प्रश्नाेत्तर सत्र : अग्निवीर योजना में सुधार पर विचार होना चाहिए: डॉ भागवत
देहरादून, 23 फ़रवरी (हि.स.)। संघ शताब्दी हिमालयन कल्चरल सेंटर के प्रेक्षागृह में पूर्व सैनिकों और पूर्व सेना अधिकारियों के साथ विशेष संवाद गोष्ठी के प्रश्नोत्तर सत्र में संघ के सरसंघचालक डॉ माेहन भागवत ने पूर्व सैनिकों ने कई राष्ट्रीय व राज्य स्तर के प्रश्नों के उत्तर दिए।
विचारधारा, धर्म और हिंदू पहचान पर दृष्टिकोण को लेकर पूछे गए सवाल के उत्तर में डॉ भागवत ने कहा कि भारतीय दृष्टि जड़-चेतन को अपना मानती है और “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना से कार्य करती है। धर्म मानवता और समाज की धारणा को धारण करने वाला तत्व है, जिसे छोड़ देने पर सामाजिक आधार कमजोर हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हिंदू विचार उदार है और बिना किसी परिवर्तन के भी कोई व्यक्ति हिंदू समाज में सम्मिलित हो सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, अग्निवीर योजना और क्षेत्रीय चुनौतियां से संबंधित एक सवाल के उत्तर में उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए उत्कृष्ट नेतृत्व की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि अग्निवीर का पहला बैच निकलने वाला है और अग्निवीर योजना एक प्रयोग के रूप में लिया गया है। अनुभव के आधार पर इसमें सुधार की गुंजाइश पर विचार होना चाहिए। क्षेत्रीय रणनीतिक मुद्दों पर उन्होंने नेपाल, बांग्लादेश और कश्मीर का उल्लेख करते हुए कहा कि संपूर्ण कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग है और इसके साथ भारत के कई पड़ोसी देश पहले भारत के हिस्सा थे, उनमें भी भारत के प्रति भाव है और उन्हें भी भारत के साथ रहना ही चाहिए। बड़े देश उन्हें निगल सकते हैं, उन्हें यह भी ध्यान में रखना चाहिए। इसलिए भारत का साथ उन्हें भी चाहिए।
सामाजिक समरसता, संवाद और सोशल मीडिया पर वैचारिक कटुता के सवाल पर डाॅ भागवत ने कहा कि कटुता के बजाय शास्त्रार्थ और संवाद की आवश्यकता है। सामाजिक समरसता को बनाए रखने के लिए मंदिर, पानी और श्मशान जैसे सार्वजनिक संसाधन सभी हिंदुओं के लिए खुले होने चाहिए। उन्होंने परामर्श प्रक्रिया में जमीनी स्तर पर सीधे संवाद और फीडबैक लेने पर जोर दिया। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक सुधार और चरित्र निर्माण पर उन्होंने कहा कि पानी में मछली जल कब पीती है, पता ही नहीं चलता। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार पर अंकुश जरूरी है। उन्होंने इसे केवल संरचना नहीं बल्कि “नियत” का प्रश्न बताया। बच्चों में चरित्र निर्माण, कमाई में बचत और समाज के लिए वितरण की भावना विकसित करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि स्वार्थ से ऊपर उठकर परोपकार में सुख खोजने की प्रवृत्ति ही राष्ट्र के निर्माण का आधार है।
युवा, जनसांख्यिकी, आरक्षण और समान नागरिक संहिता पर डाॅ भागवत ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास के क्षेत्र में अपार अवसर हैं, विशेषकर गढ़वाल जैसे क्षेत्रों में पलायन रोकने के लिए विशेष प्रयास जरूरी हैं। समान नागरिक संहिता को उन्होंने राष्ट्रीय एकात्मता का साधन बताया और कहा कि इससे विवाद कम हो सकते हैं। आरक्षण पर उन्होंने धैर्य और व्यापक सामाजिक सहमति की आवश्यकता जताई। जनसंख्या असंतुलन के मुद्दे पर उन्होंने मतांतरण, घुसपैठ और जन्मदर को कारण बताते हुए समग्र नीति बनाने की बात कही। सेना में भर्ती की व्यक्तिगत इच्छा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों के साथ-साथ समाज के भीतर भी सेवा और संघर्ष की आवश्यकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ विनोद पोखरियाल

