भारत का विभाजन मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक पलायनों में से एक था : उपराष्ट्रपति
नई दिल्ली, 14 अगस्त (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शुक्रवार को कहा कि भारत का विभाजन मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक पलायनों में से एक था और इसके दूरगामी प्रभाव आज भी महसूस किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विभाजन केवल सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था बल्कि हजारों वर्षों से जुड़ी साझा सभ्यतागत विरासत को भी बांट दिया गया।
राधाकृष्णन ने विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता एवं विभाजन अध्ययन केंद्र तथा भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (आईसीएचआर) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ये बातें कहीं। संगोष्ठी का विषय ‘भारत का विभाजन- उजड़ने, बिछड़ने और बसने की गाथा’ था।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन को याद करने का उद्देश्य पुराने घावों को कड़वाहट के साथ फिर से खोलना नहीं बल्कि देश में एकता और सद्भाव को मजबूत करना है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र को विभाजन के दौरान पीड़ा और बलिदान झेलने वाले लोगों को याद करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक शासन से मुक्ति के साथ देश को स्वतंत्रता मिली लेकिन इसके साथ अभूतपूर्व त्रासदी भी आई। विभाजन के दौरान हुआ व्यापक विस्थापन मानव इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक पलायनों में से एक था और यह विभाजन तथा नफरत के विनाशकारी परिणामों की गंभीर चेतावनी है।
राधाकृष्णन ने कहा, “हमारे बच्चों को विभाजन की सच्चाई जानने का अधिकार है।” उन्होंने कहा कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी को पाठ्य-पुस्तक की कुछ पंक्तियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। अतीत को याद रखना जरूरी है, ताकि उसकी त्रासदियों को दोहराने से बचा जा सके।
विभाजन के दीर्घकालिक प्रभावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जल्दबाजी में खींची गई सीमाओं ने ऐसे विवादों को जन्म दिया, जिनका असर आज भी दिखाई देता है। विभाजन का प्रभाव भारत की रक्षा नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों पर भी पड़ा है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं का पुनर्निर्धारण नहीं था बल्कि इसने हजारों वर्षों से आपस में जुड़े सभ्यतागत भू-दृश्य को भी विभाजित कर दिया। उन्होंने सिंधु नदी, करतारपुर साहिब, ननकाना साहिब, प्राचीन शक्तिपीठों तथा हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और तक्षशिला जैसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और पुरातात्विक स्थलों का उल्लेख किया, जिन तक पहुंच विभाजन के कारण प्रभावित हुई।
उन्होंने संकट के समय नेतृत्व और जिम्मेदार निर्णय लेने के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि व्यापक राष्ट्रीय हित में कठिन फैसले लेने के लिए राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प जरूरी है। उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा से जुड़े फैसले पर्याप्त अग्रिम सूचना के साथ लिए जाने चाहिए और हर व्यक्ति की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
राधाकृष्णन ने नागरिकों से संकीर्ण पहचान से ऊपर उठकर राष्ट्र को प्राथमिकता देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कोई जाति, भाषा या क्षेत्र राष्ट्र से अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। प्रत्येक भारतीय को भारतीय होने पर गर्व करना चाहिए और उस साझा सभ्यतागत विरासत एवं राष्ट्रीय पहचान के प्रति जागरूक रहना चाहिए, जो देश को जोड़ती है।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने विभाजन के 15 पीड़ितों को उनके साहस, दृढ़ता और विभाजन की स्मृतियों एवं अनुभवों को संरक्षित रखने में योगदान के लिए सम्मानित किया। उन्होंने विद्यार्थियों को ‘नशा नहीं’ की शपथ भी दिलाई और युवा पीढ़ी से नशे से दूर रहने तथा स्वस्थ, जिम्मेदार और रचनात्मक विकल्प अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस देश को यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता अनमोल है, एकता आवश्यक है और शांति को कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता।
इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने आईसीएचआर और दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से लगाई गई प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनी विभाजन की भारी मानवीय कीमत की प्रभावशाली याद दिलाती है। कार्यक्रम में दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह, आईसीएचआर के अध्यक्ष प्रो. रघुवेंद्र तंवर, कॉलेजों के डीन प्रो. बलराम पाणि, रजिस्ट्रार डॉ. विकास गुप्ता सहित शिक्षाविद, शोधार्थी, विद्यार्थी और विभाजन पीड़ित उपस्थित थे।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

