विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा उत्सव का औपचारिक उद्घाटन
मैसूरु, 11 अक्टूबर (हि.स.)। कर्नाटक के मैसूरु में विश्व प्रसिद्ध 416वें नाडहब्बा दशहरा महोत्सव का रविवार को विधिवत शुभारंभ हुआ। चामुंडी पहाड़ी पर आयोजित समारोह में कोप्पल के गविमठ के अभिनव गविसिद्धेश्वर महास्वामीजी और मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने मां चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर महोत्सव का शुभारंभ किया।
सुबह 11.50 बजे से दोपहर 12.13 बजे तक के शुभ धनुर लग्न में धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। इस अवसर पर चांदी के रथ पर विराजमान मां चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा पर पुष्प अर्पित किए गए।
मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार अपनी पत्नी उषा के साथ चामुंडी पहाड़ी पहुंचे, जहां उनका पूर्णकुंभ से स्वागत किया गया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने पारंपरिक नंदी ध्वज स्तंभ की विशेष पूजा की। फिर लोककला मंडलियों के वाद्य संगीत के साथ जुलूस में चामुंडेश्वरी मंदिर पहुंचे।
मंदिर के सामने मुख्यमंत्री ने चार ईडुगायियों को फोड़कर अपनी श्रद्धा अर्पित की। इसके बाद मुख्यमंत्री दंपति और गविमठ के अभिनव गविसिद्धेश्वर महास्वामीजी ने मां चामुंडेश्वरी की विशेष पूजा-अर्चना की। धार्मिक अनुष्ठान पूरे होने के बाद सभी गणमान्य व्यक्ति मुख्य मंच पर पहुंचे। शुभ धनुर लग्न में चांदी के रथ पर विराजमान मां चामुंडेश्वरी की उत्सव प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर दशहरा महोत्सव का औपचारिक शुभारंभ किया गया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा कि ऐतिहासिक मैसूरु दशहरा महोत्सव में शामिल होना उनके जीवन का एक यादगार क्षण है। उन्होंने कोप्पल के गविमठ को सभी समुदायों के लिए शांति और सद्भाव का उपवन बताते हुए अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामीजी के कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि सूखे की स्थिति से निपटने के लिए स्वामीजी द्वारा शुरू किया गया जलदीक्षा अभियान अभूतपूर्व है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि ज्ञान की ज्योति जलाकर अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामीजी ने राज्य को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है। उनकी सादगी, उपलब्धियां और समाजसेवा की भावना सभी के लिए प्रेरणादायक हैं। उनकी उपस्थिति से इस वर्ष के दशहरा महोत्सव के आयोजन को विशेष अर्थ मिला है।
इससे पहले दशहरा महोत्सव का शुभारंभ करने के बाद अभिनव गविसिद्धेश्वर महास्वामीजी ने कहा, “मैं दशहरा का उद्घाटन करने नहीं आया हूं बल्कि मां चामुंडेश्वरी से प्रार्थना करने आया हूं।”
उन्होंने मैसूरु को राज्य के गौरवशाली अतीत का प्रतीक बताते हुए कहा कि यह अतीत, वर्तमान और भविष्य का संगम है। उन्होंने आह्वान किया कि समाज और राष्ट्र का निर्माण जाति के आधार पर नहीं बल्कि नीति और प्रेम के आधार पर किया जाना चाहिए। इस दौरान उन्होंने कवि पंप के ‘मानव कुल तानोन्दे वलम’ अर्थात समस्त मानव जाति एक है, के सिद्धांत का स्मरण करते हुए मानवता और प्रेम को सर्वोच्च महत्व देने की बात कही।
स्वामीजी ने कहा कि मैसूरु के राजाओं ने केवल शासन ही नहीं किया बल्कि लोगों के दिलों पर भी राज किया। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि भूमि, जल और वायु की रक्षा करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है।
उन्होंने बांधों को हमारी भोजन की थाली के समान बताते हुए कहा कि ये प्रकृति की अमूल्य देन हैं। इसलिए पर्यावरण का संरक्षण करना और प्राकृतिक संसाधनों को बचाना सभी की जिम्मेदारी है। “मैंने दीप जलाया है लेकिन प्रकाश देवी का है,” ऐसा कहते हुए स्वामीजी ने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रत्येक व्यक्ति से अपनी भूमिका निभाने का आह्वान किया।
अभिनव गविसिद्धेश्वर स्वामीजी ने सालूमरदा थिम्मक्का और हरेकला हजब्बा के उदाहरण देते हुए लोगों से पेड़-पौधे लगाने तथा समाजोपयोगी कार्यों में योगदान देने की अपील की। उन्होंने कहा कि केवल तकनीकी विकास पर्याप्त नहीं है। भोजन को डाउनलोड नहीं किया जा सकता। अन्न उत्पादन के लिए किसान का पसीना जमीन पर गिरना जरूरी है। इसलिए कृषि और किसानों के योगदान को समझना तथा उनका सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने माताओं से अपील की कि वे बच्चों को केवल सामाजिक माध्यमों से परिचित कराने के बजाय कन्नड़ साहित्य, कविताएं और वचनों की शिक्षा दें। इससे कन्नड़ भाषा, साहित्य और संस्कृति को संरक्षित करने में मदद मिलेगी तथा आने वाली पीढ़ियों तक सांस्कृतिक विरासत पहुंच सकेगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / राकेश एम.बी.

