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सतत विकास लक्ष्यों के लिए संसदों को कानून बनाने के साथ सभी की आवाज को स्थान देने की जरूरतः हरिवंश

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सतत विकास लक्ष्यों के लिए संसदों को कानून बनाने के साथ सभी की आवाज को स्थान देने की जरूरतः हरिवंश


नई दिल्ली, 27 अक्टूबर (हि.स.)। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने मंगलवार को कहा कि जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण क्षरण, जैव विविधता का नुकसान, संसाधनों की कमी, खाद्य एवं ऊर्जा असुरक्षा और बढ़ती असमानताएं मानवता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2026 का हवाला देते हुए कहा कि जिन 139 लक्ष्यों के लिए पर्याप्त रुझान संबंधी आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें से केवल 15 प्रतिशत लक्ष्य ही 2030 तक हासिल करने की दिशा में सही राह पर हैं।

हरिवंश ने यहां आयोजित 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सतत विकास केवल पर्यावरण से जुड़ा विषय नहीं है बल्कि इसका संबंध मानवीय गरिमा, आर्थिक अवसरों, सामाजिक न्याय और सभी के बेहतर भविष्य से है। सत्र का विषय था- ‘सततता : हमारे देशों के सतत और समावेशी भविष्य के निर्माण में संसद की केंद्रीय भूमिका।’

हरिवंश ने कहा कि भारत की वर्ष 2026 की ब्रिक्स अध्यक्षता ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण’ विषय पर केंद्रित है। सितंबर 2026 में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में अंगीकृत नई दिल्ली घोषणापत्र में सतत विकास और समावेशी वृद्धि के प्रति साझा प्रतिबद्धता दोहराई गई थी।

संसदों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए हरिवंश ने कहा कि कानून निर्माण, बजटीय निगरानी, जवाबदेही की व्यवस्था और नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने के माध्यम से संसदें सार्वजनिक नीतियों को लोकतांत्रिक वैधता प्रदान करती हैं। वे वैश्विक प्रतिबद्धताओं और स्थानीय स्तर पर उनके क्रियान्वयन के बीच की दूरी को पाटने में भी अहम भूमिका निभाती हैं।

उन्होंने कहा कि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए संसदों को आवश्यक कानून बनाने, पर्याप्त संसाधन आवंटित करने, योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी और समाज के सभी वर्गों की आवाज को उचित स्थान देने की जरूरत है।

भारत के विकास दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए हरिवंश ने कहा कि सतत विकास जन-केंद्रित, समावेशी और न्यायसंगत होना चाहिए। भारत की विकास संबंधी सोच ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी पूरा विश्व एक परिवार है, के सिद्धांत पर आधारित है। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टिकोण के अनुरूप भारत समृद्ध, सशक्त और टिकाऊ राष्ट्र के निर्माण के साथ वैश्विक विकास प्रयासों में योगदान देने के लिए प्रतिबद्ध है।

युवाओं की भागीदारी पर जोर देते हुए हरिवंश ने कहा कि भारत की करीब दो-तिहाई आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है और युवा सतत विकास के लिए अनिवार्य भागीदार हैं। उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत युवा संसद’ जैसी पहल युवाओं को लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़ने, नेतृत्व क्षमता विकसित करने और समावेशी एवं टिकाऊ भविष्य के लिए नए विचार प्रस्तुत करने का अवसर देती हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता पर बल देते हुए हरिवंश ने कहा कि वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर मिलकर प्रयास करने होंगे। उन्होंने सतत विकास के लिए वित्तीय संसाधनों तक बेहतर पहुंच, प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान और ‘समान लेकिन पृथक उत्तरदायित्वों एवं संबंधित क्षमताओं’ के सिद्धांत का सम्मान करने की जरूरत बताई।

उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को अपनी राष्ट्रीय परिस्थितियों और प्राथमिकताओं के अनुरूप सतत विकास को आगे बढ़ाने के लिए पर्याप्त नीतिगत स्वतंत्रता और संसाधन उपलब्ध होने चाहिए।

हरिवंश ने अपने संबोधन के समापन पर कहा कि सततता का सवाल मूल रूप से सुशासन, जवाबदेही और सामूहिक जिम्मेदारी से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि संसदीय कूटनीति, बेहतर कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान और साझा प्रयासों के माध्यम से संसदें वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए टिकाऊ, समावेशी और समृद्ध विश्व के निर्माण में प्रभावी भूमिका निभा सकती हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुशील कुमार