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भोजशाला के वास्तविक स्वामित्व पर सलमान खुर्शीद ने उठाए सवाल, अयोध्या राम जन्मभूमि केस का दिया हवाला

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भोजशाला के वास्तविक स्वामित्व पर सलमान खुर्शीद ने उठाए सवाल, अयोध्या राम जन्मभूमि केस का दिया हवाला


- भोजशाला मामले में हाई कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की तरफ से खुर्शीद ने रखे तर्क

इंदौर/भोपाल, 22 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला के धार्मिक स्वरूप और स्वामित्व को लेकर मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में गत 6 अप्रैल से चल रही नियमित सुनवाई बुधवार को भी जारी रही। आज मौलाना कलामुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने तर्क रखे।

लगभग दो घंटे चली सुनवाई के दौरान खुर्शीद ने अयोध्या फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले तो यह तय होना चाहिए कि भोजशाला का वास्तविक स्वामित्व किसका है। स्वामित्व का निर्धारण आस्था और विश्वास से नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया से किया जा सकता है। अयोध्या मामले में रामलला विराजमान पक्षकार थे, लेकिन भोजशाला मामले में ऐसा नहीं है। अचल संपत्ति या जमीन को कानूनन व्यक्ति नहीं माना जा सकता। याचिका सुनवाई योग्य ही नहीं है, इसे निरस्त किया जाना चाहिए।

करीब दो घंटे चली सुनवाई के बावजूद खुर्शीद के तर्क अधूरे रहे। वे गुरुवार को अपने तर्क समाप्त करेंगे। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन अपने तर्क रखेंगे।

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ की न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ में बुधवार दोपहर ठीक ढाई बजे मामले में सुनवाई शुरू हुई। वर्चुअली जुड़े वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम पक्ष की ओर से अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि पूजा स्थल (विशेष प्रविधान) अधिनियम के प्रविधानों में स्पष्ट है कि 15 अगस्त 1947 को धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी वही रहेगी। इस अधिनियम का उद्देश्य ही विवादों को समाप्त करना है। खुर्शीद ने फिर दोहराया कि उच्चतम न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने भोजशाला जैसे मामलों में अंतिम फैसला सुनाने पर रोक लगा रखी है।

अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने बुधवार की अपनी बहस पूरी तरह से अयोध्या फैसले पर आधारित रखी। उन्होंने अयोध्या में एएसआइ के सर्वे में मिले साक्ष्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मूर्ति और जमीन को समान नहीं माना जा सकता। अयोध्या को लेकर जो याचिका निराकृत हुई है उसमें रामलला विराजित भी पक्षकार थे, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। भोजशाला मामले में देवी-देवता ने आपके सामने कुछ प्रस्तुत नहीं किया है। ऐसी स्थिति में हम यहां स्वामित्व का निर्धारण ही नहीं कर सकते। इस पर अदालत ने कहा कि हिंदू फ्रंट फार जस्टिस ने याचिका में स्वामित्व निर्धारण की मांग नहीं की है बल्कि 24 घंटे पूजा के अधिकार की मांग की है। इस पर खुर्शीद ने कहा कि जब स्वामित्व निर्धारण की मांग ही नहीं है तो इसका मतलब है कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि स्वामित्व के बगैर पूजा का अधिकार कैसे मिल सकता है।

खुर्शीद ने अदालत को बताया कि वे संभवतः गुरुवार को अपनी बात पूरी कर देंगे। इस पर कोर्ट ने एएसआई की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट जैन से कहा कि वे गुरुवार को अपने तर्क कोर्ट के सामने प्रस्तुत करने के लिए तैयार रहें। गुरुवार की सुनवाई इस मामले में काफी निर्णायक हो सकती है क्योंकि एएसआई का पक्ष स्पष्ट होने के बाद कोर्ट की कार्यवाही आगे बढ़ेगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर