ग्रेट निकोबार परियोजना पर जयराम रमेश ने फिर लिखा पार्यावारण मंत्री को पत्र
नई दिल्ली, 03 जून (हि.स.)। पूर्व केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना को लेकर केंद्र सरकार पर पर्यावरणीय नियमों और प्रक्रियाओं की अनदेखी करने का आरोप लगाया है। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को फिर पत्र लिख कर कहा कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभावों का आकलन करते समय कानून के शब्द और भावना दोनों स्तरों पर पूर्ण अनुपालन नहीं किया गया। उन्होंने परियोजना के लिए किए गए पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) अध्ययनों, मंजूरी प्रक्रिया और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति की रिपोर्ट को लेकर कई सवाल उठाए।
रमेश ने बुधवार को लिखे पत्र में कहा कि मार्च 2022 की पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में स्वयं यह स्वीकार किया गया था कि अध्ययन केवल एक प्रारंभिक और त्वरित आकलन था। पर्यावरण मंत्रालय ने भी यह माना कि परियोजना की पर्यावरणीय मंजूरी व्यापक ईआईए अध्ययनों पर आधारित नहीं थी, जिनमें तीन मौसमों के प्राथमिक आंकड़ों का उपयोग किया जाता है। परियोजना से संबंधित विभिन्न अध्ययन केवल कुछ सप्ताह के दौरान जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित थे, जबकि इतने बड़े और संवेदनशील क्षेत्र के लिए विस्तृत और बहु-मौसमी अध्ययन आवश्यक थे।
उन्होंने कहा कि मंत्रालय द्वारा पुराने और उपलब्ध आंकड़ों के उपयोग का तर्क दिया जा रहा है, जबकि परियोजना स्थल और उसके प्रभाव क्षेत्र से एकत्र किए गए प्राथमिक आंकड़ों का कोई विकल्प नहीं हो सकता। किसी भी बड़े विकास परियोजना के लिए परियोजना-विशेष अध्ययन और प्रत्यक्ष आंकड़ों का संग्रह पर्यावरणीय मूल्यांकन का मूल आधार होना चाहिए।
रमेश ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि तीन अप्रैल 2023 के आदेश में स्वयं अधिकरण ने परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी में कुछ अनुत्तरित कमियों का उल्लेख किया था। अधिकरण ने व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन की आवश्यकता सहित कई मुद्दों पर पुनर्विचार का निर्देश दिया था।
उन्होंने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर की रिपोर्ट में गलाथिया खाड़ी के पूर्वी हिस्से के कई तटीय क्षेत्रों में कटाव का संकेत दिया गया है। द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र नियम-2019 के तहत तटीय कटाव वाले क्षेत्रों में बंदरगाह परियोजनाओं के लिए व्यापक पर्यावरणीय अध्ययन आवश्यक हैं। ऐसी स्थिति में विभिन्न मौसमों को ध्यान में रखते हुए विस्तृत पर्यावरण प्रभाव आकलन क्यों नहीं कराया गया।
कांग्रेस सांसद ने कहा कि परियोजना के लिए पर्यावरणीय अध्ययन तैयार करने वाले और उनकी समीक्षा करने वाले संस्थान एक ही प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत आते हैं, जिससे निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय के 2009 के कार्यालय ज्ञापन और बंदरगाह एवं हार्बर परियोजनाओं के लिए जारी ईआईए मार्गदर्शिका का भी जिक्र किया, जिनमें द्वीपीय क्षेत्रों की बंदरगाह परियोजनाओं के लिए व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन और विभिन्न मौसमों में आंकड़े एकत्र करने की आवश्यकता बताई गई है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने जयराम रमेश के पिछले पत्र में लगाए आरोपों के जवाबी पत्र में सारे आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना का पर्यावरणीय मूल्यांकन पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना 2006, द्वीप तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना 2019 और अन्य लागू प्रावधानों के अनुरूप व्यापक एवं बहुस्तरीय तरीके से किया गया है। परियोजना से जुड़े पर्यावरणीय और जैव विविधता संबंधी मुद्दों की वैधानिक मूल्यांकन तथा न्यायिक समीक्षा प्रक्रिया के दौरान विस्तार से जांच की जा चुकी है। ग्रेट निकोबार द्वीप परियोजना लगभग 166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में प्रस्तावित है। इसमें एक ट्रांसशिपमेंट कंटेनर बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय स्तर का द्वैध उपयोग हवाई अड्डा, ऊर्जा अवसंरचना तथा हरित तटीय शहर विकसित किया जाना प्रस्तावित है। परियोजना के लिए लगभग 13 हजार हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होने का अनुमान है।
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हिन्दुस्थान समाचार / प्रशांत शेखर

