ऑन स्क्रीन मार्किंग : विवाद और समाधान

सीबीएसई की ऑन स्क्रीन मार्किंग विवादों के घेरे में है | लाखों छात्र और अभिभावक परेशान हैं | परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद से ही ऑन स्क्रीन मार्किंग पर सवाल उठने लगे थे | तमाम छात्रों ने उम्मीद से कहीं कम मार्क्स मिलने पर निराशा जाहिर की थी | उसके बाद जब बोर्ड ने छात्रों को उनकी कॉपियां उपलब्ध कराईं तो अलग ही स्तर की गड़बड़ियाँ सामने आईं | अब ये एकदम स्पष्ट है कि बोर्ड ने बिना समुचित तैयारी के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम लागू किया | किसी भी नए सिस्टम को लागू करने के लिए समुचित प्रशिक्षण, तकनीकी ढांचा उपलब्ध कराया जाना अनिवार्य है | लेकिन अफ़सोस बोर्ड ऐसा कुछ भी करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ | बढ़ते विवाद के बीच कई ऐसे शिक्षक सामने आये हैं जिन्होंने खुलकर कहा है कि उन्हें ऑन स्क्रीन मार्किंग की समुचित ट्रेनिंग नहीं दी गई | जो ट्रेनिंग दी भी गई वो एकदम नयी मार्किंग प्रणाली को ढंग से समझने के लिए पर्याप्त नहीं थी | शायद बोर्ड का मकसद पर्याप्त ट्रेनिंग उपलब्ध कराने के बजाय खानापूर्ति करना अधिक था |
सीबीएसई की तरफ से 9 फरवरी 2026 को एक प्रेस रिलीज जारी की गई जिसमें उसने बताया कि इस बार बारहवीं की कॉपियां मैन्युअल तरीके से नहीं बल्कि ऑन स्क्रीन मार्किंग के माध्यम से जाँची जाएँगी | प्रेस रिलीज में बताया गया कि ऑन स्क्रीन मार्किंग ‘दक्षता और पारदर्शिता’ यानी ‘एफीशियेंसी और ट्रांसपेरेंसी’ बढ़ाने के लिए लागू की जा रही है | लेकिन फ़िलहाल जो कुछ सामने आ रहा है उससे इतना तो स्पष्ट है कि ऑन स्क्रीन मार्किंग से न तो दक्षता ही बढ़ी न ही पारदर्शिता | उलटे इसने लाखों छात्रों के भविष्य को अंधकार में डाल दिया | हद तो तब हो गई डिजिटल मार्किंग सिस्टम लागू करने वाला बोर्ड अपना पोर्टल तक ढंग से नहीं चला पाया | अपनी कॉपियां चेक करने के लिए अप्लाई करने वाले छात्र पोर्टल पर जूझते रहे लेकिन पोर्टल पर अप्लाई करना भी उनके लिए एक और परीक्षा साबित हुई | बोर्ड ने भले ही प्रति सब्जेक्ट सौ रूपये की फीस निर्धारित कर रखी थी लेकिन पोर्टल पर कई बार ये फीस हजारों में दिखी | कईयों की फीस कई बार कट गई तो कईयों की फीस कटने के बाद कन्फर्मेशन मैसेज ही नहीं आया | कईयों की फीस जमा होने के बाद भी कॉपी नहीं मिली तो कईयों के पास अलग अलग सब्जेक्ट के बजाय एक ही सब्जेक्ट की कॉपी कई बार पहुँच गई | ध्वस्त हो चुके पोर्टल के चलते बोर्ड को रजिस्ट्रेशन की तारीख बार बार बढ़ाने को मजबूर होना पड़ा | यहाँ तक कि उन्हें आईआईटी के विशेषज्ञों की मदद भी लेनी पड़ी | बेहतर होता ये काम पहले ही कर लिया जाता |
वेदांत के मामले ने तो बोर्ड और ऑन स्क्रीन मार्किंग की कलई ही खोलकर रख दी | जो कॉपी उसे भेजी गई वो उसकी थी ही नहीं | ऐसे दावे बाद में कई अन्य छात्रों ने भी किये | एक तस्वीर ऐसी भी वायरल हुई जिसमें लिखे हुए पेज पर ब्लैंक पेज की मुहर लगी हुई थी | छात्रों के साथ इससे भद्दा मजाक नहीं हो सकता | ऐसे समय में जब बारहवीं की परीक्षा पास कर लेने के बाद छात्रों को आगे की पढ़ाई की चिंता होनी चाहिए तब वो बेचारे दूसरी ही परीक्षा देने में लगे हुए हैं | जब उन्हें अपने भविष्य की तैयारी में जुटा होना चाहिए तब वो किसी और की गलतियों का खामियाजा भुगतने को मजबूर हैं | हैरानी की बात ये भी है कि तमाम छात्र ऐसे भी हैं जिन्होंने आईआईटी मेन्स तो क्वालीफाई कर लिया है लेकिन 12 वीं में ही ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के चलते उन्हें इतने कम नम्बर मिले हैं कि आईआईटी की परीक्षा में बैठने का न्यूनतम अंक वाला मापदंड ही पूरा नहीं कर पा रहे हैं | आज के गला काट प्रतिस्पर्धी युग में जहाँ हर एक नम्बर का अलग ही महत्व होता है वहां इस प्रकार की लापरवाही अक्षम्य अपराध हैं |
हद तो ये है कि बोर्ड अभी भी अपनी गलती को मानने से साफ़ इंकार कर रहा है | इतना सब होने के बावजूद बोर्ड का कोई भी जिम्मेदार अधिकारी कुछ भी बोलने और स्थिति स्पष्ट करने से बच रहा है | इसका एक उदाहरण खुद बोर्ड ने दिया | बोर्ड ने ऑन स्क्रीन मार्किंग को लेकर एक FAQ जारी किया जो सीबीएसई की साईट पर उपलब्ध है | इसके पॉइंट नम्बर 27 में उन्होंने इन आरोपों को सिरे से नकार दिया है कि स्कैन की गई इमेजेज ब्लर यानी धुंधली थीं | इस मुद्दे के एक और पहलू पर गौर करने की जरूरत है | आखिर बोर्ड ने ऑन स्क्रीन मार्किंग की जिम्मेदारी किस एजेंसी को दी थी ? क्या वो एजेंसी इस काम में दक्ष थी | क्या उसके पास इस काम का कोई अनुभव था ? ये वो सवाल हैं जिनके जवाब बोर्ड को देने ही चाहिए | इस पूरे मामले की जांच और दोषियों को दण्डित किये जाने की जरूरत है ताकि भविष्य में कोई छात्रों के भविष्य के साथ किसी तरह का खिलवाड़ न कर सके |
छात्र इस देश का भविष्य है | छात्रों के साथ इस तरह का मजाक देश के भविष्य एक साथ मजाक है | सीबीएसई की प्रमाणिकता और विश्वसनीयता खतरे में हैं | बोर्ड ने बिना समुचित तैयारी और हड़बड़ी में जिस तरह ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम को लागू किया है उसने न सिर्फ संस्था और उसकी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाया है बल्कि लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया है | अब ऑन स्क्रीन मार्किंग में हुई गड़बड़ियों को पकड़ना या दूर करना असम्भव काम है | समस्या का समाधान तभी हो सकता है जब समस्या को स्वीकार किया जाये | बेहतर है कि बोर्ड अब ये मान ले कि ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम पूरी तरह फेल साबित हुआ है |
इस समस्या का समाधान क्या हो सकता है | इस देश में तमाम प्रतियोगी परीक्षाएं तमाम वजहों से दोबारा कराई जाती हैं | क्या बोर्ड के इन छात्रों के भविष्य को बचाने के लिए सभी कॉपियों की मैनुअल री-चेकिंग नहीं कराई जा सकती | इसके तीन फायदे होंगे | पहला - ऑन स्क्रीन मार्किंग में हुई गड़बड़ियाँ दूर की जा सकेंगी | दूसरा - ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम की विश्वसनीयता की भी जाँच हो जाएगी | तीसरा और सबसे बड़ा फायदा – हर किसी के मन में उठ रहे सवालों, शंकाओं और आक्रोश को दूर किया जा सकेगा | हाँ इस काम को युद्ध स्तर पर कराये जाने की जरूरत होगी ताकि युवाओं के भविष्य और अमूल्य समय को बचाया जा सके | काम मुश्किल लग सकता है लेकिन छात्रों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए हर प्रयास हर कीमत पर किया ही जाना चाहिए | जरूरत है तो बस सच को स्वीकार करने के साहस और गलतियों को ठीक करने के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की | बेहतर हो बोर्ड जितना जल्दी हो सके इस दिशा में प्रयास शुरू करे | ऐसा करके ही वो अपनी गिरती हुई साख, गरिमा और सबसे महत्वपूर्ण लाखों छात्रों का भविष्य बचा सकता है |

