डिजिटल इंडिया के दौर में सरकारी वेबसाइटों से 'मूल हिन्दी' गायब, गृह मंत्री को लिखा पत्र
- हिन्दी का मूल स्वरूप खत्म करने और संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप
लखनऊ, 23 अप्रैल (हि.स.)। देश में डिजिटल गवर्नेंस के विस्तार के बीच एक बड़ा भाषाई विवाद खड़ा हो गया है। सरकारी वेबसाइटों से मूल हिन्दी संस्करण हटाकर मशीनी अनुवाद आधारित सिस्टम लागू करने के खिलाफ अब आवाजें तेज हो गई हैं। इस मुद्दे को लेकर एक विस्तृत और तीखा विरोध पत्र सीधे गृह मंत्रालय और संसदीय राजभाषा समिति तक भेजा गया है, जिसमें इसे हिन्दी की संवैधानिक स्थिति पर सीधा प्रहार बताया गया है।
सिद्धार्थनगर, खटाऊ मिल लेन, बोरीवली पूर्व, मुंबई निवासी प्रवीण कुमार जैन की ओर से भेजे गए इस पत्र में आरोप है कि भारत सरकार की अधिकांश वेबसाइटों पर अब अंग्रेजी ही मूल भाषा के रूप में बची है। जबकि हिन्दी को केवल अनुवाद टूल्स भाषिणी और अनुवादिनी के सहारे दिखाया जा रहा है। इससे हिन्दी की स्थिति राजभाषा से घटकर अनुवाद की भाषा तक सीमित हो गई है।
संवैधानिक उल्लंघन का आरोप
पत्र में सबसे गंभीर सवाल संविधान के अनुच्छेद 343 और राष्ट्रपति के आदेशों के उल्लंघन को लेकर उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिन्दी है, जिसका अर्थ मूल भाषा होना चाहिए, न कि अनुवादित विकल्प। साथ ही 2 जुलाई 2008 के उस आदेश का भी हवाला दिया गया है, जिसमें सभी सरकारी वेबसाइटों को द्विभाषी बनाए रखना अनिवार्य बताया गया था। आरोप है कि वर्तमान व्यवस्था इस आदेश की भी अनदेखी कर रही है।
विकल्प या प्रतिस्थापन?
विरोध पत्र में साफ कहा गया है कि भाषिणी और अनुवादिनी जैसे टूल्स अन्य भारतीय भाषाओं के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन हिन्दी के लिए इन्हें प्रतिस्थापन के रूप में लागू करना गलत है। आरोप है कि इन टूल्स का अनुवाद स्तर बेहद कमजोर और संदर्भहीन है,जिससे सरकारी सूचनाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है। पत्र में यह भी सवाल उठाया गया है कि जब हर विभाग में राजभाषा अधिकारी और अनुवादक मौजूद हैं तो मशीनी अनुवाद पर पूरी निर्भरता का क्या औचित्य है?
भाषाई भेदभाव के आरोप
मामले ने और तूल तब पकड़ लिया जब भाषिणी प्लेटफॉर्म को लेकर कई तकनीकी और भाषाई खामियों का जिक्र किया गया। आरोप है कि प्लेटफॉर्म का लोगों और इंटरफेस मुख्यतः अंग्रेजी में है। रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया में देवनागरी में नाम लिखने पर प्रतिबंध जैसी स्थिति है। यूजर को भेजे जाने वाले ईमेल भी केवल अंग्रेजी में है। खुद प्लेटफॉर्म की हिन्दी वेबसाइट तक पूर्ण रूप से विकसित नहीं है। इसे डिजिटल युग में अंग्रेजी थोपने की नीति करार दिया गया है।
राजभाषा तंत्र पर भी सवाल
पत्र में सिर्फ तकनीकी बदलाव ही नहीं, बल्कि पूरे राजभाषा तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। कहा गया है कि करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सरकारी दफ्तरों में हिन्दी का वास्तविक इस्तेमाल बेहद सीमित है। बैंकिंग से लेकर ऑनलाइन आवेदन तक, द्विभाषी व्यवस्था अक्सर अनुपस्थित रहती है। राजभाषा रिपोर्टों में 100 प्रतिशत अनुपालन दिखाया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है। यहां तक कहा गया कि अगर स्थिति ऐसी ही रही तो पूरे राजभाषा तंत्र की उपयोगिता पर पुनर्विचार करना पड़ेगा।
प्रमुख मांगें
पत्र में सरकार से चार बड़ी मांगें की गई हैं। सभी सरकारी वेबसाइटों पर मूल हिन्दी विकल्प तत्काल बहाल किया जाए। भाषिणी और अनुवादिनी का उपयोग हिन्दी के लिए नहीं, अन्य भाषाओं तक सीमित रखा जाए। सभी डिजिटल प्लेटफॉर्म-वेबसाइट, ऐप, लोगो और रजिस्ट्रेशन पूरी तरह द्विभाषी बनाए जाएं। राजभाषा नीति के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।
भारत में भाषा का सवाल हमेशा रहा संवेदनशील
भाषा का सवाल भारत में हमेशा संवेदनशील रहा है। ऐसे में डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिन्दी की भूमिका को लेकर उठी यह बहस आने वाले समय में बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन सकती है। खासकर तब, जब सरकार डिजिटल इंडिया और समावेशी शासन की बात कर रही है। अब नजर गृह मंत्रालय और संसदीय राजभाषा समिति पर है कि क्या हिन्दी को उसका मूल स्थान वापस मिलेगा या मशीनी अनुवाद ही नई व्यवस्था तय करेगा?
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ .राजेश

