सार्वजनिक धन की निगरानी पूरे लोकतंत्र की साझा जिम्मेदारीः ओम बिरला
नई दिल्ली, 03 नवंबर (हि.स.)। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंगलवार को कहा कि सार्वजनिक धन की निगरानी किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र की साझा जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि यह व्यवस्था दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्षता और जवाबदेही को दर्शाती है।
ओम बिरला ने केरल के तिरुवनंतपुरम में संसद और राज्य, केंद्रशासित प्रदेशों के विधानमंडलों की 'लोक लेखा समितियों (पीएसी) के पीठासीन अधिकारियों के दो दिवसीय सम्मेलन' के उद्घाटन के अवसर पर यह बात कही। उन्होंनेे सार्वजनिक धन की निगरानी, संसदीय जवाबदेही और वित्तीय जांच में एआई जैसी आधुनिक तकनीकों के इस्तेमाल पर जोर दिया। यह कार्यक्रम ऑडिट, जवाबदेही और सुशासन- पीएसी की बदलती भूमिका विषय पर आधारित है।
भारतीय लोकतंत्र में लोक लेखा समिति (पीएसी) की विशिष्ट और ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए बिरला ने कहा, आज़ादी के बाद से ही इस समिति के सभापति के रूप में विपक्ष के वरिष्ठ सदस्य को नियुक्त करने की गौरवशाली परंपरा रही है। यह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि सार्वजनिक धन की निगरानी किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र की साझा जिम्मेदारी है। यह व्यवस्था दलगत राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्षता और जवाबदेही को दर्शाती है।
बजट आवंटन और जनहित के कार्यों पर चर्चा करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि सामाजिक कल्याण की योजनाओं की सफलता का आकलन केवल इस बात से नहीं किया जा सकता कि कितना पैसा आवंटित हुआ या खर्च किया गया। इसकी वास्तविक कसौटी यह है कि उस खर्च से समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव आया। उन्होंने जोर देकर कहा कि पीएसी का दायित्व केवल वित्तीय आंकड़ों की जांच करना नहीं है, बल्कि योजनाओं के जमीनी परिणामों और सामाजिक प्रभावों का मूल्यांकन करना भी है।
बदलते समय की चुनौतियों का जिक्र करते हुए बिरला ने राज्यों से आए पीएसी अध्यक्षों और सदस्यों से कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाने का आग्रह किया। उन्होंने विशाल वित्तीय आंकड़ों के विश्लेषण, जोखिमों के पूर्वानुमान और वित्तीय अनियमितताओं की रोकथाम के लिए डेटा विश्लेषण और एआई के व्यापक उपयोग का सुझाव दिया। साथ ही यह भी सचेत किया कि तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय संवेदना, नैतिक जिम्मेदारी और संस्थागत जवाबदेही का तालमेल बनाए रखना भी अत्यंत आवश्यक है।
बिरला ने विश्वास व्यक्त किया कि इस दो दिवसीय सम्मेलन के जरिए संसद और राज्य विधानमंडलों की लोक लेखा समितियों को एक-दूसरे की श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को साझा करने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि इस विचार-मंथन से जो निष्कर्ष निकलेंगे, वे संसदीय जवाबदेही की परंपरा को और अधिक सुदृढ़ करेंगे, जिससे सार्वजनिक धन का पाई-पाई जनकल्याण में लगे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति जनता का अटूट विश्वास कायम रहे।
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हिन्दुस्थान समाचार / श्रद्धा द्विवेदी

