गांवों में स्मार्ट जल प्रबंधन की नई मिसाल, आईआईटी मद्रास ने बदली वल्लिपुरम की तस्वीर
पेयजल से कचरा प्रबंधन तक तकनीक का इस्तेमाल, पांच जल टैंकों पर आईओटी सेंसर से निगरानी
तीन पेयजल संयंत्र स्थापित, दो दिन में विद्यार्थियों ने जुटाया 300 किलो अजैविक कचरा
2,000 की आबादी वाले गांव में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की पहल
चेन्नई, 28 अक्टूबर (हि.स.)। सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और कचरा प्रबंधन की चुनौतियों के बीच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (आईआईटी मद्रास) ने ग्रामीण विकास का ऐसा मॉडल तैयार किया है, जिसमें आधुनिक तकनीक और सामुदायिक भागीदारी को एक साथ जोड़ा गया है। तमिलनाडु के चेंगलपट्टू जिले की वल्लिपुरम ग्राम पंचायत में जल उपचार, पानी की गुणवत्ता की स्मार्ट निगरानी और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की परियोजना सफलतापूर्वक लागू करने के बाद सुविधाएं स्थानीय हितधारकों को सौंप दी गई हैं।
दरअसल, परियोजना के तहत स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तीन पेयजल उपचार संयंत्र स्थापित किए गए। पांच जल टैंकों और उपचार प्रणालियों पर आईओटी आधारित सेंसर लगाए गए, जबकि घरेलू कचरे के संग्रहण, पुनर्चक्रण और जैविक कचरे से खाद बनाने की व्यवस्था विकसित की गई। इसका उद्देश्य ग्रामीणों को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के साथ स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण की स्थायी आदतें विकसित करना है।
2,000 ग्रामीणों के लिए तैयार हुआ मॉडल
आईआईटी मद्रास के जल प्रबंधन एवं नीति केंद्र एक्वामैप (AquaMAP) ने 'स्वच्छ एवं स्वस्थ ग्राम विकास कार्यक्रम' के तहत यह परियोजना लागू की। सिंगापुर स्थित लियन फाउंडेशन की लियन एनवायरनमेंटल फेलोशिप के माध्यम से नानयांग टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (एनटीयू), सिंगापुर ने वित्तीय सहायता दी।
वल्लिपुरम पंचायत की चार बस्तियों और छह वार्डों में करीब 2,000 लोग रहते हैं। स्कूलों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में किए गए कार्यों से 350 से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष लाभ मिला। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में वल्लिपुरम के अलावा 14 अन्य गांवों के लोग भी उपचार के लिए पहुंचते हैं। इससे सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता का लाभ आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचने की संभावना बढ़ी है।
28 अक्टूबर को आयोजित हस्तांतरण समारोह में वित्तीय सहायता देने वाले साझेदारों, जिला प्रशासन के अधिकारियों, पंचायत प्रतिनिधियों और अन्य हितधारकों ने भाग लिया। आईआईटी मद्रास के एक्वामैप केंद्र के प्रोफेसर लिगी फिलिप और प्रोफेसर बीएस मूर्ति ने परियोजना का समन्वय किया।
सेंसर से होगी पानी की गुणवत्ता की निगरानी
परियोजना के तहत दोनों सरकारी विद्यालयों में अल्ट्राफिल्ट्रेशन और पराबैंगनी किरणों (यूवी) पर आधारित पेयजल उपचार प्रणालियां स्थापित की गई हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में रिवर्स ऑस्मोसिस (आरओ) और यूवी तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।
पांच जल टैंकों और उपचार प्रणालियों पर लगाए गए आईओटी सक्षम सेंसर पानी के प्रवाह, पीएच स्तर, मैलापन और कुल घुलनशील ठोस पदार्थों (टीडीएस) की निगरानी करते हैं। इनसे प्राप्त आंकड़े मोबाइल एप पर भेजे जाते हैं, जिससे दूर बैठकर भी जल गुणवत्ता और संयंत्रों के संचालन पर नजर रखी जा सकती है। नियमित प्रयोगशाला परीक्षण और सेंसर अंशांकन के माध्यम से व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखने का प्रयास किया गया है।
यह व्यवस्था जल उपचार की विकेंद्रीकृत तकनीक को ग्रामीण संस्थानों तक पहुंचाने का उदाहरण है। इससे पानी की गुणवत्ता की निगरानी और उपचार प्रणालियों के नियमित संचालन में मदद मिल सकती है।
कचरे के संग्रहण से खाद बनाने तक व्यवस्था
गांव में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए बैटरी से चलने वाला कचरा संग्रहण वाहन उपलब्ध कराया गया। अजैविक कचरे के संग्रहण और जैविक कचरे से खाद बनाने के लिए ठोस अपशिष्ट प्रबंधन केंद्र बनाया गया। ग्रामीणों को घर पर कचरा अलग-अलग रखने, प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करने और कचरा जलाने से बचने के लिए जागरूक किया गया।
विद्यालयों और समुदाय में आयोजित कार्यक्रमों के माध्यम से हाथ धोने, पानी की बोतलों की सफाई, सुरक्षित पेयजल के इस्तेमाल और कचरे के उचित निस्तारण पर जोर दिया गया। युवाओं, महिलाओं और अन्य ग्रामीणों के लिए क्षमता निर्माण गतिविधियां भी आयोजित की गईं, ताकि गांव की स्वच्छता बनाए रखने में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
78.3 प्रतिशत लोग करते हैं कचरे का पृथक्करण
परियोजना के प्रभाव आकलन में सामने आया कि सर्वेक्षण में शामिल सभी स्कूली विद्यार्थियों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के आगंतुकों ने उपचारित पानी का उपयोग किया। उन्होंने पानी की गुणवत्ता और स्वाद के प्रति संतुष्टि भी जताई। स्कूल में पेयजल की उपलब्धता से विद्यार्थियों को घर से पानी लाने की जरूरत भी कम हुई।
सर्वेक्षण में 78.3 प्रतिशत प्रतिभागियों ने घरेलू कचरे को अलग-अलग करने की जानकारी दी, जबकि 83.33 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे गैर-जैव निम्नीकरणीय प्लास्टिक नहीं जलाते। जागरूकता अभियानों और सफाई कर्मचारियों के प्रोत्साहन ने इन व्यवहारगत बदलावों में भूमिका निभाई।
विद्यार्थियों ने महज दो दिनों में 300 किलोग्राम अजैविक कचरा एकत्र किया। यह पहल विद्यालयों के माध्यम से बच्चों में पर्यावरणीय जिम्मेदारी विकसित करने और परिवारों की स्वच्छता संबंधी आदतों को प्रभावित करने की क्षमता भी दर्शाती है।
'स्वच्छ पेयजल और स्वस्थ वातावरण बुनियादी जरूरत'
हस्तांतरण समारोह में एक्वामैप केंद्र की समन्वयक प्रोफेसर लिगी फिलिप ने कहा कि स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्यकर वातावरण तक पहुंच स्वस्थ जीवन की बुनियादी जरूरत है। उन्होंने कहा कि लियन फाउंडेशन एनवायरनमेंटल फेलोशिप और एनटीयू सिंगापुर के सहयोग से आईआईटी मद्रास को वल्लिपुरम के विद्यार्थियों और ग्रामीणों तक ये आवश्यक सुविधाएं पहुंचाने में सहायता मिली। उन्होंने लियन फाउंडेशन, एनटीयू सिंगापुर, आईआईटी मद्रास, सरकारी अधिकारियों, निर्वाचित पंचायत निकाय और स्थानीय समुदाय के योगदान के प्रति आभार जताया। उनके अनुसार, इस सहयोगात्मक मॉडल में तमिलनाडु और देश के अन्य हिस्सों में अपनाए जाने की व्यापक संभावनाएं हैं।
वल्लिपुरम पंचायत की अध्यक्ष सोबिया अमुल पार्थसारथी ने कहा कि आईआईटी मद्रास की पहल से गांव में बच्चों के लिए सुरक्षित पेयजल, प्रभावी कचरा प्रबंधन और जल गुणवत्ता की स्मार्ट निगरानी जैसी सुविधाएं विकसित हुई हैं। उन्होंने कहा कि इस हस्तक्षेप से गांव को स्वच्छ, स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य की ओर बढ़ने में मदद मिली है। उन्होंने गांव को सशक्त बनाने और दूसरे क्षेत्रों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने में संस्थान के सहयोग के प्रति आभार जताया।
वल्लिपुरम सरकारी उच्च विद्यालय की प्रधानाध्यापिका गीता बी. ने कहा कि एक्वामैप की पहल ने विद्यालय में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के साथ हाथों की स्वच्छता और कचरा प्रबंधन को बढ़ावा दिया है। तकनीकी सहयोग और शैक्षिक गतिविधियों से विद्यार्थियों में स्वस्थ आदतों, पर्यावरणीय जिम्मेदारी और सामुदायिक सेवा की भावना विकसित हो रही है।परियोजना के तहत बुनियादी ढांचे के निर्माण के साथ जल गुणवत्ता की निगरानी, नियमित रखरखाव, पर्यावरण जागरूकता और सामुदायिक सहभागिता पर काम किया गया। सुविधाओं के हस्तांतरण के बाद उनके नियमित संचालन की जिम्मेदारी पंचायत और स्थानीय हितधारकों पर होगी।
उन्होंने कहा, जल उपचार प्रणालियों का रखरखाव, नियमित जांच, सेंसर अंशांकन और ग्रामीणों की निरंतर भागीदारी इस मॉडल के लाभों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण होंगे। अब वल्लिपुरम की यह पहल से तकनीक, स्थानीय प्रशासन और समुदाय के समन्वय से सुरक्षित पेयजल और टिकाऊ कचरा प्रबंधन की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। स्थानीय जरूरतों के अनुरूप इसे दूसरे गांवों में अपनाने की संभावनाएं भी मौजूद हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

