मेघालय और आंध्र प्रदेश में मकड़ियों की दो नई प्रजातियों की खोज, भारत की जैव विविधता को मिली नई पहचान
कोलकाता, 17 जुलाई (हि.स.)। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) के वैज्ञानिकों ने मेघालय की भूमिगत गुफाओं और आंध्र प्रदेश के घने वनों की ऊपरी छतरी (कैनोपी) से मकड़ियों की दो नई प्रजातियों की खोज कर भारत की जैव विविधता के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इन दोनों खोजों पर आधारित शोध अंतरराष्ट्रीय स्तर की समीक्षित वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन नई प्रजातियों की पहचान से देश की अब तक कम ज्ञात सूक्ष्म जैव विविधता और विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्रों को समझने में नई मदद मिलेगी।
जेडएसआई की ओर से शुक्रवार को जारी जानकारी के अनुसार, पहली नई प्रजाति 'सिमोनिया लॉबह' मेघालय के लॉबह क्षेत्र स्थित क्रम लॉबह गुफा से खोजी गई है। यह अत्यंत सूक्ष्म गुफा-निवासी मकड़ी है, जिसकी लंबाई दो मिलीमीटर से भी कम है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका शंकु के आकार का जाल है, जो गुलेल की तरह कार्य करता है। मकड़ी इस जाल की सहायता से उड़ने वाले छोटे कीटों को तेजी से अपनी ओर खींचकर शिकार करती है। इस खोज के साथ ही 'सिमोनिया' वंश का भारत में पहला आधिकारिक रिकॉर्ड भी दर्ज हो गया है।
दूसरी नई प्रजाति 'हामाटालिवा पापिकोंडा' आंध्र प्रदेश के पापिकोंडा राष्ट्रीय उद्यान के मिश्रित पर्णपाती वनों की ऊपरी शाखाओं से खोजी गई है। लगभग पांच मिलीमीटर लंबी यह पीले रंग की शिकारी मकड़ी जाल नहीं बुनती, बल्कि अपनी तेज गति, कांटेदार पैरों और आठ आंखों की विशेष षट्कोणीय संरचना के सहारे शिकार करती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आंध्र प्रदेश में 'हामाटालिवा' वंश का यह पहला वैज्ञानिक रिकॉर्ड है।
मेघालय में खोजी गई प्रजाति पर शोध करने वाली टीम में जेडएसआई मुख्यालय, कोलकाता के वैज्ञानिक सुप्रदीप्त दत्ता, पुथूर पट्टाम्मल सुधिन, डॉ. सौविक सेन और डॉ. धृति बनर्जी के साथ जेडएसआई के पूर्वोत्तर क्षेत्रीय केंद्र, शिलांग के राजीब गोस्वामी शामिल थे। वहीं, आंध्र प्रदेश में मिली नई प्रजाति पर हुए अध्ययन का नेतृत्व उपासना भट्टाचार्य, पुथूर पट्टाम्मल सुधिन और डॉ. सौविक सेन ने किया।
जेडएसआई के अरैक्निडा अनुभाग के प्रभारी वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सौविक सेन ने कहा कि इस प्रकार की खोजें यह प्रमाणित करती हैं कि भारत के विविध प्राकृतिक आवासों में अब भी अनेक ऐसी प्रजातियां मौजूद हैं, जिन तक विज्ञान की पहुंच नहीं बन सकी है। उन्होंने कहा कि ये मकड़ियां आकार में बेहद छोटी हैं और सीमित भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं। इसलिए इनकी पहचान केवल विशेष वैज्ञानिक सर्वेक्षणों और गहन अनुसंधान के माध्यम से ही संभव हो पाती है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की निदेशक डॉ. धृति बनर्जी ने कहा कि प्रत्येक नई प्रजाति की खोज भारत की समृद्ध जैव विविधता को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि भूमिगत गुफाओं से लेकर घने वनों की ऊपरी परत तक फैले संवेदनशील प्राकृतिक आवासों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है। ऐसे पारिस्थितिक तंत्र न केवल दुर्लभ जीवों का आश्रय हैं, बल्कि भविष्य में नई प्रजातियों की खोज और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
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हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर

