विश्व पुस्तक मेले में बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति पर हुई चर्चा
-साहित्य मनुष्य को जोड़ता है, तोड़ता नहीं : दिविक रमेश
-किशोरों के लिए आज वैज्ञानिक कहानियां लिखी जा रही हैं : सूर्यनाथ सिंह
नई दिल्ली, 18 जनवरी (हि.स.)। विश्व पुस्तक मेले के अंतिम दिन रविवार को बाल साहित्य पर साहित्य अकादेमी ने गंभीर चर्चा आयोजित की।
‘आमने-सामने’ कार्यक्रम में साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त क्षमा शर्मा एवं प्रख्यात नेपाली लेखक और विद्वान दिवाकर प्रधान ने श्रोताओं के समक्ष अपनी रचना-प्रक्रिया साझा की, साथ ही अपनी रचनाओं का पाठ भी किया।
‘बाल साहिती' कार्यक्रम के अंतर्गत 'बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति‘ पर हुई परिचर्चा की अध्यक्षता प्रख्यात कवि और लेखक दिविक रमेश ने की और अन्य वक्ता रहे - बाल साहित्यकार सूर्यनाथ सिंह, ओमप्रकाश कश्यप, रजनीकांत शुक्ल और ऋषि राज।
'आमने-सामने' कार्यक्रम में साहित्यकार क्षमा शर्मा ने अपनी रचना -प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा कि मेरे लेखक होने का श्रेय मेरे परिवार, विशेषतया बड़े भाई को है, जिन्होंने मुझे पढ़ने-लिखने का संस्कार दिया। अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष पर मेरे द्वारा लिखा लेख जिसे मैंने डाक से भेज दिया था, जो 'अमर उजाला‘ में प्रकाशित हुआ और यही मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट था। इसी के बाद मुझे लगा कि मैं लिख सकती हूं। रसोई घर में काम करते हुए जब भी मुझे विचार आता है, तो उसे पर्ची में लिख लेती हूं। यात्रा के दौरान भी डायरी में अपने मन के भावों को उतारती रहती हूं। उन्होंने केरल के पाठ्यक्रम में शामिल कहानी ‘इको फ्रेंडली‘ प्रस्तुत की, जो जल प्रदूषण पर आधारित थी।
नेपाली के प्रख्यात लेखक दिवाकर प्रधान ने अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताते हुए कहा कि मैं मूल रूप से साहित्य दर्शन और इतिहास दर्शन पर लिखता हूं। मैंने सनातन संस्कृति और भारत के सौंदर्य शास्त्र पर अधिक लेखन किया है। उन्होंने श्रोताओं के समक्ष ‘रिप' निबंध प्रस्तुत किया। इस निबंध के माध्यम से उन्होंने विविध धर्मों द्वारा मृत्यु के बाद की धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का विस्तार से उल्लेख किया।
'बाल साहित्य की वर्तमान स्थिति' पर चर्चा के दौरान कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात कवि और लेखक दिविक रमेश ने कहा कि बाल साहित्य का प्रकाशन व्यवस्थित ढंग से होना चाहिए। साहित्य कभी मनुष्य को तोड़ता नहीं, बल्कि जोड़ता है। बाल साहित्य की शुरुआत बच्चों को सीखने-सिखाने के उद्देश्य से की गई। बंगाल में धारणा है कि जो साहित्यकार बच्चों के लिए नहीं लिखते वे साहित्यकार नहीं हैं।
सूर्यनाथ सिंह ने कहा कि इस समय बाल साहित्य की स्थिति बहुत अच्छी है। उन्होंने यह भी कहा कि सुदर्शन ने ‘हार की जीत‘, प्रेमचंद ने ‘पंच परमेश्वर‘ आदि रचनाएं बच्चों के लिए सोचकर नहीं लिखी थीं। आज हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए लिखा जा रहा है। किशोरों के लिए वैज्ञानिक कहानियां लिखी जा रही हैं।
ओमप्रकाश कश्यप ने ‘जवाहर की चिट्ठी’, ‘उड़ान’ आदि पुस्तकों का उल्लेख करते हुए कहा कि साहित्य का काम ज्ञान देना नहीं, बल्कि उनकी रचनात्मकता को उजागर करना है, उन्हें ऊर्जस्वित करना है।
रजनीकांत शुक्ल ने कहा कि अन्य साहित्य की तरह बाल साहित्य की भी कोई पत्रिका विभिन्न भारतीय भाषा का प्रतिनिधित्व करते हुए निकलनी चाहिए।
ऋषि राज ने कहा कि बाल साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है बल्कि यह बच्चों को संवेदनशील बनाने का सबसे बड़ा हथियार है। उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड, कारगिल युद्ध आदि पर अपनी रचनाओं पर बात करते हुए कहा कि जो दर्द हमारे बुज़ुर्गों, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने सहे हैं, उसे हमें हमेशा याद रखना चाहिए, खासकर हमारी युवा पीढ़ी को इसे विस्मृत नहीं करना चाहिए।
कार्यक्रमों का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन अजय कुमार शर्मा ने किया।
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हिन्दुस्थान समाचार / धीरेन्द्र यादव

