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आस्था के आगे आधुनिक तकनीक बेअसर्र, उज्जैन में टस से मस नहीं हुईं ‘खड़े हनुमान जी’ की सिद्ध प्रतिमा

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आस्था के आगे आधुनिक तकनीक बेअसर्र, उज्जैन में टस से मस नहीं हुईं ‘खड़े हनुमान जी’ की सिद्ध प्रतिमा


उज्जैन, 10 सितंबर (हि.स.)। सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के बीच बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में आस्था, इतिहास और आधुनिक तकनीक आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं। कंठाल चौराहे और छत्री चौक के बीच स्थित प्राचीन ‘खड़े हनुमान जी’ की प्रतिमा को सड़क चौड़ीकरण के लिए स्थानांतरित करने के प्रशासनिक प्रयासों को दस दिन बीत चुके हैं, लेकिन प्रतिमा अपने स्थान से नहीं हिली।

दरअसल, प्रतिमा को हटाने के लिए क्रेन, पोकलेन और भारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया। कई प्रयासों के दौरान मशीनों पर अत्यधिक दबाव पड़ा और जंजीरों के टूटने की घटनाएं भी सामने आईं। इसके बाद प्रतिमा की सुरक्षा को लेकर तकनीकी विशेषज्ञों और पुरातत्व विशेषज्ञों की राय को महत्व दिया जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि, सिंहस्थ के मद्देनजर शहर के प्रमुख मार्गों को चौड़ा करने की योजना पर काम चल रहा है। इसी क्रम में कंठाल क्षेत्र के इस प्राचीन मंदिर को भी मार्ग विस्तार के दायरे में लिया गया। मंदिर के बाहरी हिस्से को हटाने के बाद जब प्रतिमा को स्थानांतरित करने की कोशिश शुरू हुई तो अपेक्षित परिणाम नहीं मिला।

प्रत्यक्षदिर्शियों के अनुसार, पहले हाइड्रोलिक क्रेन की मदद ली गई। इसके बाद अधिक क्षमता वाली मशीनें और पोकलेन भी मौके पर पहुंचाई गईं। प्रतिमा को सुरक्षित तरीके से उठाने के लिए जंजीरों और अन्य उपकरणों का सहारा लिया गया, पर प्रयास सफल नहीं हुए। प्रशासनिक और तकनीकी स्तर पर कई दौर के प्रयासों के बाद अब प्रतिमा पर अत्यधिक यांत्रिक बल लगाने से बचा जा रहा है।

खड़े हनुमान जी की प्रतिमा को स्थानीय स्तर पर लंबे समय से करीब 170 वर्ष पुराना माना जाता रहा है। हालांकि, प्रतिमा की बनावट, पत्थर और शिल्प को लेकर प्रारम्भिक चर्चाओं ने इसके इतिहास को और पुराना होने की संभावना सामने रखी है। कुछ इतिहासकार इसे परमार काल से जोड़ते हैं और लगभग एक हजार वर्ष पुराना होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इसी कारण अब इस स्थल को महज एक धार्मिक स्थान के बजाय संभावित ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले स्थल के रूप में भी देखा जा रहा है।

दूसरी ओर जमीन के भीतर प्रतिमा के आधार और संरचना की स्थिति जानने के लिए आधुनिक तकनीक, जिसमें थ्रीडी स्कैनिंग जैसी तकनीकों का उपयोग शामिल है, पर विचार किया जा रहा है। वहीं, प्रतिमा को हटाने के प्रयासों की जानकारी सामने आने के बाद कंठाल क्षेत्र में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोगों के साथ दूसरे शहरों से भी श्रद्धालुओं के यहां पहुंचने का क्रम लगातार जारी है। मंदिर परिसर के आसपास हनुमान चालीसा, रामायण पाठ और भजन-कीर्तन का क्रम चल रहा है।

अब भक्तों के लिए प्रतिमा का अपने स्थान पर स्थिर रहना आस्था का विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर प्रतिमा को स्थानांतरित करने के प्रयासों से जुड़े वीडियो और तस्वीरें प्रसारित होने के बाद इस मामले ने व्यापक लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। स्थानीय स्तर पर इसे हनुमान जी की सिद्ध प्रतिमा और जाग्रत देवस्थान के रूप में श्रद्धा से देखा जाता है।

इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय समाज की भावनाएं भी गहराई से जुड़ गई हैं। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा लंबे समय से इसी स्थान पर विराजमान है और कई पीढ़ियों ने यहां पूजा-अर्चना की है। क्षेत्र के व्यापारियों और निवासियों का एक वर्ग प्रतिमा को यथास्थान रखने की मांग कर रहा है। मंदिर से जुड़े लोगों का तर्क है कि सड़क की योजना में मामूली बदलाव कर इस प्राचीन धार्मिक स्थल को बचाया जा सकता है। उनका कहना है कि विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व वाले स्थलों की सुरक्षा के विकल्प भी तलाशे जाने चाहिए।

मंदिर के पुजारी सुलभ शांतनु शर्मा ने प्रतिमा को स्थानांतरित करने से पहले उसकी पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित किए जाने की मांग की है। उनका कहना है कि प्रतिमा को कोई क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए और प्रशासन को इसकी ठोस गारंटी देनी होगी। पुजारी का यह भी कहना है कि यदि सड़क के आसपास उपलब्ध भूमि और वैकल्पिक मार्ग की संभावनाओं का परीक्षण किया जाए तो प्रतिमा को विस्थापित किए बिना भी विकास कार्य आगे बढ़ाया जा सकता है। यही मांग अब श्रद्धालुओं के बीच भी प्रमुखता से उठ रही है।

इस घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया है कि विकास और विरासत के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। प्रशासन के सामने सिंहस्थ 2028 से पहले उज्जैन की यातायात व्यवस्था और आधारभूत ढांचे को बेहतर बनाने की बड़ी जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, खड़े हनुमान जी की प्रतिमा स्थानीय और व्यापक धार्मिक आस्था का केन्द्र है। भारी मशीनरी से प्रतिमा को हटाने के प्रयास सफल नहीं होने के बाद अब विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक तकनीक की मदद से आगे की रणनीति तैयार किए जाने की दिशा में विचार हो रहा है। इससे यह उम्मीद भी बनी है कि बिना प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए समाधान तलाशा जा सकता है।

उज्जैन में खड़े हनुमान जी की प्रतिमा के आसपास उमड़ रही श्रद्धा इस पूरे घटनाक्रम को धार्मिक संवेदना से जोड़ रही है। दस दिनों से जारी प्रयासों के बाद भी प्रतिमा का अपने स्थान पर स्थिर रहना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रतीक बन चुका है। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सिंहस्थ की विकास योजनाओं और सदियों पुरानी धार्मिक विरासत के बीच प्रशासन किस तरह ऐसा रास्ता निकालता है, जिसमें उज्जैन का विकास भी हो और उसकी आस्था व विरासत भी सुरक्षित रहे।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी