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गंगा-यमुना की सफाई के लिए केंद्र की नई पहल, दिल्ली के दो नालों पर शुरू की एनबीएस परियोजनाएं

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गंगा-यमुना की सफाई के लिए केंद्र की नई पहल, दिल्ली के दो नालों पर शुरू की एनबीएस परियोजनाएं


नई दिल्ली, 09 जुलाई (हि.स.)। केंद्र सरकार ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के पुनर्जीवन के लिए प्रकृति आधारित समाधान (एनबीएस) को बढ़ावा देते हुए दिल्ली में यमुना में गिरने वाले शास्त्री पार्क और कैलाश नगर नालों पर दो पायलट परियोजनाएं शुरू की हैं। इन परियोजनाओं के माध्यम से शहरी नालों के प्रदूषित जल के उपचार के लिए निर्मित आर्द्रभूमि (कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड) आधारित मॉडल विकसित किया जाएगा। साथ ही प्रकृति आधारित नदी पुनर्जीवन उपायों के व्यापक उपयोग के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं।

केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने गुरुवार को बताया कि नदी पुनर्जीवन के लिए केवल सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) और सीवर नेटवर्क पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) अब पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) बनाए रखने और नदी पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए प्रकृति आधारित समाधानों को भी अपनी रणनीति का हिस्सा बना रहा है। इसका उद्देश्य दीर्घकालिक और टिकाऊ नदी पुनर्जीवन सुनिश्चित करना है।

मंत्रालय के अनुसार, एनएमसीजी सतत नदी पुनर्जीवन (एसआरआर) कार्यक्रम के तहत प्रकृति आधारित समाधानों को मुख्यधारा में ला रहा है। इसके अंतर्गत शहरी नालों के इन-सीटू उपचार के लिए निर्मित आर्द्रभूमि आधारित पायलट परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। साथ ही अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण को भी बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि इन उपायों को बड़े स्तर पर अपनाया जा सके।

दिल्ली में यमुना में गिरने वाले शास्त्री पार्क नाले और कैलाश नगर नाले पर विकसित की जा रही दोनों परियोजनाओं की संयुक्त उपचार क्षमता लगभग 10 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) होगी। ये परियोजनाएं शहरी नाला प्रबंधन में कम ऊर्जा खपत वाली, जलवायु अनुकूल और टिकाऊ तकनीकों को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

पारंपरिक अपशिष्ट जल उपचार प्रणालियों के विपरीत इन परियोजनाओं में भारी यांत्रिक ढांचे और ऊर्जा-आधारित प्रक्रियाओं पर निर्भरता कम होगी। जल प्रवाह को नियंत्रित करने और जलधारण अवधि बढ़ाने के लिए पत्थर की चिनाई संरचनाएं विकसित की जाएंगी। इसके अलावा ठोस अपशिष्ट हटाने के लिए रॉक फिल्टर, पोषक तत्वों के अवशोषण और ऑक्सीजन स्थानांतरण के लिए जलीय वनस्पतियां तथा फाइटो-रिमेडिएशन तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इसके जरिए प्राकृतिक प्रक्रियाओं से प्रदूषकों, अतिरिक्त पोषक तत्वों और कुछ भारी धातुओं को कम किया जाएगा। इससे जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ेगी, जैविक प्रदूषण घटेगा और नदी की जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा।

दोनों परियोजनाओं पर कार्य भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। कैलाश नगर नाले पर डी-स्लजिंग और डी-सिल्टिंग का कार्य पूरा किया जा चुका है। वर्तमान में ईंटों की लाइनिंग का काम चल रहा है और अगले चरण में रॉक फिल्टर लगाए जाएंगे। वहीं, शास्त्री पार्क नाले पर डी-स्लजिंग और डी-सिल्टिंग का प्रारंभिक कार्य भी किया जा रहा है, जिसके बाद पत्थर की संरचनाएं, रॉक फिल्ट्रेशन सिस्टम और जलीय पौधों की स्थापना की जाएगी।

मंत्रालय के अनुसार, इन परियोजनाओं से प्रतिदिन लगभग 10 एमएलडी अपशिष्ट जल का उपचार किया जा सकेगा। साथ ही, ये गंगा बेसिन में शहरी नालों के प्रबंधन के लिए किफायती, विस्तार योग्य और अनुकरणीय मॉडल के रूप में विकसित होंगी।

इसके साथ ही नदी पुनर्जीवन के लिए तकनीकी क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से अगस्त 2025 से मार्च 2026 के बीच छह प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनसे 100 से अधिक अधिकारियों और विशेषज्ञों को लाभ मिला।

मंत्रालय ने यह भी जानकारी दी कि पायलट परियोजनाओं के बाद गंगा की सहायक नदी काली के पुनर्जीवन के लिए उत्तर प्रदेश के खतौली में भी कंस्ट्रक्टेड वेटलैंड परियोजना शुरू की जा रही है। इसका उद्देश्य घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण को स्रोत स्तर पर कम कर नदी की जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक तंत्र में सुधार लाना है।

हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर