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न वजूखाना और न मीनार, फिर मस्जिद कैसे? भोजशाला मामले में हिन्दू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के तर्कों का किया खंडन

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न वजूखाना और न मीनार, फिर मस्जिद कैसे? भोजशाला मामले में हिन्दू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के तर्कों का किया खंडन


इंदौर, 08 मई (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान शुक्रवार को हिन्दू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष द्वारा पूर्व में प्रस्तुत तर्कों का विस्तार से खंडन किया। कहा गया कि मस्जिद में तीन चीजें-वजूखाना, मीनार और मेहराब अनिवार्य रूप से होती हैं। इनके बगैर मस्जिद की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन भोजशाला में न वजूखाना है, न मीनार। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट बताती है कि मेहराब भी बाद में बनाई गईं। ऐसे में यह मस्जिद कैसे हो सकती है?

भोजशाला मामले में मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ में शुक्रवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से सीनियर विष्णुशंकर जैन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पैरवी की, जबकि एडवोकेट विनय जोशी और मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल कोर्ट में उपस्थित रहे। इस दौरान हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष द्वारा पूर्व में प्रस्तुत तर्कों का विस्तार से खंडन किया।

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और एक याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से कहा गया कि वजू खाना, मीनार और मेहराब के बगैर मस्जिद की कल्पना नहीं की जा सकती, लेकिन भोजशाला में न वजूखाना है, न मीनार। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट बताती है कि मेहराब भी बाद में बनाई गईं। ऐसे में यह मस्जिद हो ही नहीं सकती।

संरक्षित धरोहरों पर लागू नहीं पूजा स्थल अधिनियम

मस्जिद पक्ष कह रहा है कि पूजा स्थल अधिनियम (प्लेसेस आफ वर्शिप एक्ट) के प्रावधानों के तहत उन्हें भोजशाला में नमाज का अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहरों पर यह एक्ट लागू नहीं होता। ब्रिटिश संग्रहालय में रखी वाग्देवी की मूर्ति के बारे में खुद संग्रहालय ने स्वतंत्रता से पहले लिखे पत्र में बताया है कि भोजशाला का निर्माण वर्ष 1034 में राजा भोज द्वारा कराया गया था। शुक्रवार को मस्जिद पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद को भी रिजाइंडर देना था, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुए। कोर्ट ने उन्हें सोमवार को प्रतिउत्तर देने के लिए कहा है।

मुस्लिम पक्ष उलझाना चाहता है : विष्णु शंकर जैन

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने उच्च न्यायालय से कहा कि मंदिर पक्ष भोजशाला को सिविल मामला बताकर उलझाना चाहता है। हम स्वामित्व के निर्धारण के लिए नहीं, बल्कि एएसआई के सात अप्रैल 2023 के आदेश में संशोधन के लिए न्यायालय आए हैं। इस आदेश में मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी है। भोजशाला मंदिर है और 24 घंटे पूजा की अनुमति दी जाना चाहिए। मस्जिद पक्ष कह रहा है कि भोजशाला में 700 वर्ष से नमाज पढ़ी जा रही है, लेकिन दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1935 के आसपास हुए विवाद के बाद यहां नमाज शुरू हुई थी।

हिंदू पक्ष ने यह भी कहा कि “एनसिएंट एंड हिस्टॉरिकल मॉन्यूमेंट्स एंड आर्कियोलॉजिकल साइट्स एंड रीमेंस एक्ट 1951” की स्मारकों की सूची में भोजशाला का नाम दर्ज है। साथ ही 7 अप्रैल 2003 को एएसआई द्वारा जारी आदेश को निरस्त करने और भोजशाला का धार्मिक स्वरूप निर्धारित करने की मांग भी दोहराई गई। याचिका में मांग की गई कि भोजशाला को पूर्ण रूप से हिंदू समाज को सौंपा जाए, ताकि मां सरस्वती की पूजा-अर्चना और हवन पूरे वर्ष 365 दिन निर्बाध रूप से हो सके।

जैसा जूना महाकाल मंदिर, वैसी भोजशाला : मनीष गुप्ता

याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी के अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने पुरातत्वविद सीतारमण की पुस्तक का संदर्भ देते हुए कहा कि इस पुस्तक में 2800 से ज्यादा ऐसे मंदिरों की जानकारी है, जिन्हें मुस्लिम शासकों ने ध्वस्त किया था। भोजशाला को पाठशाला ठहराने का प्रयास हो रहा है, लेकिन भोजशाला की तरह जूना महाकाल मंदिर और ऊन के चौबारा मंदिर में लिखावट और श्लोक मिले हैं, जो बताते हैं कि भोजशाला मंदिर ही है। मस्जिद पक्ष कह रहा है कि कई हिंदू राजाओं ने धार में तोड़फोड़ की, लेकिन वे इस बात को सिद्ध करने में पूरी तरह से असफल रहे हैं।

प्रकरण से जुड़े पक्षकारों के अनुसार 2022 में हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की राष्ट्रीय अध्यक्ष एडवोकेट रंजना अग्निहोत्री और उनके सहयोगियों ने सीनियर एडवोकेट हरिशंकर जैन के मार्गदर्शन में हाईकोर्ट इंदौर में याचिका दायर की थी। याचिका में भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय कर उसे हिंदू समाज को सौंपने की मांग की गई थी। इसी मामले में 2024 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) द्वारा भोजशाला परिसर में 98 दिनों तक वैज्ञानिक सर्वेक्षण कराया गया था। इसके बाद 23 जनवरी 2026 को वसंत पंचमी के अवसर पर पूरे दिन निर्बाध पूजा-अर्चना की अनुमति सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दी गई थी।

मामले में अगली सुनवाई सोमवार, 11 मई को होगी। इसमें मुख्य रूप से मुस्लिम पक्ष के एडवोकेट अपना रिजाइंडर प्रस्तुत करेंगे।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर