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खादी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है: बसवप्रभु होसकेरी

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खादी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है: बसवप्रभु होसकेरी


धारवाड़, 23 मई (हि.स.)। कर्नाटक के धारवाड़ तालुक क्षेत्रीय सेवा संघ के अध्यक्ष, कर्नाटक विद्यावर्धक संघ के कार्याध्यक्ष और गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र धारवाड़ के महासचिव बसवप्रभु होसकेरी ने कहा कि खादी को केवल कपड़ा समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। यह एक जीवन पद्धति, आर्थिक-सामाजिक विचारधारा और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। खादी खरीदना केवल वस्त्र खरीदना नहीं, बल्कि किसान, सूत कातने वाले, बुनकर और ग्रामीण समाज के जीवन को सहारा देना है।

बसवप्रभु होसकेरी ने हिन्दुस्थान समाचार के साथ बातचीत में गांधीवाद, खादी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और राष्ट्रध्वज निर्माण के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि खादी के पीछे केवल वस्त्र निर्माण नहीं, बल्कि राष्ट्रीयता, स्वावलंबन और मानवीय मूल्यों की एक व्यापक सोच छिपी हुई है।

होसकेरी ने बताया कि वे कॉलेज जीवन से ही खादी पहनते आ रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के “संपूर्ण क्रांति आंदोलन” के युवा संगठन “छात्र युवा संघर्ष वाहिनी” से जुड़ने और बाद में गांधी शांति प्रतिष्ठान धारवाड़ के संपर्क में आने के बाद उनके भीतर खादी के प्रति गहरी निष्ठा विकसित हुई। तब से लेकर आज तक वह केवल खादी पहनते हैं।

धारवाड़ तालुक के गरग गांव स्थित धारवाड़ तालुक क्षेत्रीय सेवा संघ का केंद्र भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) से मान्यता प्राप्त राष्ट्रध्वज निर्माण केंद्र है। हाथ से बुने गए राष्ट्रीय ध्वज बनाने की अनुमति रखने वाले देश के चुनिंदा केंद्रों में इसका विशेष स्थान है।

होसकेरी ने बताया, “1975 में देश में केवल दो केंद्रों को आधिकारिक रूप से राष्ट्रध्वज निर्माण की अनुमति प्राप्त थी। एक महाराष्ट्र के उदगीर का खादी केंद्र और दूसरा धारवाड़ का गरग खादी केंद्र।” उन्होंने कहा कि गरग खादी केंद्र को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में पूर्व अध्यक्ष शंकरराव कुर्तकोटी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कहा कि खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग से यह जिम्मेदारी लाने में शंकरराव कुर्तकोटी सफल हुए। कड़े गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के बाद गरग केंद्र ने राष्ट्रीय प्रतिष्ठा हासिल की।

होसकेरी ने गर्व से कहा कि गरग केंद्र में निर्मित राष्ट्रध्वज राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, लाल किला, उच्चतम न्यायालय, विभिन्न विधानसभाओं, सैन्य प्रतिष्ठानों और भारतीय दूतावासों पर फहराए जाते हैं। उन्होंने कहा कि हमारे यहां बने तिरंगे देश की सबसे प्रतिष्ठित इमारतों पर लहराते हैं। यह केवल गरग गांव ही नहीं, बल्कि पूरे कर्नाटक के लिए गर्व की बात है।

उन्होंने बताया कि गरग केंद्र में प्रतिवर्ष लगभग 35 से 40 हजार मीटर खादी कपड़े का उत्पादन होता है, जिसमें 25 से 30 हजार मीटर कपड़ा राष्ट्रध्वज निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है। आसपास के सात गांवों के सूत कातने वाले और बुनकर इस कार्य से जुड़े हुए हैं। ध्वज निर्माण से प्रतिवर्ष लगभग 1.2 से 1.5 करोड़ रुपये का कारोबार होता है।

होसकेरी ने आगे बताया कि तिरंगे के निर्माण में गुणवत्ता का अत्यंत ध्यान रखा जाता है। उन्होंने कहा कि ध्वज निर्माण में 36 काउंट की उच्च गुणवत्ता वाली जयधर कपास का उपयोग किया जाता है। कपड़े में 40 वार्प और 38 वेफ्ट होते हैं। प्रति वर्ग मीटर कपड़े का वजन 205 ग्राम ±5 से 10 ग्राम होना आवश्यक है। कपड़ा बुनने के बाद उसे मुंबई के खादी डायर एंड प्रिंटर्स के पास रंगाई और सिलाई के लिए भेजा जाता है। इसके बाद परीक्षण किया जाता है।

उन्होंने बताया कि राष्ट्रध्वज नौ अलग-अलग आकारों में तैयार किए जाते हैं, जिनमें से छह आकारों को बीआईएस प्रमाणन प्राप्त होता है। सबसे बड़ा ध्वज 14×21 फीट और सबसे छोटा 2×3 फीट का होता है। अधिकांश ध्वज नई दिल्ली स्थित खादी भवन भेजे जाते हैं, जहां से वे देशभर में पहुंचते हैं।

बसवप्रभु होसकेरी ने आगे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को लेकर कहा कि गांधी केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्य, अहिंसा और मानवता की विचारधारा हैं। उन्होंने कहा कि भारत का स्वतंत्रता आंदोलन गांधीजी के आने से पहले भी जारी था, लेकिन गांधी ने उसे जनांदोलन का रूप दिया। गांधी ने चंपारण आंदोलन से संघर्ष शुरू किया और बाद में भारत छोड़ो आंदोलन तक अनेक आंदोलनों का नेतृत्व किया। होसकेरी ने कहा कि अहिंसा के माध्यम से न्याय के लिए संघर्ष करने वाले हर व्यक्ति में गांधी का प्रभाव दिखाई देता है।

खादी क्या है?

होसकेरी ने कहा कि ब्रिटिश शासन को हटाना राजनीतिक संघर्ष था, लेकिन देश के लोगों को आर्थिक और सामाजिक संकट से मुक्त करना उसका मूल उद्देश्य था। खादी उसी उद्देश्य का एक महत्वपूर्ण माध्यम थी। उन्होंने कहा, “लोग खादी को सामान्य कपड़े की तरह देखते हैं, जबकि इसके पीछे एक संपूर्ण आर्थिक व्यवस्था, मानवीय मूल्य और आत्मनिर्भरता की सोच छिपी हुई है।”

उन्होंने कहा कि लोगों में यह धारणा है कि खादी महंगी है, उसकी देखभाल कठिन है और वह आकर्षक नहीं दिखती। उन्होंने कहा, “एक समय कृत्रिम रेशों से बने कपड़े महंगे हुआ करते थे, लेकिन आज वे सस्ते हो गए हैं, जबकि शुद्ध सूती, रेशमी और ऊनी वस्त्र महंगे हो गए हैं। खादी को नियमित रूप से इस्त्री करनी पड़ती है और उसे सिंथेटिक कपड़ों की तरह कई दिनों तक लगातार नहीं पहना जा सकता।”

खादी की आर्थिक संरचना समझाते हुए उन्होंने कहा, “यदि कोई व्यक्ति 100 रुपये की खादी खरीदता है तो उसमें से लगभग 50 रुपये सीधे सूत कातने वालों और बुनकरों तक पहुंचते हैं। 33 रुपये कच्चे माल पर, 8 रुपये प्रशासनिक खर्च पर और 9 रुपये परिवहन पर खर्च होते हैं।” उन्होंने कहा कि खादी खरीदने से कपास, रेशम, ऊन और जूट पैदा करने वाले किसानों तथा ग्रामीण श्रमिकों को प्रत्यक्ष सहायता मिलती है। उन्होंने कहा कि कृषि के बाद यदि कोई क्षेत्र पूरे वर्ष रोजगार देने की क्षमता रखता है, तो वह खादी है। यह गांवों में ही रोजगार पैदा कर शहरों की ओर पलायन और अनियंत्रित शहरीकरण को रोक सकती है। उन्होंने अंत में कहा, “खादी पहनना केवल कपड़ा पहनना नहीं, बल्कि मानवता, स्वावलंबन और ग्रामीण भारत के जीवन से जुड़ना है।”

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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश एम.बी.