शिक्षा केवल आजीविका का साधन नहीं, मनुष्य निर्माण का माध्यम : डॉ मोहन भागवत
नागौर, 12 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका अर्जित करना नहीं, बल्कि मनुष्य को श्रेष्ठ, समर्थ और संवेदनशील बनाना है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का जीवन केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज और सृष्टि के पोषण के लिए भी उपयोगी होना चाहिए।
डॉ भागवत शनिवार को नागाैर जिले के गोटन स्थित एल.के. सिंघानिया एजुकेशन सेंटर के 37वें वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह ‘स्वराज’ को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विद्यालयीन शिक्षा के साथ परिवार, परिवेश और समाज से मिलने वाले संस्कार भी विद्यार्थी के व्यक्तित्व और आचरण की नींव तैयार करते हैं। उन्होंने कहा कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसी प्रवृत्तियां पशुओं में भी होती हैं, लेकिन प्रकृति ने मनुष्य को विवेक और विचार करने की शक्ति प्रदान की है। इसी शक्ति के आधार पर मनुष्य ‘नर से नारायण’ बनने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। सद्विचार से प्रेरित कर्म मनुष्य को देवत्व की ओर ले जाते हैं, जबकि गलत विचार और आचरण पतन का कारण बनते हैं।
सरसंघचालक ने सत्य और सामर्थ्य के संबंध पर कहा कि शक्ति के अभाव में सत्य भी प्रभावहीन हो जाता है। व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक शरीर, मन, बुद्धि और ज्ञान का सामर्थ्य आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत का आर्थिक और सामरिक सामर्थ्य मजबूत होने के कारण आज विश्व भारत के विचारों और ज्ञान को गंभीरता से सुन रहा है।
जीवन के उद्देश्य पर चर्चा करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि केवल सफल होना पर्याप्त नहीं है। जीवन का सार्थक होना अधिक महत्वपूर्ण है। सफलता और असफलता प्रयासों के साथ प्रारब्ध पर भी निर्भर कर सकती है, लेकिन परमार्थ की भावना से किया गया कर्म व्यक्ति को स्थायी सम्मान दिलाता है। इतिहास उन्हीं लोगों को याद करता है, जिन्होंने समाज और राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित किया। इनमें दानवीर भामाशाह, भगवान श्रीराम, स्वामी विवेकानंद और देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान देने वाले क्रांतिकारी शामिल हैं।
उन्होंने शिक्षा में पंचकोशों के विकास पर बल देते हुए कहा कि शिक्षा केवल बौद्धिक और वैज्ञानिक विषयों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। कला, संगीत, खेल और योग भी सर्वांगीण शिक्षा के आवश्यक अंग हैं। उन्होंने कहा कि कबड्डी जैसे खेल विद्यार्थियों को हार न मानने और गिरने के बाद फिर उठ खड़े होने की सीख देते हैं। इसी तरह वाद्यवृंद और संगीत मन, बुद्धि तथा शरीर के समन्वय के साथ सामूहिक चेतना का विकास करते हैं।
डॉ. भागवत ने कहा कि शिक्षण संस्थान केवल उपाधि देने के केंद्र न बनें, बल्कि मनुष्य निर्माण के तीर्थ बनें। इन संस्थानों में विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास, चरित्र, संवेदनशीलता और राष्ट्रभक्ति के संस्कार विकसित होने चाहिए। उन्होंने कहा कि अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन जो समाज और राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित करता है, उसका जीवन वास्तविक अर्थों में सार्थक होता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / ईश्वर

