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मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश

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मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश


मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश


मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश


मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश


मप्र में सदानीरा समागम में देशभर से आये 100 से अधिक कलाकारों ने चित्रों से दिया जल-पर्यावरण का संदेश


- कैनवास, मटके, छातों पर कलाकारों ने जल, प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध को उकेरा

भोपाल, 30 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश शासन, संस्कृति विभाग अंतर्गत वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सदानीरा समागम के चौथे दिन शनिवार को विशेष चित्रांकन कार्यशाला आयोजित की गई। इस कार्यशाला में देशभर से लगभग 100 लोक, पारंपरिक और जनजातीय कलाकार अपनी विशिष्ट कला शैलियों के माध्यम से जल संरक्षण, पर्यावरणीय संतुलन और भारतीय सांस्कृतिक विरासत का संदेश दिया।

राजधानी भोपाल के भारत भवन में आयोजित कार्यशाला में पटुआ, कलमकारी, जोगी कलम, मंजूषा, मिथिला (मधुबनी), टिकुली, वारली, पिथोरा और पहाड़ी चित्रकला जैसी विविध लोक एवं पारंपरिक कला शैलियों के कलाकार शामिल हुए। कलाकारों द्वारा तैयार की जा रही कृतियों में नदियों की अविरलता, जल स्रोतों का संरक्षण, जल और जीवन का संबंध तथा प्रकृति के प्रति भारतीय समाज की आस्था प्रमुखता से उभरकर सामने आयी। उन्होंने कैनवास, मटके, छातों पर पेटिंग बनाकर जल, प्रकृति और संस्कृति के गहरे संबंध को दर्शाया।

बिहार के भागलपुर से आए मंजूषा कला के कलाकार पवन कुमार सागर ने अपनी चित्रकला के माध्यम से जल संरक्षण का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि मंजूषा कला बिहार की प्राचीन लोक परंपरा पर आधारित है। उनकी पेंटिंग का प्रमुख विषय वर्षा जल संचयन और भूजल संरक्षण पर केन्द्रित है। उन्होंने कहा कि बढ़ते शहरीकरण के कारण वर्षा जल जमीन में नहीं पहुंच पा रहा है, जिससे भूजल स्तर लगातार घट रहा है। उनकी कृति का संदेश स्पष्ट है- “जल है तो कल है।”

पटना से आयी अरुंधति महतो ने टिकुली कला की ऐतिहासिक यात्रा को साझा किया। उन्होंने बताया कि मौर्यकालीन परंपरा से जुड़ी यह कला कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई थी, लेकिन उपेंद्र महारथी के प्रयासों से इसे नया जीवन मिला। आज हजारों कलाकार इस कला से जुड़े हैं और इसे भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग दिलाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।

आंध्र प्रदेश के अराकू क्षेत्र से आयी युवा जनजातीय कलाकार तुलसीवेणी ने अपनी चित्रकला में ग्रामीण जीवन और जल संघर्ष को उकेरा। उनकी पेंटिंग्स में गाँवों की महिलाएँ दूर-दूर से पानी लाती दिखाई देती हैं। उन्होंने बताया कि यह उनके जीवन और परिवेश की वास्तविक तस्वीर है, जिसे वे अपनी कला के माध्यम से अभिव्यक्त करती हैं।

महाराष्ट्र के पालघर जिले से आयी मीनाक्षी वायडा ने वारली कला के माध्यम से आदिवासी जीवन और परंपराओं को चित्रित किया। उन्होंने बताया कि वारली कला हमारे समुदाय की सांस्कृतिक पहचान है। उनकी कृतियों में विवाह संस्कार, देवी-देवताओं की आराधना और सामुदायिक जीवन के दृश्य प्रमुख रूप से दिखाई देते हैं।

हिमाचल प्रदेश के चंबा से आयी ज्योति नाथ ने पहाड़ी चित्रकला, चंबा कलम और कांगड़ा कलम की परंपरा को अपने चित्रों में जीवंत किया। राधा-कृष्ण, ऋतुओं और प्रकृति पर आधारित उनकी पेंटिंग्स भारतीय लघु चित्रकला की समृद्ध विरासत को दर्शाती हैं।

मध्य प्रदेश के झाबुआ की निर्मला भामोर ने भील पिथोरा कला के माध्यम से आदिवासी समाज की वर्षा और प्रकृति से जुड़ी मान्यताओं को प्रस्तुत किया। उनकी पेंटिंग में ‘धाड़ माता’ की पूजा और वर्षा की कामना से जुड़ी परंपराओं का चित्रण किया गया।

कार्यशाला का उद्देश्य कला के माध्यम से समाज को जल संरक्षण और संवर्धन के प्रति जागरूक करना है। कलाकारों का मानना है कि भारतीय लोक और जनजातीय कलाएं सदैव प्रकृति और जीवन के सामंजस्य का संदेश देती रही हैं। ऐसे में जल जैसे महत्वपूर्ण विषय को इन कलाओं के माध्यम से अभिव्यक्त करना समय की आवश्यकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / उम्मेद सिंह रावत