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भोजशाला विवादः ऐतिहासिक अभिलेखों के सहारे मुस्लिम पक्ष ने दोहराया मस्जिद होने का दावा

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भोजशाला विवादः ऐतिहासिक अभिलेखों के सहारे मुस्लिम पक्ष ने दोहराया मस्जिद होने का दावा


- एएसआई ने रखा अपना पक्ष, दो बार हुए सर्वे का दिया हवाला

इंदौर, 20 अप्रैल (हि.स.)। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर विवाद मामले में उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सोमवार को नियमित सुनवाई हुई। इस दौरान मुस्लिम पक्ष ने अपने विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए और भोजशाला के मस्जिद होने के अपने दावे को दोहराया।

मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में सोमवार को न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की युगलपीठ में हुई सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष की ओर से एडवोकेट अशहर वारसी ने ऐतिहासिक दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों और गजट सूचनाओं के आधार पर अपना पक्ष रखा।

एडवोकेट वारसी ने दलील दी कि वर्ष 1904 से पहले तक इस परिसर पर मुस्लिम समुदाय का सतत और अनुपातिक कब्जा रहा है। उन्होंने सरकारी रिकॉर्ड, गजट नोटिफिकेशन और पुरातत्व विभाग के तत्कालीन डायरेक्टर द्वारा की गई टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा कि इन अभिलेखों में स्थल को मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है।

उन्होंने विशेष रूप से 1935 के गजट नोटिफिकेशन का हवाला देते हुए कहा कि उसमें इस स्थल को मस्जिद माना गया है और अन्य गतिविधियों की अनुमति न देने का उल्लेख स्पष्ट रूप से दर्ज है। मुस्लिम पक्ष ने कुरान, हदीस और अन्य धार्मिक दस्तावेजों के साथ सरकारी अभिलेखों के आधार पर अपने दावे दोहराए। मुस्लिम पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने इस मामले को जनहित याचिका की तरह प्रस्तुत किया है, जबकि यह विवाद सिविल प्रकृति का है और इसे सक्षम सिविल कोर्ट में भेजा जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने भी अपना पक्ष रखा। एएसआई की ओर से भी वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील जैन ने अपने तथ्य रखते हुए कहा कि यह पहला मौका नहीं है, जब भोजशाला का सर्वे किया गया। इससे पहले एएसआई ने वर्ष 1902 में भी सर्वे किया था। तब भी सर्वे में शिलालेखों पर श्लोक व मूर्तियां मिली थीं। अदालत के समक्ष कहा गया कि फिलहाल जो सर्वे किया गया है, उसे अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल कर 98 दिनों में पूरा किया गया और दो हजार पेजों की रिपोर्ट कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई। एएसआई के वकील ने कहा कि वर्ष 1958 में इस भवन को संरक्षित स्मारक का दर्जा दिया गया।

याचिका में इंटरविनर बने धार निवासी जिब्रान अंसारी व अन्य की तरफ से वकील ने कहा कि परिसर में वर्षों पहले मस्जिद थी और पुराने दस्तावेजों व रियासत के गजट में भी इसका उल्लेख है। 1952 में एएसआई की रिपोर्ट का भी हवाला इस दौरान दिया गया।

एएसआई की दलीलें समयाभाव के कारण अधूरी रह गई, जिस पर सुनवाई मंगलवार को जारी रहेगी। वहीं, सुनवाई में अभी इंटरवीनर्स की दलीलें अभी शेष हैं। मंगलवार को होने वाली सुनवाई में मुस्लिम पक्ष की ओर से सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद अपने तर्क प्रस्तुत करेंगे। कोर्ट सभी पक्षों से कहा है कि वे अपने-अपने दावों के समर्थन में दस्तावेजी साक्ष्य स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश तोमर