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(समीक्षा) बैलेट पेपर की कसौटी पर कांग्रेस शून्य: चार राज्यों की 28 एमएलसी सीटों पर पीएम मोदी का तीखा तंज

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(समीक्षा) बैलेट पेपर की कसौटी पर कांग्रेस शून्य: चार राज्यों की 28 एमएलसी सीटों पर पीएम मोदी का तीखा तंज


विपक्ष की ईवीएम मांग पर तेज हुए सवाल

- डॉ. मयंक चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को एक ऐसे राजनीतिक सवाल को सार्वजनिक रूप से उठाया, जिसने विपक्ष के लंबे समय से चलाए जा रहे ईवीएम-विरोधी अभियान को सीधे चुनौती दे दी। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक, दरअसल इन चार बड़े राज्यों में विधान परिषद की कुल 28 सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजे सामने आने के कुछ घंटे बाद पीएम मोदी ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा कि ये चुनाव मतपत्रों के जरिए कराए गए थे। उन्होंने सीधा सवाल किया- “बताइए, कांग्रेस ने कितनी सीटें जीतीं?”

पोस्ट के साथ उन्होंने सोचने वाली इमोजी भी लगाई। एक तरह से देखें तो यह उस राजनीतिक विमर्श का जवाब था, जिसमें कांग्रेस समेत विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा ईवीएम में हेराफेरी करके चुनाव जीतती है और इसलिए बैलेट पेपर का इस्तेमाल होना चाहिए। नतीजे साफ थे। चारों राज्यों की 28 सीटों में कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। पार्टी पहले इनमें से चार सीटें अपने पास रखती थी। बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स के जरिए हुए इन चुनावों में भी वह एक भी सीट नहीं जीत सकी।

यह आंकड़ा अब बता रहा है कि जब मतपत्रों के जरिए ही चुनाव हुए और सीमित मतदाताओं वाले शिक्षकों तथा स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में भी कांग्रेस शून्य पर रही, तब ईवीएम-विरोधी तर्क का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि ये नतीजे साबित करते हैं कि कांग्रेस को जनता का समर्थन नहीं मिला। कांग्रेस वोट चोरी के आरोप लगाकर अपने खराब चुनावी प्रदर्शन से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। विपक्ष लंबे समय से कहता रहा है कि अगर बैलेट पेपर से चुनाव हों तो भाजपा की जीत की संभावना कम हो जाएगी, लेकिन इन 28 सीटों पर जो हुआ, वह इस दावे के विपरीत गया। महाराष्ट्र में कुल 182 उम्मीदवार मैदान में थे, जो दर्शाता है कि प्रतिस्पर्धा कितनी कड़ी थी, फिर भी कांग्रेस कहीं भी जीत हासिल नहीं कर सकी।

उत्तर प्रदेश: भाजपा का मजबूत प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की 11 सीटों पर चुनाव हुए। शिक्षक और स्नातक कोटे की इन सीटों में से ज्यादातर के नतीजे घोषित हो चुके हैं। शुरुआती रुझानों में भाजपा ने मेरठ और बरेली समेत चार सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी के खाते में एक सीट गई थी। बाद के आंकड़ों के अनुसार भाजपा ने छह और सपा ने तीन सीटें जीतीं। गोरखपुर में भाजपा के ध्रुव त्रिपाठी ने बेहद कड़े मुकाबले में 307 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। त्रिपाठी लगातार चौथी बार एमएलसी बने हैं। उन्होंने विजय चिह्न दिखाकर खुशी जाहिर की। उनके खिलाफ खड़े निर्दलीय उम्मीदवार राजीव यादव ने आरोप लगाया कि वोटों की चोरी हुई। यह घटना बताती है कि बैलेट पेपर वाले चुनावों में भी हारने वाले पक्ष वोट चोरी के आरोप लगाने से बाज नहीं आते।

मेरठ और बरेली समेत अन्य सीटों पर भाजपा ने अच्छी बढ़त हासिल की। उत्तर प्रदेश में भाजपा की यह जीत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में योगी आदित्यनाथ की सरकार है और विधान परिषद में सत्ता पक्ष की मजबूती विधानसभा की कार्यवाही को प्रभावित करती है। समाजवादी पार्टी ने कुछ सीटों पर अपनी उपस्थिति बनाए रखी, लेकिन कांग्रेस पूरी तरह गायब रही। कांग्रेस की यह स्थिति उत्तर प्रदेश में उसके संगठनात्मक कमजोर होने की पुष्टि करती है। शिक्षक और स्नातक मतदाता आमतौर पर पढ़े-लिखे वर्ग से आते हैं। इन वर्गों में भी कांग्रेस का खाता न खुलना उसके लिए गंभीर संकेत है।

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में विधान परिषद की सीटें राजनीतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। जिसमें कि भाजपा की छह सीटें उसकी संगठनात्मक ताकत और मतदाताओं के विश्वास को दर्शाती हैं, जबकि सपा की तीन सीटें दिखाती हैं कि क्षेत्रीय दल अभी भी कुछ जगहों पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। कांग्रेस का पूर्ण अभाव यह साफ करता है कि राज्य में उसकी प्रासंगिकता लगातार घट रही है।

बिहार: मिश्रित नतीजे, कांग्रेस फिर शून्य, जदयू और भाजपा की मौजूदगी

बिहार की आठ एमएलसी सीटों पर मुकाबला दिलचस्प रहा। यहां भाजपा, राजद, जदयू, जन सुराज पार्टी और एक निर्दलीय उम्मीदवार को एक-एक सीट मिली। पटना स्नातक सीट से जदयू के नीरज कुमार विजयी रहे। कोसी स्नातक सीट पर भाजपा के एनके यादव ने जीत की हैट्रिक लगाई। बिहार में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा। राज्य में महागठबंधन की सरकार है, लेकिन कांग्रेस अपने सहयोगियों के मुकाबले भी पीछे रही। राजद और जदयू ने अपनी सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस शून्य पर रही। यह संकेत देता है कि बिहार की राजनीति में कांग्रेस की प्रासंगिकता लगातार घट रही है।

बैलेट पेपर के बावजूद कांग्रेस की हार यह दिखाती है कि उसकी समस्या मशीन की नहीं, जमीन पर संगठन और स्वीकृति की है। कोसी में भाजपा की हैट्रिक स्थानीय स्तर पर उसकी मजबूत पकड़ को दर्शाती है। पटना स्नातक सीट पर जदयू की जीत नीतीश कुमार की पार्टी की रणनीति की सफलता को रेखांकित करती है। बिहार की आठ सीटों में कांग्रेस का पूर्ण अभाव राज्य में उसकी संगठनात्मक स्थिति का आईना है।

कर्नाटक: एनडीए का क्लीन स्वीप, कांग्रेस की एकमात्र सीट भी गई, मार्जिन के आंकड़े

कर्नाटक में चारों सीटें एनडीए के खाते में गईं। कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद पार्टी एक भी सीट नहीं बचा पाई। बेंगलुरु शिक्षक सीट पर भाजपा के समर्थन से चुनाव लड़ रहे जदयू (एस) उम्मीदवार एपी रंगनाथ ने कांग्रेस के मौजूदा एमएलसी पुट्टन्ना को 908 वोटों से हराया। पुट्टन्ना को 9,902 वोट मिले, जबकि रंगनाथ को 10,810। उत्तर-पूर्व शिक्षक सीट पर भाजपा के शशिल जी. नामोशी ने कांग्रेस के शरणप्पा मत्तूर को हराया। नामोशी ने लगातार पांचवीं बार जीत दर्ज की। उन्हें 15,596 वोट मिले, मत्तूर को 12,299। अंतर 3,297 वोटों का रहा।

कर्नाटक का यह नतीजा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां कांग्रेस सत्ता में है। राज्य सरकार के पास संसाधन और प्रशासनिक नियंत्रण होने के बावजूद शिक्षक और स्नातक मतदाताओं ने एनडीए को समर्थन दिया। जदयू (एस) ने कांग्रेस से एक सीट छीन ली। यह दिखाता है कि सीमित मतदाता वर्ग में भी कांग्रेस की साख कमजोर है। नामोशी की लगातार पांचवीं जीत उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा की रणनीति दोनों को दर्शाती है। 3,297 वोटों का मार्जिन स्पष्ट जीत को दिखाता है। बेंगलुरु में 908 वोटों का अंतर कड़ा मुकाबला था, लेकिन फिर भी कांग्रेस हारी। कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद शिक्षक मतदाताओं ने एनडीए को चुना, यह उसके लिए बड़ा झटका है।

महाराष्ट्र: बंटवारा, एक सीट पर काउंटिंग जारी, 182 उम्मीदवारों का मुकाबला

महाराष्ट्र में दो सीटें सत्ताधारी महायुति (एनडीए) ने जीतीं और दो विपक्ष यानी महाविकास आघाड़ी ने। पुणे शिक्षक सीट पर भाजपा के कौस्तुभ गावडे विजयी रहे। अमरावती शिक्षक सीट पर शिंदे गुट की शिवसेना के किरण सरनाईक जीते। छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीट पर शरद पवार गुट के प्रतापसिंह पाटील ने सतीश चव्हाण को हराया। पुणे स्नातक सीट पर भी शरद पवार गुट की हर्षदा देशमुख-जाधव की जीत हुई। नागपुर स्नातक सीट पर भाजपा के सुधाकर कोहाले और कांग्रेस के अभिजीत वंजारी के बीच कांटे की टक्कर चलती रही। राज्य में 3 स्नातक और 2 शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों पर कुल 182 उम्मीदवार मैदान में थे, जो प्रतिस्पर्धा की तीव्रता को दर्शाता है।

महाराष्ट्र में भी कांग्रेस शून्य पर ही रही। राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज है। बैलेट पेपर वाले इन चुनावों में भी कांग्रेस अकेले दम पर सीट नहीं जीत सकी। यह उसके लिए चेतावनी है। शरद पवार गुट की दो सीटें विपक्षी गठबंधन की मजबूती को दिखाती हैं, जबकि भाजपा और शिवसेना की जीत सत्ता पक्ष की पकड़ को रेखांकित करती है।

ईवीएम विवाद और बैलेट पेपर की राजनीति

कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष का आरोप रहा है कि भाजपा ईवीएम में हेराफेरी कर चुनाव जीतती है। हाल के समय में एसआईआर के विरोध के दौरान भी विपक्ष ने भाजपा और चुनाव आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाया। लोकसभा और विधानसभा चुनावों में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर की मांग लगातार की जाती रही, लेकिन इन एमएलसी चुनावों ने उस मांग को राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया। जब सीमित मतदाताओं वाले और बैलेट पेपर वाले चुनावों में भी कांग्रेस शून्य पर रही, तो यह सवाल उठता है कि समस्या मशीन में है या पार्टी की स्वीकृति और संगठन में।

भारत में ईवीएम का इस्तेमाल 2000 के बाद से लगभग सभी बड़े चुनावों में होता है। चुनाव आयोग बार-बार कह चुका है कि ईवीएम सुरक्षित हैं और उनमें हेराफेरी संभव नहीं। वीवीपीएटी के जरिए सत्यापन की व्यवस्था भी है। फिर भी विपक्ष हर हार के बाद मशीन पर सवाल उठाता है। जब बैलेट पेपर वाले चुनावों में भी हार होती है, तो वही आरोप दोहराए जाते हैं। गोरखपुर में हारे उम्मीदवार ने भी वोट चोरी का आरोप लगाया। यह पैटर्न दिखाता है कि आरोप हार की प्रतिक्रिया के रूप में लगाए जाते हैं, न कि ठोस सबूत के आधार पर।

सुधांशु त्रिवेदी ने साफ कहा कि ये चुनाव ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स से कराए गए थे और कांग्रेस का खाता तक नहीं खुला। उनके मुताबिक कांग्रेस वोट चोरी के आरोप लगाकर अपने चुनावी प्रदर्शन से ध्यान हटाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इन नतीजों का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यह है कि कांग्रेस की समस्या संरचनात्मक है। चार बड़े राज्यों में, जहां अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियां हैं, उत्तर प्रदेश में भाजपा की मजबूत सरकार, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार, बिहार में महागठबंधन और महाराष्ट्र में त्रिकोणीय मुकाबला, लेकिन हर जगह कांग्रेस शून्य पर रही है।

यह संकेत है कि कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर है। शिक्षक और स्नातक मतदाता आमतौर पर पढ़े-लिखे और अपेक्षाकृत जागरूक वर्ग माने जाते हैं। इन वर्गों में भी कांग्रेस का खाता न खुलना उसकी हकीकत बता रहा है। पहले इन 28 सीटों में से कांग्रेस के पास चार सीटें थीं। अब वे सभी चली गईं। यह हानि केवल संख्या की नहीं, बल्कि राजनीतिक साख की भी हुई है।

भाजपा के लिए यह नतीजा आत्मविश्वास बढ़ाने वाला है। पीएम मोदी के तंज ने विपक्ष के आरोपों को पलट दिया। भाजपा का तर्क है कि जब बैलेट पेपर से भी कांग्रेस नहीं जीत पाती, तो ईवीएम पर आरोप लगाना अपने प्रदर्शन से ध्यान भटकाने का तरीका है। सुधांशु त्रिवेदी ने इसी बात को रेखांकित किया। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद एनडीए की जीत और उत्तर प्रदेश में भाजपा की छह सीटें सत्ता पक्ष की मजबूती को दिखाती हैं। बिहार में मिश्रित नतीजे क्षेत्रीय दलों की प्रासंगिकता को रेखांकित करते हैं, जबकि महाराष्ट्र में बंटवारा गठबंधन राजनीति की जटिलता को दर्शाता है।

आगे आने वाले चुनावों के लिहाज से ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं। कांग्रेस को अपने संगठन, नेतृत्व और संदेश पर पुनर्विचार करना चाहिए, केवल ईवीएम पर सवाल उठाकर चुनावी हार को छिपाया नहीं जा सकता। बैलेट पेपर की मांग करने वाले दलों को भी यह समझना होगा कि मशीन बदलने से राजनीतिक स्वीकृति नहीं बदलती। जनता का समर्थन जीतने के लिए पार्टी को अपनी नीतियों, नेतृत्व और जमीनी कार्य पर ध्यान देना होगा।

निश्चित ही इन 28 सीटों के नतीजे भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण क्षण हैं। वे दिखाते हैं कि चुनावी हार का कारण मशीन नहीं, बल्कि मतदाताओं का विश्वास और पार्टी की साख होती है। पीएम मोदी का तंज उस राजनीतिक हकीकत की ओर इशारा है, जिसे विपक्ष बार-बार नजरअंदाज करता है। कांग्रेस के लिए यह हार एक चेतावनी है कि बैलेट पेपर भी उसके लिए जादुई समाधान नहीं है। दूसरी ओर भाजपा और उसके सहयोगी दलों के लिए यह जीत आत्मविश्वास बढ़ाने वाली है, जबकि क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। कुल मिलाकर ये चुनाव भारतीय लोकतंत्र में मतदाताओं की प्राथमिकता और दलों की जमीनी ताकत का स्पष्ट संकेत देते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी