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राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा प्रदर्शनी का किया अवलोकन, कहा-यह समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत की परंपराएं हैं

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राष्ट्रपति ने बस्तर दशहरा प्रदर्शनी का किया अवलोकन, कहा-यह समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत की परंपराएं हैं


जगदलपुर, 23 अक्टूबर (हि.स.)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शुक्रवार को विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा के अंतर्गत लालबाग मैदान में लगायी गई प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, जनजातीय परंपराओं और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित प्रदर्शनी का अवलोकन किया।

इस प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा की विभिन्न विधाओं, पारंपरिक पूजा-अनुष्ठानों, रथ निर्माण की विशिष्ट तकनीक, देवी-देवताओं की आराधना, जनजातीय समुदायों की भागीदारी और ऐतिहासिक परंपराओं को आकर्षक चित्रों एवं विस्तृत विवरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।

राष्ट्रपति मुर्मु ने कहा कि बस्तर दशहरा प्रदर्शनी देश की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से बस्तर की सदियों पुरानी परंपराओं, देवी-देवताओं के प्रति अटूट आस्था, जनजातीय समुदायों की विशिष्ट भूमिका और ऐतिहासिक सांस्कृतिक पहचान का व्यापक परिचय प्रस्तुत किया गया है। उन्होंने बस्तर दशहरा प्रदर्शनी का तन्मयता के साथ अवलोकन किया और यहां की अनुपम लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता और प्रकृति एवं आस्था के अद्भुत समन्वय की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

गौरतलब है कि बस्तर दशहरा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि बस्तर की विभिन्न जनजातीय समाज की सामूहिक आस्था, सांस्कृतिक एकता, पारंपरिक ज्ञान और सामाजिक सहभागिता का अद्वितीय उदाहरण है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह महापर्व देश के अन्य स्थानों पर मनाए जाने वाले दशहरा उत्सवों से अलग अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यह दशहरा मुख्य रूप से आराध्य देवी मां दंतेश्वरी और क्षेत्रीय देवी-देवताओं की आराधना तथा लोक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

प्रदर्शनी में बस्तर दशहरा के प्रारंभ से समापन तक संपन्न होने वाले प्रमुख अनुष्ठानों को क्रमबद्ध रूप से दर्शाया गया। इसमें पाट जात्रा, डेरी गड़ाई, बारसी उतरानी, नार फोड़नी, रथ निर्माण, काछिन गादी, कलश स्थापना, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, बेल निवता, निशा जात्रा, मावली परघाव, भीतर रैनी, बाहर रैनी, मुरिया दरबार तथा कुटुम्ब जात्रा जैसी विशिष्ट परंपराओं का समावेश किया गया।

प्रदर्शनी में बताया गया कि बस्तर दशहरा की शुरुआत श्रावण अमावस्या अर्थात हरियाली अमावस्या को पाट जात्रा से होती है। इस अवसर पर रथ निर्माण के लिए जंगल से लाई गई लकड़ी के विशाल तने, जिसे स्थानीय हल्बी भाषा में ठुरलु खोटला कहा जाता है, की विधिवत पूजा की जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक अर्पण एवं बलि की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद रथ निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इस अनुष्ठान का उद्देश्य देवी-देवताओं का आह्वान कर दशहरा पर्व के निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना करना है।

बस्तर दशहरा प्रदर्शनी में यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि महापर्व के आयोजन में विभिन्न जनजातीय एवं स्थानीय समुदायों की परंपरागत जिम्मेदारियां निर्धारित हैं। कोई समुदाय रथ निर्माण करता है, कोई लकड़ी उपलब्ध कराता है, कोई रथ के लिए रस्सी तैयार करता है, तो कोई पूजा सामग्री, देवी-देवताओं के स्वागत, आरती और धार्मिक अनुष्ठानों का निर्वहन करता है। इस प्रकार बस्तर दशहरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें वन संसाधनों का पारंपरिक उपयोग, लोक शिल्प, सामाजिक संगठन, महिला सहभागिता, जनसंवाद, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक श्रम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। ________________

हिन्दुस्थान समाचार / राकेश पांडे