(विशेष) यादें छोड़ गए गौरांग व्यास...धुनों के साथ दिलों में जिंदा रहेंगे, प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया याद
अहमदाबाद, 03 सितंबर (हि.स.)। गुजराती फिल्म संगीत, लोकसंगीत और सुगम संगीत के दिग्गज संगीतकार एवं गायक गौरांग व्यास भले ही
हमारे बीच से चले गए हैं, लेकिन वे अपनी ऐसी अमिट यादें छोड़ गए हैं जो कभी भी नही भुलायी जा सकती हैं। गौरांग व्यास हमेशा ही सशक्त और
समृद्ध धुनों के साथ हम सबके दिलों में जिंदा रहेंगे।
यह सत्य है गौरांग के निधन से गुजरात का समाज और संगीत जगत शोक में है, लेकिन उनके संगीत की समृद्ध विरासत को आने वाली पीढ़ियां
सदियों तक याद रखेंगी। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी शोक व्यक्त करते हुए उन्हें याद किया और गुजराती संगीत के क्षेत्र में उनके योगदान को रेखांकित किया। बुधवार देर रात 87 वर्ष की आयु में गौरांग व्यास अपने अहमदाबाद में अंतिम सांस ली।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर गौरांग व्यास के साथ अपनी एक तस्वीर साझा करते हुए उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि गुजराती संगीत जगत के प्रसिद्ध संगीतकार गौरांग व्यास के निधन से वे बेहद दुखी हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि अपने पिता और प्रख्यात संगीतकार अविनाश व्यास की समृद्ध संगीत परंपरा को आगे बढ़ाते हुए गौरांग व्यास ने गुजराती संगीत के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
पांच वर्ष की उम्र में शुरू हुई थी संगीत साधना
प्रसिद्ध संगीतकार और गीतकार स्वर्गीय अविनाश व्यास के पुत्र गौरांग व्यास को संगीत की शिक्षा और संस्कार परिवार से ही मिले थे। उन्होंने मात्र पांच वर्ष की उम्र में हारमोनियम पर ‘वैष्णव जन’ बजाना शुरू कर दिया था। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा करने के बाद उन्होंने मुंबई की एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कंपनी में नौकरी भी की, लेकिन संगीत के प्रति उनका लगाव उन्हें ज्यादा दिनों तक नौकरी में नहीं रख सका। उन्होंने नौकरी छोड़कर अपना पूरा जीवन संगीत साधना को समर्पित कर दिया।
पिता के सहायक से अपनी अलग पहचान तक का सफर
गौरांग व्यास ने अपने पिता अविनाश व्यास के साथ ‘जैसल तोरल’ फिल्म में सहायक के रूप में काम करते हुए फिल्म संगीत की बारीकियां सीखीं। ‘लाखो फूलाणी’ से उन्होंने स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। इसके बाद ‘भवनी भवई’, ‘मणियारा’, ‘नसीबनी बलिहारी’, ‘पारकी थापण’ और ‘लीलुडी धरती’ सहित 100 से अधिक गुजराती फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया। उनकी धुनों में गुजराती लोक परंपरा की मिठास के साथ प्रयोगशीलता भी दिखाई देती थी।
रांग व्यास ने गुजराती सिनेमा में देश के कई प्रतिष्ठित गायकों के साथ काम किया। लता मंगेशकर, आशा भोंसले, किशोर कुमार, मन्ना डे, महेंद्र कपूर, सुमन कल्याणपुर, भूपेंद्र सिंह और प्रफुल्ल दवे जैसे दिग्गज गायकों ने उनकी रचनाओं को अपनी आवाज दी। ‘दीकरी तो पारकी थापण कहेवाय’, ‘मणियारा ते हळु हळु थई रे वियो’ और ‘हूं तू तू तू, जामी रमतनी ऋतु’ जैसी रचनाएं उनकी संगीत प्रतिभा की पहचान बनीं।
फिल्मों से आगे गरबा और सुगम संगीत तक
गौरांग व्यास की संगीत यात्रा केवल फिल्मों तक सीमित नहीं थी। उन्होंने सुगम संगीत की 500 से अधिक रचनाओं को स्वरबद्ध किया। गरबा, लोकसंगीत और भजन के क्षेत्र में भी उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया। ‘लाख लाख दीवडा’, ‘घोर अंधारी रे रातलडीमा’ और ‘तू रंगाई जाने रंगमा’ जैसी रचनाओं ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके प्रमुख एलबमों में ‘जालारामनी झूंपड़ी’, ‘भजन अनमोल’, ‘गंगा सतीना भजनों’, ‘कहत कबीर’, ‘जालाराम बापानुं हालरड़ु’, ‘प्राचीन प्रभातियां’ और ‘नॉन स्टॉप डांडिया-रास’ शामिल हैं।
सम्मान और पुरस्कारों की लंबी सूची
गौरांग व्यास को गुजराती फिल्मों में उत्कृष्ट संगीत निर्देशन के लिए 11 राज्य स्तरीय पुरस्कार मिले। उन्हें जीआईएफए की ओर से गोल्डन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 2022 में गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ प्रदान किया था। वर्ष 2024 में गुजरात राज्य संगीत अकादमी और गुजरात पर्यटन की ओर से भी उनके योगदान के लिए विशेष सम्मान किया गया। गौरांग व्यास ने अपने पिता अविनाश व्यास की विरासत को आगे बढ़ाया, लेकिन अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता से उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी स्वतंत्र पहचान कायम की।
उनका जीवन भले ही थम गया हो, लेकिन उनकी धुनें नहीं थमेंगी। गुजराती फिल्मों के गीतों, गरबा की ताल, भजनों और सुगम संगीत में गौरांग व्यास की यादें हमेशा गूंजती रहेंगी। शायद यही किसी कलाकार की सबसे बड़ी विरासत होती है—वह चला जाता है, लेकिन उसकी कला लोगों के दिलों में हमेशा जीवित रहती है।
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / यजुवेंद्र दुबे

