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मप्र की ऐतिहासिक भोजशाला में जुमे की नमाज के लिए मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली जगह

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मप्र की ऐतिहासिक भोजशाला में जुमे की नमाज के लिए मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली जगह


मप्र की ऐतिहासिक भोजशाला में जुमे की नमाज के लिए मुस्लिम पक्ष को नहीं मिली जगह


- घरों-मस्जिदों में ही हुई जुमे की नमाज, प्रशासन को मिला उच्चतम न्यायालय का आदेश, वैकल्पिक जगह को लेकर हुई बैठक

धार, 17 जुलाई (हि.स.)। मध्य प्रदेश धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को जुमे की नमाज के लिए जगह नहीं मिली। इसके बाद मुस्लिम समाज ने जुमे की नमाज घरों और मस्जिदों में ही अदा की।

दरअसल, उच्चतम न्यायालय ने गत 14 जुलाई को मुस्लिम पक्ष की भोजशाला परिसर में नमाज को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अंतरिम विस्तृत आदेश जारी किया था। न्यायालय ने जिला प्रशासन को भोजशाला के समीप खुले स्थान पर नमाज की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए थे। यह आदेश जिला प्रशासन को मिल गए हैं। आदेश मिलने के बाद शुक्रवार को कलेक्ट्रेट में कलेक्टर राजीव रंजन मीना और पुलिस अधीक्षक सचिन शर्मा की मौजूदगी में प्रशासन की अहम बैठक हुई।

बैठक में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप प्रशासनिक और सुरक्षा व्यवस्थाओं की समीक्षा की गई तथा भोजशाला के पास खुले वैकल्पिक स्थान पर जुमे की नमाज की व्यवस्था को लेकर चर्चा हुई। इसके बाद कलेक्टर और एसपी की मौजूदगी में मुस्लिम समाज के वरिष्ठ लोगों के साथ अलग बैठक आयोजित की गई। इसमें नमाज के लिए उपयुक्त स्थान तय करने पर चर्चा हुई।

इस दौरान हिंदू पक्ष ने मांग की कि नमाज़ की व्यवस्था भोजशाला परिसर से 300 मीटर के दायरे के बाहर की जाए। इस संबंध में हिंदू पक्ष के प्रतिनिधियों ने कलेक्टर से मुलाकात कर उन्हें एक ज्ञापन सौंपा।

हिंदू पक्ष के प्रतिनिधि गोपाल शर्मा ने कहा कि उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय दोनों ने ही अपने आदेशों में स्पष्ट किया है कि भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर है। न्यायालय के रुख से साफ है कि भोजशाला में नमाज़ की अनुमति नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय ने भोजशाला परिसर के 'निकट' खुले स्थान पर नमाज़ की व्यवस्था करने की बात कही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के नियमों के अनुसार, भोजशाला का 100 मीटर का क्षेत्र संरक्षित और 200 से 300 मीटर का क्षेत्र आरक्षित है। ऐसे में कुल 300 मीटर के इस पूरे परिसर के बाहर ही नमाज़ की व्यवस्था की जानी चाहिए।

ज्ञापन में धार्मिक मान्यताओं और नियमों का हवाला देते हुए हिंदू पक्ष ने कहा कि प्रशासन जिस नजदीकी स्थान पर नमाज़ कराने की सोच रहा है, वह वास्तव में कब्रों से घिरा हुआ है। कुरान और इस्लामिक नियमों के अनुसार भी कब्रिस्तान या कब्रों वाली जगह पर नमाज़ नहीं पढ़ी जाती, वहां केवल फातिहा पढ़ा जाता है। ऐसे में वहां नमाज़ करवाना धार्मिक दृष्टिकोण से भी उचित नहीं है।

हिंदू पक्ष ने इतिहास का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 1935 में भोजशाला के पास जो नमाज़ शुरू हुई थी, उसके समाधान के रूप में वर्ष 1942 में धार के तत्कालीन राजा ने बख्तावर मार्ग पर रहमत मस्जिद बनवा दी थी। इसलिए नमाज़ के लिए उसी मस्जिद का उपयोग किया जाना चाहिए। हिंदू पक्ष ने कलेक्टर से मांग की है कि शहर की शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए प्रशासन उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए नमाज़ की व्यवस्था भोजशाला के 300 मीटर के दायरे से बाहर ही करे।

कलेक्टर मीना ने बताया कि शुक्रवार सुबह तक अदालत का डिटेल्ड ऑर्डर प्रशासन को नहीं मिला था, इसलिए किसी वैकल्पिक जगह की आधिकारिक घोषणा नहीं हो सकी थी। अब आदेश मिलने के बाद प्रशासन ने एक आंतरिक बैठक कर टीम गठित की है। टीम अदालत के निर्देशों के अनुसार जरूरी जानकारी जुटाकर उपयुक्त स्थान का परीक्षण करेगी। उसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई और व्यवस्थाएं तय की जाएगी।

वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि बसंत पंचमी पर जहां नमाज कराई गई थी, वह कब्रिस्तान की जगह है और वहां नमाज जायज नहीं है। मुस्लिम समाज के सदर अब्दुल समद ने कहा कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी पर प्रशासन ने कब्रिस्तान की भूमि पर जुमे की डमी नमाज कराई थी, उस समय भी मुस्लिम समाज ने आपत्ति दर्ज कराई थी। आसपास का पूरा क्षेत्र कब्रिस्तान है और वहां जुम्मे की नमाज अदा नहीं की जाती। इस संबंध में हमारा पक्ष उच्चतम न्यायालय के सामने भी रखा गया है।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर