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भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह

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भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह


भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह


भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह


भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह


भारत में आधुनिकता और विकास के साथ-साथ आज भी जीवंत है प्राचीन परंपराएं: चंद्र दत्त सिंह


- सदानीरा समारोह में जल, संस्कृति और संवेदनाओं से सजी “पानी नामा” की अनूठी प्रस्तुति

भोपाल, 28 मई (हि.स.)। त्रिनिदाद और टोबैगो के हाई कमिश्नर चंद्र दत्त सिंह ने भारत की सांस्कृतिक समृद्धि की सराहना करते हुए कहा कि भारत विश्व का ऐसा देश है, जहां आधुनिकता और विकास के साथ-साथ प्राचीन परंपराएं आज भी जीवंत हैं। उन्होंने कहा कि विश्व के अनेक देशों में भ्रमण के बावजूद भारत जैसी बहुआयामी संस्कृति कहीं देखने को नहीं मिली।

चंद्र दत्त सिंह गुरुवार शाम को भोपाल के भारत में मप्र शासन के संस्कृति विभाग अंतर्गत वीर भारत न्यास द्वारा आयोजित सात दिवसीय सदानीरा समागम के दूसरे दिन सांस्कृति संध्या में बतौर मुख्यातिथि संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम में नेपाल दूतावास के प्रथम सचिव दीपक पोरखिरे ने भारत-नेपाल संबंधों को सांस्कृतिक रूप से अत्यंत गहरा बताते हुए कहा कि भारत आकर उन्हें अपने ही देश और गांव जैसा अपनापन महसूस हुआ। उन्होंने ट्राइबल म्यूजियम में भारतीय जनजातीय संस्कृति और विरासत की भी प्रशंसा की।

भारतीय संस्कृति में जल को जीवन, सृजन और संवेदनाओं का आधार माना गया है। सदानीरा समारोह के दूसरे दिन इसी भाव को केंद्र में रखकर आयोजित सांस्कृतिक प्रस्तुति अमृतमय जलमय और पानी नामा ने दर्शकों को भावनाओं, संगीत और दर्शन की अद्भुत यात्रा पर ले गया। कार्यक्रम में भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं, प्रकृति प्रेम और जल के महत्व को गीत, संवाद और नृत्य के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया।

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण पानी नामा की संगीतमय प्रस्तुति रही, जिसमें बारिश, नदी, सावन, पनघट और प्रेम को जीवन के विभिन्न रंगों से जोड़ते हुए मंचित किया गया। मंच पर बिजली की कड़क, बादलों की गूंज और वर्षा की ध्वनि के बीच एंकर ने जल को जीवन का प्रतीक बताते हुए कहा कि ज़िंदगी-नामा नहीं, बल्कि पानी-नामा है। प्रस्तुति में पानी को कभी प्रेम, कभी स्मृति, कभी संवेदना और कभी जीवन दर्शन के रूप में उकेरा गया।

कार्यक्रम के दौरान पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, रिमझिम गिरे सावन, आया सावन झूम के, ओ नदिया चले रे धारा, मोहे पनघट पे नंदलाल, दिल है छोटा सा और अल्लाह मेघ दे पानी दे जैसे लोकप्रिय गीतों की मनमोहक प्रस्तुतियों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। संवादों में यह संदेश दिया गया कि जल केवल प्रकृति का तत्व नहीं, बल्कि मानव जीवन की चेतना और संस्कृति का आधार है।

प्रस्तुति में रहीम का प्रसिद्ध दोहा— रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून — भी उद्धृत किया गया, जिसने जल संरक्षण और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश दिया। कार्यक्रम ने यह स्पष्ट किया कि जल ही जीवन है और इसकी रक्षा करना मानवता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। संगीत, साहित्य और संवेदनाओं से सजी यह प्रस्तुति दर्शकों के मन में लंबे समय तक अपनी अमिट छाप छोड़ गई।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर