दस साल की मेहनत का बड़ा परिणाम: जैसलमेर में गोडावण को फिर जंगल में बसाने की शुरुआत
- दो बंदी अवस्था में पाले गए गोडावणों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने की प्रक्रिया शुरू, 97 पक्षियों तक पहुंची संरक्षण केंद्रों में संख्या
जैसलमेर, 03 अक्टूबर (हि.स.)। राजस्थान के राजकीय पक्षी और गंभीर रूप से लुप्तप्राय ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी गोडावण के संरक्षण की दिशा में शनिवार को एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया। वन्यजीव सप्ताह के दौरान केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में बंदी अवस्था में पाले गए गोडावणों को प्राकृतिक आवास में पुनः बसाने की प्रक्रिया का शुभारंभ किया। दो पक्षियों को सॉफ्ट-रिलीज सुविधा से जंगल में छोड़ने की प्रक्रिया रविवार को पूरी की जाएगी।
यह उपलब्धि गोडावण की व्यवहार्य आबादी तैयार करने के लिए पिछले एक दशक से चल रहे संरक्षण प्रजनन, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावास संरक्षण के प्रयासों का महत्वपूर्ण परिणाम मानी जा रही है। कार्यक्रम के दौरान रामदेवरा और सम स्थित गोडावण संरक्षण प्रजनन केंद्रों की प्रगति की समीक्षा की गई। साथ ही रामदेवरा में नवनिर्मित पुनर्वन्यीकरण एवियरी का उद्घाटन किया गया और गोडावण संरक्षण की दस साल की यात्रा पर आधारित पुस्तिका भी जारी की गई।
कार्यक्रम में राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा सहित केंद्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
रामदेवरा में बनाई गई पुनर्वन्यीकरण एवियरी करीब 160 मीटर लंबी, 64 मीटर चौड़ी और 14 मीटर ऊंची है। राजस्थान सरकार ने इसके निर्माण के लिए 9.25 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया था। विशाल और स्तंभ रहित इस संरचना में बंदी अवस्था में पाले गए गोडावणों को पर्याप्त उड़ान क्षेत्र मिलता है, जिससे वे अपनी उड़ान की मांसपेशियां मजबूत करने, प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढलने और जंगल में छोड़े जाने से पहले प्राकृतिक व्यवहार विकसित करने का अभ्यास कर सकेंगे।
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि गोडावण का थार के रेगिस्तान से भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव है। उन्होंने संरक्षण कार्यक्रम में वन विभाग, भारतीय वन्यजीव संस्थान, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार गोडावण संरक्षण से जैव विविधता के साथ-साथ स्थानीय समुदायों के लिए पर्यावरण पर्यटन के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
सरकार के अनुसार सम और रामदेवरा स्थित संरक्षण केंद्रों में फिलहाल 97 गोडावण हैं। इनमें 40 पक्षी जंगल से एकत्र किए गए अंडों से उत्पन्न हुए हैं, जबकि 57 बंदी अवस्था में पाले गए हैं। इनमें से 86 को संरक्षण प्रजनन के लिए रखा गया है और 11 को जंगल में छोड़ने के लिए चिह्नित किया गया है। वर्ष 2025 में 24 और वर्ष 2026 में 29 जीवित चूजे पैदा हुए।
संरक्षण कार्यक्रम में ‘जंपस्टार्ट’ जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके तहत राजस्थान में छह और गुजरात में दो चूजों को बंदी अवस्था में प्राप्त अंडों को जंगली घोंसलों में रखकर विकसित किया गया और संबंधित मादाओं ने उन्हें स्वीकार किया। इससे गोडावण की प्राकृतिक आबादी को मजबूत करने के प्रयासों को नई दिशा मिली है।
गोडावण के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित बनाने के लिए डेजर्ट नेशनल पार्क में करीब 200 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बाड़युक्त घास के मैदान विकसित किए जा रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के दीर्घकालिक निगरानी अध्ययनों के अनुसार यह क्षेत्र गोडावण के प्रमुख प्रजनन पर्यावासों में शामिल है।
संरक्षण योजना में पर्यावास पुनर्स्थापन, खतरों को कम करना, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी शामिल किया गया है।
गोडावण को जंगल में वापस छोड़ने की प्रक्रिया केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। पायलट चरण में पक्षियों के व्यवहार, अनुकूलन और प्राकृतिक परिस्थितियों में उनके अस्तित्व से जुड़ी जानकारी जुटाई जाएगी। इस अनुभव के आधार पर भविष्य में और पक्षियों को जंगल में छोड़ने की प्रक्रिया और उसके मानकों को क्रमशः बेहतर किया जाएगा।
गोडावण संरक्षण कार्यक्रम का दायरा राजस्थान से आगे गुजरात तक भी बढ़ा है। मार्च 2026 में राजस्थान से गुजरात के कच्छ स्थित नालिया तक एक उर्वर अंडे को करीब 770 किलोमीटर की सड़क यात्रा के जरिए पहुंचाकर जंगली घोंसले में रखा गया था। वहां एक दशक बाद गोडावण के चूजे के सफलतापूर्वक निकलने की उपलब्धि सामने आई थी।
अब जैसलमेर में बंदी अवस्था में पाले गए गोडावणों को प्राकृतिक आवास में लौटाने की शुरुआत इस संरक्षण यात्रा के अगले चरण का संकेत है। थार के खुले आकाश और घास के मैदानों में इन पक्षियों की वापसी से भारत के गोडावण संरक्षण अभियान को नई वैज्ञानिक सीख मिलने की उम्मीद है।
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हिन्दुस्थान समाचार / रोहित

