अंतरराज्यीय नवजात तस्करी गिरोह का पर्दाफाश, 10 और आरोपित गिरफ्तार
नई दिल्ली, 10 जुलाई (हि.स.)। दिल्ली की मध्य जिला पुलिस ने अंतरराज्यीय नवजात एवं बच्चों की तस्करी करने वाले संगठित गिरोह का भंडाफोड़ करते हुए इस मामले में 10 और आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनमें जैविक माता-पिता, दलाल, खरीदार, बिचौलिए और एक अस्पताल संचालक भी शामिल हैं। पुलिस ने दिल्ली, उप्र और उत्तराखंड के अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी कर चार और बच्चों को सकुशल बरामद किया है। इस मामले में अब तक कुल नौ बच्चों को तस्करों के चंगुल से मुक्त कराया जा चुका है। जांच के दौरान पुलिस ने कई लाख रुपये के अवैध लेन-देन का खुलासा किया है। बैंक खातों के जरिए हुए भुगतान की भी जानकारी सामने आई है और अब पुलिस पूरे मनी ट्रेल की जांच कर रही है।
मध्य जिले के पुलिस उपायुक्त रोहित राजबीर सिंह न शुक्रवार को पत्रकार वार्ता में बताया कि मामले की शुरुआत पांच जून को हुई थी, जब मध्य जिले की एंटी नारकोटिक्स सेल को सूचना मिली कि पहाड़गंज स्थित आरके आश्रम मेट्रो स्टेशन के पास एक नवजात शिशु का सौदा होने वाला है। सूचना के आधार पर पुलिस ने ग्राहक बनकर जाल बिछाया। ऑपरेशन के दौरान ज्योति उर्फ कमलेश, शालू और ललित को एक चार से पांच दिन के नवजात लड़के को बेचने की कोशिश करते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने नवजात को सुरक्षित बचा लिया और डमी ग्राहकों द्वारा दी गई 20 हजार रुपये की टोकन राशि भी बरामद कर ली। इसके बाद पहाड़गंज थाने में मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।
मामले की गंभीरता को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त प्रशांत चौधरी की अगुवाई में विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया। टीम में एसीपी, एसएचओ, स्पेशल स्टाफ और महिला पुलिस अधिकारियों के अलावा कानूनी सलाहकार को भी शामिल किया गया, ताकि जांच में किसी प्रकार की कानूनी कमी न रहे। तकनीकी निगरानी, बैंक खातों की जांच, मोबाइल कॉल डिटेल और लगातार पूछताछ के आधार पर पुलिस ने पूरे नेटवर्क की परत-दर-परत जांच की। इसी दौरान पता चला कि यह कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि कई राज्यों में फैला एक संगठित गिरोह था, जो जरूरतमंद दंपतियों को मोटी रकम लेकर नवजात और छोटे बच्चों की अवैध बिक्री करता था।
जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि कुछ मामलों में जैविक माता-पिता ने ही पैसों के लालच में अपने बच्चों को गिरोह के हवाले कर दिया। गुजरात के साबरकांठा निवासी कांतिभाई गमार और सुगनाबेन गमार ने कथित रूप से अपने नवजात बेटे को पैसों के बदले गिरोह को बेच दिया। बाद में उसी बच्चे को हरियाणा के पानीपत निवासी एक दंपति को लाखों रुपये लेकर बेच दिया गया। एक अन्य मामले में एक युवती ने अवांछित गर्भ के कारण एक बच्ची को जन्म दिया। आरोप है कि अस्पताल संचालक डॉ. विवेकी कपूर ने प्रसव के बाद नवजात बच्ची को मां को वापस नहीं सौंपा और यह कहकर अपने पास रख लिया कि वह बच्चे की देखभाल करेगी। बाद में बच्ची को भी तस्करी के नेटवर्क के जरिए आगे पहुंचा दिया गया।
पुलिस जांच में सामने आया कि गिरोह में कई स्तर पर लोग शामिल थे। गुरुग्राम की रहने वाली ज्योति, जो आशा वर्कर है, बच्चों की खरीद-फरोख्त में बिचौलिए की भूमिका निभाती थी। गुजरात निवासी शंकर गमार और उसकी सहयोगी साहिबा उर्फ कालिया जैविक माता-पिता से बच्चों को लेकर गिरोह तक पहुंचाते थे। रोहिणी निवासी गरिमा जैन ने कथित रूप से अस्पताल के माध्यम से नवजात हासिल किया, जबकि उसके ससुर सतीश जैन पर बच्चे की व्यवस्था के लिए आठ लाख रुपये देने का आरोप है। उत्तराखंड के ऋषिकेश निवासी केतकी गुप्ता, हरिद्वार निवासी अभा सिंह और अमित प्रताप सिंह, तथा उत्तर प्रदेश के एक सेवानिवृत्त शिक्षक रामप्रकाश निषाद पर भी बच्चों को लाखों रुपये देकर खरीदने का आरोप है। पुलिस का कहना है कि गिरोह जरूरतमंद निःसंतान दंपतियों से संपर्क करता था और फिर ऐसे जैविक माता-पिता की तलाश करता था जो आर्थिक तंगी या अन्य कारणों से अपना बच्चा देने को तैयार हों। इसके बाद बच्चों को मोटी रकम लेकर खरीदारों तक पहुंचाया जाता था।
जांच के दौरान पुलिस ने दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में एक साथ कई स्थानों पर छापेमारी कर चार और बच्चों को सुरक्षित बरामद किया। इनमें रोहिणी से 16 दिन का नवजात, ऋषिकेश से एक महीने का बच्चा, मथुरा से करीब एक वर्ष का बालक और हरिद्वार से आठ महीने का शिशु शामिल है। अब तक इस पूरे मामले में कुल नौ बच्चों को सुरक्षित बचाया जा चुका है। सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश किया गया है, जहां उनके संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास के लिए आवश्यक आदेश जारी किए गए हैं।
पुलिस को जांच में कई बैंक खातों के जरिए लाखों रुपये के लेन-देन के सबूत मिले हैं। अब यह पता लगाया जा रहा है कि इस अवैध कारोबार से कितनी रकम अर्जित की गई और यह पैसा किन-किन लोगों तक पहुंचा।
पुलिस उपायुक्त के अनुसार जांच में अभी तक आईवीएफ या सरोगेसी से जुड़े किसी रैकेट का कोई प्रमाण नहीं मिला है। गिरोह पूरी तरह डिमांड एंड सप्लाई के आधार पर काम करता था। निःसंतान दंपति बच्चों की मांग करते थे और गिरोह ऐसे माता-पिता की तलाश करता था जो अपना बच्चा बेचने को तैयार हों। पुलिस का कहना है कि गिरोह के अन्य सदस्यों की पहचान की जा रही है। आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां तथा बच्चों की बरामदगी होने की संभावना है।
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हिन्दुस्थान समाचार / कुमार अश्वनी

