षेत्रों तक चेतावनी पहुंचाने के बीच वैज्ञानिक प्रणालियों का तेज और सटीक समन्वय आवश्यक होता है।

प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि उपग्रह अब केवल धरती की तस्वीरें लेने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि उनसे प्राप्त आंकड़ों का वैज्ञानिक विश्लेषण कर मौसम, समुद्र, प्राकृतिक घटनाओं और विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों से संबंधित उपयोगी सूचनाएं तैयार की जाती हैं।

जियोस्पेशियल डेटा में किसी आंकड़े के साथ अक्षांश और देशांतर जुड़ने से उसकी सटीक भौगोलिक स्थिति निर्धारित की जा सकती है। इससे बारिश, समुद्री परिस्थितियों, संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों और विभिन्न प्राकृतिक घटनाओं को नक्शे पर समझना आसान होता है।

विशेषज्ञों ने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में उपग्रहों से निर्धारित अंतराल पर आंकड़े प्राप्त किए जाते हैं, लेकिन चक्रवात जैसी गंभीर परिस्थितियों में निगरानी की आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है। लैंडफॉल के आसपास पांच से दस मिनट के अंतराल पर डेटा प्राप्त कर चक्रवात की दिशा और तीव्रता में होने वाले बदलावों पर नजर रखना संभव है।

डॉप्लर रडार से बादलों और वर्षा की निगरानी

पत्रकारों को डॉप्लर मौसम रडार की भूमिका के बारे में भी जानकारी दी गई। रडार बादलों की संरचना, उनकी गति और उनमें मौजूद नमी से संबंधित आंकड़े उपलब्ध कराते हैं, जिनके आधार पर वर्षा की संभावना का आकलन किया जाता है।

हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि मानसूनी परिस्थितियों और तेजी से बदलते बादलों के कारण किसी एक स्थान पर बारिश के बिल्कुल सटीक समय और मात्रा का पूर्वानुमान अभी भी वैज्ञानिक चुनौती बना हुआ है।

हिमालयी क्षेत्र में अंतरिक्ष तकनीक की बढ़ती भूमिका

उत्तराखंड के पत्रकारों के सवालों पर हिमालयी क्षेत्र में अंतरिक्ष आधारित निगरानी की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने बताया कि भूकंप, भूस्खलन और ग्लेशियरों से जुड़ी गतिविधियों के अध्ययन में रिमोट सेंसिंग और अन्य अंतरिक्ष आधारित तकनीकों का महत्व लगातार बढ़ रहा है।

निसार मिशन का उल्लेख करते हुए बताया गया कि माइक्रोवेव सेंसर से प्राप्त आंकड़े धरातल में होने वाले बदलावों, भूस्खलन और ग्लेशियरों से संबंधित गतिविधियों के अध्ययन में उपयोगी हो सकते हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि हर आपदा की निगरानी के लिए एक ही तकनीक पर्याप्त नहीं होती। मौसम रडार मुख्य रूप से बादलों और वर्षा की निगरानी में उपयोगी हैं, जबकि भूकंप की निगरानी के लिए भूकंपीय स्टेशन और अन्य वैज्ञानिक प्रणालियों की आवश्यकता होती है। विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का समन्वित विश्लेषण ही आपदा निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाता है।

वैज्ञानिक सेवाओं से मछुआरों की आजीविका को भी लाभ

आईएनसीओआईएस की वैज्ञानिक सेवाओं का एक महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष समुद्र पर निर्भर मछुआरा समुदाय से भी जुड़ा है। उपग्रह आधारित आंकड़ों के वैज्ञानिक विश्लेषण के माध्यम से संभावित मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों की जानकारी तैयार की जाती है। इसमें संभावित क्षेत्र की दिशा, दूरी और समुद्र की गहराई जैसी जानकारियां शामिल होती हैं।

इससे अंतरिक्ष और महासागर विज्ञान तकनीक का सीधा संबंध आम लोगों की आजीविका से सामने आता है। उपग्रहों से प्राप्त आंकड़ों को वैज्ञानिक विश्लेषण के बाद ऐसी उपयोगी सूचनाओं में बदला जाता है, जिनका इस्तेमाल समुद्र पर निर्भर समुदाय अपने दैनिक कार्य में कर सकते हैं

संचार और आउटरीच कार्यक्रमों की दी जानकारी:

अध्ययन दौरे के पहले दिन प्रतिनिधिमंडल ने पीआईबी हैदराबाद का भी दौरा किया और केंद्र सरकार की नीतियों, कार्यक्रमों एवं जनकल्याणकारी पहलों को जनता तक पहुंचाने के लिए किए जा रहे संचार एवं आउटरीच कार्यों की जानकारी ली।

इस अवसर पर प्रतिनिधिमंडल ने पीआईबी हैदराबाद की अपर महानिदेशक श्रुति पाटिल, संयुक्त निदेशक डॉ. मानस कृष्णकांत और अन्य अधिकारियों के साथ संवाद किया। अधिकारियों ने पत्रकारों को तेलंगाना के बदलते मीडिया परिदृश्य तथा केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं और पहलों के संबंध में सूचना के प्रसार में पीआईबी की भूमिका के बारे में जानकारी दी।

श्रुति पाटिल ने बताया कि पीआईबी और केंद्रीय संचार ब्यूरो (सीबीसी) विभिन्न संचार माध्यमों तथा आउटरीच गतिविधियों के जरिए केंद्र सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों को आमजन तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बदलते मीडिया परिदृश्य में तथ्यपरक और विकासोन्मुख पत्रकारिता की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने प्रेस अध्ययन दौरों को पत्रकारों को सरकारी संस्थानों, विकास परियोजनाओं और जनहित से जुड़ी पहलों की प्रत्यक्ष जानकारी उपलब्ध कराने का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने उत्तराखंड के पत्रकारों से हैदराबाद दौरे के दौरान प्राप्त अनुभवों और जानकारी को अपने पाठकों एवं दर्शकों तक पहुंचाने का आग्रह किया।

प्रतिनिधिमंडल ने पीआईबी अधिकारियों के साथ मीडिया, संचार रणनीति और केंद्र सरकार की विकासपरक पहलों के प्रचार-प्रसार से जुड़े विभिन्न विषयों पर भी विचार-विमर्श किया।

हैंडलूम प्रदर्शनी में दिखी भारत की समृद्ध बुनकरी और हस्तशिल्प परंपरा

अध्ययन दौरे के दौरान उत्तराखंड के पत्रकारों ने भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के अंतर्गत हैदराबाद में आयोजित हैंडलूम एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया।

प्रदर्शनी में देश के विभिन्न हिस्सों की पारंपरिक बुनकरी, हस्तशिल्प और कला की समृद्ध विरासत को एक मंच पर प्रस्तुत किया गया। इसमें कोलकंदा हैंडीक्राफ्ट, तेलंगाना की प्रसिद्ध निर्मल पेंटिंग और तेलंगाना स्क्रॉल पेंटिंग सहित विभिन्न पारंपरिक कलाओं और हस्तशिल्प उत्पादों को प्रदर्शित किया गया।

पत्रकारों ने विभिन्न राज्यों से आए बुनकरों, शिल्पियों और कलाकारों के उत्पादों को देखा और उनके निर्माण की पारंपरिक तकनीकों और विशेषताओं की जानकारी ली।

प्रतिनिधिमंडल ने समझा कि हैंडलूम और हस्तशिल्प केवल भारत की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि लाखों बुनकरों, शिल्पियों और उनके परिवारों की आजीविका का महत्वपूर्ण आधार भी हैं। प्रदर्शनी ने सांस्कृतिक संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय रोजगार, स्वरोजगार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े पहलुओं को भी सामने रखा।

प्रदर्शनी में पारंपरिक कलाओं और स्थानीय उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने तथा बुनकरों और शिल्पियों को व्यापक उपभोक्ता वर्ग से जोड़ने के प्रयास भी देखने को मिले।

वैज्ञानिक संस्थानों से ऐतिहासिक विरासत तक पहुंचेगा अध्ययन दौरा

अध्ययन दौरे के आगामी चरण में प्रतिनिधिमंडल भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पोषण संस्थान (आईसीएमआर-एनआईएन) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) अस्पताल का दौरा करेगा।

इसके अलावा सालार जंग संग्रहालय, चारमीनार और लाड बाजार के भ्रमण के माध्यम से पत्रकारों को हैदराबाद की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।

पांच दिवसीय अध्ययन दौरे का उद्देश्य पत्रकारों को तेलंगाना में केंद्र सरकार की प्रमुख विकास गतिविधियों, वैज्ञानिक संस्थानों, तकनीकी उपलब्धियों, जनकल्याणकारी पहलों और सांस्कृतिक विरासत की प्रत्यक्ष जानकारी उपलब्ध कराना है, ताकि इन अनुभवों और सूचनाओं को व्यापक स्तर पर आमजन तक पहुंचाया जा सके।

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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश कुमार पांडेय