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आयुर्वेद रोग नहीं, पूरे व्यक्ति के स्वास्थ्य को देखता है : डॉ. अवनीश

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आयुर्वेद रोग नहीं, पूरे व्यक्ति के स्वास्थ्य को देखता है : डॉ. अवनीश


आयुर्वेद रोग नहीं, पूरे व्यक्ति के स्वास्थ्य को देखता है : डॉ. अवनीश


आयुर्वेद रोग नहीं, पूरे व्यक्ति के स्वास्थ्य को देखता है : डॉ. अवनीश


हरिद्वार, 23 सितंबर (हि.स.)। देशभर में बुधवार को 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इस वर्ष आयुर्वेद दिवस की थीम “स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद” रखी गई है। इस अवसर पर बदलती जीवनशैली और बढ़ती स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बीच आयुर्वेद की भूमिका, उसके महत्व और स्वस्थ जीवन के लिए इसकी उपयोगिता को लेकर राष्ट्रीय आयुष मिशन हरिद्वार के प्रभारी एवं उत्तराखंड आयुर्वेद विश्वविद्यालय के हरिद्वार स्थित ऋषिकुल परिसर में आयुर्वेद परामर्श चिकित्सक डॉ. अवनीश कुमार उपाध्याय तथा जीवनशैली एवं योग विशेषज्ञ डॉ. रुचिता त्रिपाठी उपाध्याय से विशेष बातचीत की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश--

सवाल: इस वर्ष की थीम का मुख्य संदेश क्या है?

डॉ. अवनीश: इस वर्ष का जोर आयुर्वेद को केवल परंपरागत चिकित्सा पद्धति के रूप में देखने के बजाय वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार, समन्वित स्वास्थ्य सेवाओं और समुदाय के स्वास्थ्य से जोड़ने पर है। आयुर्वेद का मूल दर्शन केवल बीमारी के बाद उपचार तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य है - स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के विकारों का शमन। आज के समय में यही दृष्टिकोण सबसे प्रासंगिक है।

सवाल: बदलती जीवनशैली से स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ रहा है?

डॉ. अवनीश: आज लंबे समय तक बैठकर काम करना, शारीरिक सक्रियता की कमी, अनियमित भोजन, अत्यधिक कैलोरी और अति-प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का सेवन, अपर्याप्त नींद और लगातार मानसिक तनाव आम हो गया है। इससे मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोग बढ़ रहे हैं। इसलिए स्वास्थ्य व्यवस्था का लक्ष्य केवल दवा देना नहीं, बल्कि व्यक्ति के आहार, दिनचर्या, नींद, व्यायाम और मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रबंधन में शामिल करना होना चाहिए। आयुर्वेद की खासियत यही है कि वह रोग को नहीं, पूरे व्यक्ति को देखता है।

सवाल: पोषण को लेकर आयुर्वेद क्या कहता है?

डॉ. अवनीश: आयुर्वेद में आहार को स्वास्थ्य का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना गया है। आधुनिक विज्ञान भी इसे मानता है। इसका अर्थ किसी एक चमत्कारी भोजन को सब रोगों का समाधान मानना नहीं है। संतुलित, विविधतापूर्ण और व्यक्ति की आवश्यकता के अनुरूप भोजन ही महत्वपूर्ण है। अनाज, दालें, सब्जियां, फल, पर्याप्त प्रोटीन, स्वस्थ वसा और उचित मात्रा में पानी का सेवन आयु, गतिविधि और स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार होना चाहिए।

सवाल: केवल भोजन ही पर्याप्त नहीं है?

डॉ. रुचिता: जी, बिल्कुल। स्वस्थ जीवन केवल यह तय करने से नहीं बनता कि हम क्या खाते हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम कब खाते हैं, कितनी शारीरिक सक्रियता रखते हैं, हमारी नींद कैसी है और तनाव को कैसे नियंत्रित करते हैं। योग, श्वास-अभ्यास, ध्यान और नियमित दिनचर्या व्यक्ति को अनुशासित बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

सवाल: हृदय और चयापचय स्वास्थ्य में क्या ध्यान देना चाहिए?

डॉ. अवनीश: उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा और असामान्य लिपिड प्रोफाइल लंबे समय में हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। ऐसे में केवल रिपोर्ट को नियंत्रित करना काफी नहीं है। वजन, कमर की परिधि, आहार, शारीरिक गतिविधि, नींद, तनाव, तंबाकू और शराब जैसे जोखिम कारकों को भी संबोधित करना जरूरी है। आयुर्वेद की आहार-विहार की अवधारणाओं का उपयोग आधुनिक जांच और उपचार के साथ प्रमाण-आधारित तरीके से किया जा सकता है।

सवाल: क्या आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा में समन्वय संभव है?

डॉ. अवनीश: हां, प्रतिस्पर्धा नहीं, सहयोग का दृष्टिकोण चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि हर रोग में हर पद्धति समान रूप से प्रभावी है। रोग-विशेष, औषधि-विशेष और उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाण को देखना जरूरी है। कुछ क्षेत्रों में अभी प्रमाण सीमित हैं और बेहतर गुणवत्ता वाले परीक्षणों की आवश्यकता है। हमारा मंत्र होना चाहिए - परंपरा का सम्मान, प्रमाण का अनुसरण और रोगी की सुरक्षा सर्वोपरि। गंभीर और जीवन-घातक स्थिति में आधुनिक चिकित्सा में रेफरल में देरी नहीं होनी चाहिए।

सवाल: पंचकर्म और योग को लेकर क्या सलाह है?

डॉ. रुचिता: पंचकर्म की अपनी विशिष्ट चिकित्सकीय अवधारणा है, लेकिन इसे हर व्यक्ति पर स्वतः लागू करना उचित नहीं। रोगी की आयु, शक्ति, रोग की अवस्था और चल रही दवाओं का मूल्यांकन जरूरी है। वहीं योग को केवल शारीरिक व्यायाम न समझें। क्षमता के अनुरूप सरल आसन, प्राणायाम, ध्यान और विश्राम को दिनचर्या का हिस्सा बनाना अधिक महत्वपूर्ण है।

अंत में डॉ. अवनीश ने कहा कि स्वास्थ्य की शुरुआत अस्पताल से नहीं होती। विद्यालयों, कार्यस्थलों और समुदाय में जागरूकता, पोषण शिक्षा, योग और समय पर जांच से ही स्वस्थ भविष्य बनेगा। इसके लिए पांच सरल प्रतिज्ञाएं जरूरी हैं - संतुलित भोजन, रोज नियमित सक्रियता व व्यायाम, पर्याप्त नींद, मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान और समय पर चिकित्सकीय जांच।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला