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फरक्का जल संधि पर बढ़ी सियासत, बिहार के बाद बंगाल ने भी केंद्र के सामने रखी अपनी चिंता

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फरक्का जल संधि पर बढ़ी सियासत, बिहार के बाद बंगाल ने भी केंद्र के सामने रखी अपनी चिंता


कोलकाता, 21 सितंबर (हि.स.)। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को हुई फरक्का जल संधि की अवधि इसी साल दिसंबर में समाप्त होने वाली है। संधि के नवीकरण से पहले बिहार और पश्चिम बंगाल ने अपने-अपने हितों और चिंताओं को केंद्र सरकार के सामने रखना शुरू कर दिया है।

बिहार में जेडीयू मौजूदा समझौते को उसी स्वरूप में आगे बढ़ाने के बजाय भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नई व्यवस्था और वैज्ञानिक समीक्षा की मांग कर रही है, वहीं पश्चिम बंगाल सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि किसी भी नई व्यवस्था में राज्य के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने केंद्र के समक्ष मुख्य रूप से सूखे मौसम में हुगली नदी में पर्याप्त जल प्रवाह बनाए रखने का मुद्दा उठाया है।

राज्य का कहना है कि फरक्का से पर्याप्त पानी हुगली में पहुंचना जरूरी है, क्योंकि इसका सीधा संबंध हुगली की नौवहन क्षमता और कोलकाता स्थित श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट के संचालन से है। जल प्रवाह में कमी होने पर गाद जमने और नौवहन संबंधी समस्याओं का असर बंदरगाह, व्यापार और राज्य की आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।

इसके साथ ही पश्चिम बंगाल ने मालदा, मुर्शिदाबाद और नदिया में लगातार हो रहे नदी कटाव, गाद जमने और बाढ़ की समस्या को भी केंद्र के सामने रखा है। राज्य का तर्क है कि भविष्य की जल व्यवस्था केवल भारत और बांग्लादेश के बीच पानी के बंटवारे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि नदी के पर्यावरण, बदलते जल प्रवाह, भविष्य की जल जरूरतों और राज्य की विकास संबंधी आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

इन मुद्दों पर राज्य सरकार ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की आंतरिक समिति के समक्ष अपनी रिपोर्ट और चिंताएं रखी हैं तथा भारत-बांग्लादेश ज्वाइंट रिवर्स कमीशन के माध्यम से विस्तृत चर्चा की जरूरत पर जोर दिया है।

वहीं, बिहार में जेडीयू ने फरक्का व्यवस्था को लेकर अलग तरह की चिंता जताई है। पार्टी का कहना है कि गंगा फरक्का पहुंचने से पहले बिहार से होकर गुजरती है, लेकिन जल बंटवारे से जुड़े निर्णयों में राज्य की भूमिका सीधे तौर पर पर्याप्त नहीं है। जेडीयू ने गाद जमने, नदी तल के ऊंचे होने, कटाव और बाढ़ जैसी समस्याओं का मुद्दा उठाते हुए 1996 की संधि को उसी रूप में नवीनीकृत करने के बजाय भविष्य की जरूरतों के अनुरूप नई व्यवस्था बनाने की मांग की है। पार्टी ने 2050 तक बिहार की पेयजल, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों को ध्यान में रखने तथा बातचीत में राज्य को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग भी की है।

फरक्का बैराज के सुपरिटेंडेंट इंजीनियर-कम-कोऑर्डिनेटर रामजीत बर्मा ने बताया कि फरक्का जल संधि को लेकर बिहार सरकार की ओर से पत्र भेजा गया है, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार ने भी अपने हितों और चिंताओं को मंत्रालय के समक्ष रखा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संधि से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले केंद्र सरकार के स्तर पर लिए जाएंगे और संबंधित राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ विचार-विमर्श किया जाएगा।

बर्मा के मुताबिक फरक्का बैराज की भूमिका मुख्य रूप से संधि लागू होने के बाद उसके प्रावधानों के क्रियान्वयन तक सीमित रहती है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि पानी के संयुक्त अवलोकन और माप का काम फरक्का बैराज द्वारा नहीं, बल्कि केंद्रीय जल आयोग के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से किया जाता है। चूंकि फरक्का बैराज एक राष्ट्रीय परियोजना है, इसलिए संधि को लेकर अंतिम निर्णय राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार के स्तर पर लिया जाएगा।

इस पूरी प्रक्रिया में विदेश मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।

दरअसल, फरक्का बैराज और फरक्का जल संधि दो अलग-अलग विषय हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा पर बने फरक्का बैराज को 1975 में चालू किया गया था। इसका उद्देश्य गंगा के पानी को फरक्का फीडर नहर के जरिए हुगली में पहुंचाना था, ताकि गाद की समस्या को कम किया जा सके और कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता को बनाए रखने में मदद मिले।

दूसरी ओर, 1996 की संधि भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे से संबंधित है।

फरक्का के बाद गंगा बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहां इसे पद्मा कहा जाता है। बांग्लादेश लंबे समय से यह चिंता जताता रहा है कि सूखे मौसम में फरक्का से पानी मोड़े जाने के कारण उसके हिस्से में उपलब्ध जल प्रभावित होता है। इसका असर कृषि, मत्स्य पालन, पर्यावरण और दक्षिण-पश्चिमी बांग्लादेश की आजीविका पर पड़ने की बात वहां उठती रही है। इसी पृष्ठभूमि में 1996 में 30 वर्ष की गंगा जल बंटवारा संधि हुई थी। इसके तहत हर वर्ष 1 जनवरी से 31 मई तक सूखे मौसम में फरक्का पर उपलब्ध पानी को निर्धारित फार्मूले के आधार पर बांटा जाता है।

अब संधि की अवधि समाप्त होने से पहले भारत और बांग्लादेश की तकनीकी टीमें फरक्का और बांग्लादेश के हार्डिंग ब्रिज पर जल प्रवाह से जुड़े आंकड़े जुटा रही हैं। मई में कोलकाता में भारत-बांग्लादेश ज्वाइंट रिवर्स कमीशन की बैठक भी हुई थी और प्रतिनिधिमंडलों ने फरक्का में संयुक्त रूप से जल प्रवाह का निरीक्षण किया था।

इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि बिहार जहां गाद, कटाव और बाढ़ के साथ अपनी भविष्य की जल जरूरतों को लेकर अधिक हिस्सेदारी की मांग कर रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल हुगली में पर्याप्त जल प्रवाह, कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता और राज्य के नदी किनारे के इलाकों की समस्याओं को नई व्यवस्था में शामिल कराने की कोशिश कर रहा है।

दूसरी ओर बांग्लादेश अपने हिस्से के पानी और नदी के पर्यावरणीय हितों को लेकर अपनी चिंताएं रखता रहा है।

ऐसे में दिसंबर 2026 से पहले केंद्र सरकार के सामने यह तय करने की चुनौती है कि 1996 की व्यवस्था को उसी रूप में आगे बढ़ाया जाए, उसमें बदलाव किया जाए या भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए कोई नई व्यवस्था तैयार की जाए। बदलती जलवायु, गंगा के बदलते जल प्रवाह, बढ़ती आबादी और राज्यों की बढ़ती जल जरूरतों को देखते हुए आने वाले वर्षों के लिए स्थायी जल प्रबंधन व्यवस्था तैयार करना इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

फरक्का का मुद्दा अब केवल भारत-बांग्लादेश के बीच पानी बांटने तक सीमित नहीं रह गया है। यह बिहार की जल सुरक्षा, पश्चिम बंगाल की आर्थिक और पर्यावरणीय जरूरतों, कोलकाता बंदरगाह की नौवहन व्यवस्था, नदी कटाव और बाढ़ तथा भारत-बांग्लादेश संबंधों से जुड़ा व्यापक विषय बन चुका है। अब निगाहें केंद्र सरकार की उस प्रक्रिया पर हैं, जिसके जरिए सभी संबंधित पक्षों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए संधि के भविष्य को लेकर फैसला लिया जाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष विश्वकर्मा