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कर्नाटक में भाजपा ने आबकारी विभाग में 6,000 करोड़ रुपये के वसूली घोटाले का लगाया आरोप

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कर्नाटक में भाजपा ने आबकारी विभाग में 6,000 करोड़ रुपये के वसूली घोटाले का लगाया आरोप


बेंगलुरु, 04 फ़रवरी (हि.स.)। कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने कांग्रेस सरकार पर आबकारी विभाग में वसूली घोटाले का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि यह सरकार जनता की सेवा के लिए नहीं, बल्कि पार्टी की तिजोरी भरने के लिए बनाई गई “एटीएम सरकार” बन चुकी है।

विजयेंद्र ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि आबकारी विभाग के माध्यम से हर वर्ष शराब दुकानों से तय मासिक रिश्वत के रूप में लगभग 252 करोड़ रुपये की अवैध वसूली की जा रही है। राज्य में मौजूद 2,000 से अधिक सीएल-7 लाइसेंसधारकों से प्रति लाइसेंस 50 लाख से एक करोड़ रुपये तक की रिश्वत देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इस प्रकार पूरे घोटाले की राशि लगभग 6,000 करोड़ रुपये तक पहुंचती है।

भाजपा नेता ने दावा किया कि यह वसूली व्यवस्था घड़ी की तरह सुनियोजित ढंग से चलती है। हर साल लक्ष्य तय किए जाते हैं और हर महीने की 10 तारीख को वसूली की जाती है। भुगतान न करने वालों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि लाइसेंस जारी करने, नवीनीकरण, स्थानांतरण और नाम परिवर्तन सहित हर चरण में रिश्वत की मांग की जाती है। वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर कनिष्ठ कर्मचारियों तक रिश्वत की श्रृंखला निरंतर चल रही है।

विजयेंद्र ने इसे प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि मंत्रियों की सहमति से चलाया गया संगठित वसूली रैकेट बताया। उन्होंने कहा कि आबकारी मंत्री आर.बी. तिम्मापुर के कथित ऑडियो बयान इस बात का प्रमाण हैं कि कांग्रेस सरकार कर्नाटक की संपत्ति को पार्टी फंड में बदलने वाला विशाल एटीएम बन गई है। इसके अलावा विजयेंद्र ने आरोप लगाया कि ऐसे घोटाले अन्य विभागों में भी मौजूद हैं।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि मामले से जुड़े ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं, शिकायतें दर्ज की गई हैं और गिरफ्तारियां भी हुई हैं। विजयेंद्र ने आबकारी मंत्री आर.बी. तिम्मापुर से तत्काल इस्तीफा देने की मांग की और कहा कि कर्नाटक कांग्रेस पार्टी की निजी एटीएम मशीन नहीं है। उन्होंने कांग्रेस हाईकमान से पूछा कि 6,000 करोड़ की राशि आखिर कहां गई, इसका जवाब जनता को दिया जाना चाहिए।--------------

हिन्दुस्थान समाचार / राकेश महादेवप्पा