संसद में व्यवधान को लेकर देवेगौड़ा ने सोनिया को लिखा पत्र, कहा– लोकतंत्र की परंपराओं को नुकसान पहुंचा रहा है विपक्ष का आचरण
नई दिल्ली, 16 मार्च (हि.स.)। पूर्व प्रधानमंत्री एवं राज्यसभा सदस्य एचडी देवेगौड़ा ने कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संसद में लगातार हो रहे हंगामे और विपक्षी दलों के व्यवहार पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि संसद के भीतर और परिसर में जिस प्रकार का अव्यवस्थित माहौल बनाया जा रहा है, उससे लोकतंत्र की बुनियाद को नुकसान पहुंच सकता है और इससे दीर्घकालिक कटुता पैदा होने का खतरा है।
देवेगौड़ा ने सोमवार को लिखे अपने पत्र में कहा कि वे बजट सत्र की शुरुआत से ही सोनिया गांधी को पत्र लिखना चाहते थे, लेकिन उन्हें उम्मीद थी कि समय के साथ स्थिति सामान्य हो जाएगी। हालांकि अब तक कोई सुधार नहीं दिखने पर उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करना जरूरी समझा।
पूर्व प्रधानमंत्री ने लिखा कि संसद और उसके परिसर में मुख्य रूप से विपक्षी दलों द्वारा जिस प्रकार का अराजक माहौल बनाया जा रहा है, उससे वे बेहद व्यथित हैं। अनियंत्रित गतिविधियों और नकारात्मक माहौल का प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर रूप से पड़ सकता है।
देवेगौड़ा ने अपने 65 वर्षों के राजनीतिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं के जमीनी स्तर से अपनी यात्रा शुरू की और एक विधायक तथा सांसद के रूप में लंबा समय बिताया है। अपने राजनीतिक जीवन का लगभग 90 प्रतिशत समय उन्होंने विपक्ष की बेंचों पर बैठकर गुजारा है।
उन्होंने सोनिया गांधी को याद दिलाया कि स्वयं उन्होंने भी लंबे समय तक विपक्ष में रहते हुए गरिमा और परिपक्वता के साथ अपनी भूमिका निभाई है। देवेगौड़ा ने लिखा कि यह संभवतः उनके जीवन का अंतिम संसदीय सत्र हो सकता है और इसलिए वे संसद की परंपराओं तथा गरिमा की बहाली के लिए अपनी बात रखना आवश्यक समझते हैं।
पत्र में उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष के नेता के नेतृत्व में कांग्रेस सांसदों द्वारा संसद के भीतर और बाहर अत्यधिक व्यवधान पैदा किया गया है। उन्होंने कहा कि संसद परिसर में धरना और रास्ता अवरुद्ध करना अभूतपूर्व है। हाल के समय में संसद में अत्यधिक नारेबाजी, पोस्टर प्रदर्शन और व्यक्तिगत टिप्पणियों जैसी घटनाएं देखने को मिली हैं, जो संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत हैं।
देवेगौड़ा ने लिखा कि संसद और संसदीय लोकतंत्र के बारे में उनकी समझ देश के संस्थापक नेताओं जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ. भीमराव आंबेडकर और मौलाना अबुल कलाम आजाद के मार्गदर्शन और शिक्षाओं से बनी है। अपने लंबे राजनीतिक अनुभव में उन्होंने संसद को इस तरह के अव्यवस्थित माहौल में पहले कभी नहीं देखा।
उन्होंने कहा कि अपने पूरे राजनीतिक जीवन में, चाहे कितनी भी उकसाने वाली परिस्थितियां क्यों न रही हों, उन्होंने कभी भी विरोध प्रदर्शन के लिए विधानसभा या संसद के ‘वेल’ में प्रवेश नहीं किया। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें यही राजनीतिक संस्कार सिखाए थे।
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि विपक्ष की भूमिका निश्चित रूप से आसान नहीं होती और सरकार की कमियों तथा अन्यायों को उजागर करना उसकी जिम्मेदारी होती है, लेकिन इसके लिए एक स्थापित और समय-परीक्षित संसदीय तरीका है। विरोध के दौरान विपक्षी नेताओं को अपनी गरिमा और सदन की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संसद सदस्य जब शपथ लेते हैं तो वे अप्रत्यक्ष रूप से संसद के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने की भी प्रतिबद्धता जताते हैं। ऐसे में नियमों और परंपराओं से बाहर जाकर सफलता हासिल करने की सोच उचित नहीं है।
देवेगौड़ा ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि जब उन्होंने राज्य और केंद्र स्तर पर सरकार चलाई, तब विपक्ष ने हमेशा संसद की परंपराओं का सम्मान किया और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए संयम बरता। उन्होंने कहा कि विरोध के बावजूद विपक्ष ने कभी संसद के प्रवेश द्वारों को अवरुद्ध नहीं किया और न ही संसद की सीढ़ियों पर बैठकर चाय, बिस्कुट और पकौड़े मंगाकर बैठक जैसा माहौल बनाया।
उन्होंने लिखा कि दुनिया भर में लोकतंत्र कई तरह के दबावों का सामना कर रहे हैं और ऐसे समय में विपक्ष को यह समझना चाहिए कि उसकी अतिशयता लोकतंत्र की स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि विपक्ष को संसदीय परंपराओं और प्रक्रियाओं का संरक्षक बनकर कार्य करना चाहिए।
पत्र के अंत में देवेगौड़ा ने सोनिया गांधी से आग्रह किया कि वे विपक्ष की सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक होने के नाते अपने दल के नेताओं और अन्य विपक्षी दलों से बातचीत करें। उन्होंने कहा कि अपने राजनीतिक अनुभव और परिपक्वता के आधार पर वे उन्हें यह समझाने का प्रयास करें कि ऐसा आचरण अंततः उनके अपने राजनीतिक भविष्य और उद्देश्यों को भी नुकसान पहुंचा सकता है।
देवेगौड़ा ने विश्वास जताया कि विपक्ष अपना विरोध जरूर दर्ज कराए, लेकिन ऐसा तरीका अपनाए जो 75 वर्षों में निर्मित लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसदीय परंपराओं को कमजोर न करे।
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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार

