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(लीड) भोपाल घोषणा से ब्रिक्स के सांस्कृतिक सहयोग को मिली नई दिशा, पहली बार ब्रिक्स देशों के बीच तय हुए ठोस लक्ष्य

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(लीड) भोपाल घोषणा से ब्रिक्स के सांस्कृतिक सहयोग को मिली नई दिशा, पहली बार ब्रिक्स देशों के बीच तय हुए ठोस लक्ष्य


संस्कृति संवाद से आगे बढ़कर परिणाम आधारित सहयोग की ओर बढ़ा ब्रिक्स

भोपाल, 08 अगस्त (हि.स.)। भोपाल में चार दिनों तक चले ब्रिक्स सांस्कृतिक विमर्श का शनिवार को ऐसा समापन हुआ, जिसने संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एक प्रभावी माध्यम के रूप में नई पहचान दी। ब्रिक्स संस्कृति मंत्रियों की 11वीं बैठक के समापन पर ‘भोपाल घोषणापत्र’ को अपनाया गया। भारत की अध्यक्षता में तैयार इस दस्तावेज को एक परिणाम आधारित और भविष्य की दिशा तय करने वाला सांस्कृतिक रोडमैप बताया गया है। इसमें सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, सांस्कृतिक संपदाओं की वापसी, रचनात्मक अर्थव्यवस्था, पारंपरिक ज्ञान, संग्रहालयों और अभिलेखागार के सहयोग से लेकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में कलाकारों के अधिकारों तक अनेक महत्वपूर्ण विषयों को स्थान दिया गया है।

केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने यहां कुशाभाऊ ठाकरे अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि ब्रिक्स की साझेदारी आर्थिक और राजनीतिक सहयोग तक सीमित नहीं है। संस्कृति, शांति, पारस्परिक सम्मान और समावेशी विकास की साझा भावना भी सदस्य देशों को जोड़ती है। उन्होंने कहा कि भोपाल घोषणा का उद्देश्य सांस्कृतिक संवाद को व्यावहारिक सहयोग में बदलना और उसके लिए संस्थागत व्यवस्था विकसित करना है।

पत्रकार वार्ता में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, संस्कृति मंत्रालय के सचिव एवं ब्रिक्स कल्चरल वर्किंग ग्रुप के अध्यक्ष विवेक अग्रवाल, मप्र के मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल, प्रदेश शासन में अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला, प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारी और अन्य प्रमुख पदाधिकारी मौजूद रहे।

पहली बार घोषणापत्र को मिला परिणाम आधारित स्वरूप

गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बैठकों में जारी होने वाले घोषणापत्र अक्सर विचारों और सिद्धांतों तक सीमित रह जाते हैं। भोपाल में तैयार घोषणा पत्र को इससे आगे ले जाने का प्रयास किया गया है। इसमें लक्ष्यों की पहचान के साथ उन्हें हासिल करने के रास्ते और सहयोग के व्यावहारिक माध्यमों पर भी ध्यान दिया गया है।

शेखावत ने कहा, भारत के प्रस्ताव पर BRICS के सभी साझेदार देशों द्वारा सहमति जताते हुए स्वेच्छा से कलाकारों का एक ‘Voluntary Artist Registry’ बनाने का निर्णय लिया गया है। इस रजिस्ट्री का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक आदान-प्रदान को आसान और सुगम बनाना है। इससे अलग-अलग देशों के कलाकारों को आपस में जुड़ने, एक-दूसरे के मध्य अपनी रचनात्मकता प्रदर्शित करने और बेहतर अवसर पाने में मदद मिलेगी।

उन्होंने इसे ब्रिक्स संस्कृति ट्रैक की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि सांस्कृतिक सहयोग के संस्थागत ढांचे को मजबूत करने के साथ संस्कृति और विरासत के पारंपरिक एवं समकालीन क्षेत्रों के लिए साझा रोडमैप तैयार किया गया है। भोपाल घोषणा का मूल उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग को अधिक व्यवस्थित, संस्थागत और सतत स्वरूप देना है। घोषणा में रचनात्मक उद्योगों, विरासत, पारंपरिक ज्ञान, सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों, दस्तावेजी विरासत और तकनीकी बदलाव जैसे विषयों को एक साझा मंच पर लाया गया है।

अप्रैल से भोपाल तक चला विचार-विमर्श

भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स संस्कृति ट्रैक की प्रक्रिया कई चरणों में आगे बढ़ी। पहली संस्कृति कार्य समूह बैठक 29-30 अप्रैल को वर्चुअल माध्यम से हुई। दूसरी बैठक 4-5 जून को वाराणसी में आयोजित की गई। तीसरी बैठक 5-6 अगस्त को भोपाल में हुई और इसके बाद 8 अगस्त को संस्कृति मंत्रियों की बैठक के साथ पूरी प्रक्रिया का समापन हुआ।

इस क्रम में अधिकारियों के स्तर पर प्रारंभिक विमर्श, वरिष्ठ स्तर पर विचार-विनिमय, सचिव स्तर पर चर्चा और प्रतिनिधिमंडल प्रमुखों के स्तर पर बातचीत के बाद मंत्री स्तरीय बैठक में प्रस्तावों को अंतिम रूप दिया गया। इस प्रक्रिया ने भोपाल घोषणा को व्यापक विचार-विमर्श का परिणाम बनाया। बैठक में भारत सहित 14 देशों ने भाग लिया। इनमें 10 ब्रिक्स सदस्य देश और चार साझेदार देश शामिल थे। कुल 55 प्रतिनिधियों ने संस्कृति ट्रैक में सहभागिता की।

रचनात्मक अर्थव्यवस्था बनेगी सहयोग का नया आधार

भोपाल घोषणा में सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योगों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। दुनिया में तेजी से उभर रही रचनात्मक अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स देशों के बीच अनुभव, कार्यप्रणालियां और श्रेष्ठ प्रथाएं साझा करने की दिशा में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। कलाकारों, रचनाकारों और शिल्पकारों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने, उनके पेशेवर नेटवर्क को मजबूत करने और डिजिटल माध्यमों से बाजार तक उनकी पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य सांस्कृतिक प्रतिभाओं को अपने देश की सीमाओं से आगे नए मंच उपलब्ध कराना और रचनात्मक क्षेत्र को आर्थिक अवसरों से जोड़ना है। डिजिटल तकनीक इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

कलाकारों के लिए बनेगी ‘स्वैच्छिक रजिस्ट्री’

भारत की ओर से प्रस्तावित ‘स्वैच्छिक कलाकार रजिस्ट्री’ भोपाल घोषणा की प्रमुख पहलों में शामिल है। सभी साझेदार देशों ने इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की है। इस रजिस्ट्री के माध्यम से ब्रिक्स देशों के कलाकारों और रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को एक-दूसरे से जोड़ने, सांस्कृतिक आदान-प्रदान को सुगम बनाने और अंतरराष्ट्रीय अवसरों तक उनकी पहुंच बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

इस पहल से कलाकार दूसरे ब्रिक्स देशों में जाकर अपनी कला का प्रदर्शन कर सकेंगे, नए पेशेवर संबंध बना सकेंगे और सांस्कृतिक सहयोग की दीर्घकालिक प्रक्रिया में सहभागी बन सकेंगे। शेखावत ने इसे जन-से-जन संपर्क को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण पहल बताया। इसका व्यापक उद्देश्य सरकारी स्तर के संवाद के साथ कलाकारों और सांस्कृतिक क्षेत्र के पेशेवरों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को बढ़ाना है।

चोरी हुई सांस्कृतिक संपदाओं की वापसी पर बढ़ेगा सहयोग

भोपाल घोषणा में सांस्कृतिक संपदाओं की वापसी का विषय भी प्रमुखता से शामिल किया गया है। चोरी अथवा अवैध तरीके से दूसरे देशों तक पहुंची सांस्कृतिक संपदाओं के उद्गम की पहचान, अनुसंधान, वापसी और पुनर्स्थापन के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी है। इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित ट्रेसिंग टूल्स की संभावनाओं पर भी विचार किया जाएगा।

भारत लंबे समय से विदेशों में पहुंची अपनी प्राचीन सांस्कृतिक संपदाओं की वापसी के लिए प्रयास करता रहा है। भोपाल घोषणा ने इस विषय को व्यापक बहुपक्षीय सहयोग के दायरे में लाने का रास्ता खोला है। शेखावत ने बताया कि सांस्कृतिक संपदा का महत्व उसके आर्थिक मूल्य से कहीं अधिक होता है। वह किसी देश की सभ्यता, इतिहास और सामूहिक स्मृति का हिस्सा होती है। इसलिए उसकी वापसी सांस्कृतिक न्याय से जुड़ा विषय भी है।

साझा विरासत के लिए यूनेस्को नामांकन में सहयोग

भोपाल घोषणा में यूनेस्को की बहुराष्ट्रीय नामांकन प्रक्रिया में सहयोग बढ़ाने की बात भी शामिल है। जिन सांस्कृतिक धरोहरों का संबंध एक से अधिक देशों की साझा सभ्यतागत यात्रा से रहा है, उनके संरक्षण और वैश्विक पहचान के लिए मिलकर काम करने की दिशा में सहमति बनी है। इससे साझा और परस्पर संबद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है। भारत की ओर से सारनाथ जैसे महत्वपूर्ण विरासत स्थलों के संदर्भ में भी अंतरराष्ट्रीय विरासत मान्यता की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया।

परंपरागत ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौती

भोपाल घोषणा में पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों और पारंपरिक सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है। भारत सहित ब्रिक्स देशों में पीढ़ियों से हस्तांतरित होते आए लोकज्ञान, लोककलाओं, नृत्य, संगीत, हस्तशिल्प और विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण पर जोर दिया गया। शेखावत ने कहा कि ये परंपराएं पिछली पीढ़ियों से प्राप्त विरासत हैं। वर्तमान पीढ़ी इनके मालिक की भूमिका में नहीं, इनके संरक्षक की भूमिका में है। जिम्मेदारी है कि इन्हें क्षरण और विलुप्ति से बचाते हुए आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए।

संग्रहालय, पुस्तकालय और अभिलेखागार आएंगे साथ

भोपाल घोषणा में संग्रहालयों, पुस्तकालयों और अभिलेखागार के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा भी तय की गई है। दस्तावेजी विरासत के संरक्षण, डिजिटलीकरण, अभिलेखों की सुरक्षा और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान के लिए संस्थागत सहयोग विकसित करने पर सहमति बनी है।

संस्कृति के मंच पर 14 देशों की सहभागिता

मंत्री स्तरीय बैठक में भारत सहित 14 देशों ने हिस्सा लिया। ब्रिक्स के सदस्य देशों में ब्राजील, चीन, मिस्र, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात शामिल रहे। साझेदार देशों के रूप में बेलारूस, क्यूबा, कजाखस्तान और थाईलैंड ने भागीदारी की। मिस्र ने मंत्री स्तरीय बैठक में ऑनलाइन सहभागिता की। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात के संस्कृति मंत्रियों की उपस्थिति ने संस्कृति ट्रैक के महत्व को रेखांकित किया। कुल 55 प्रतिनिधियों की सहभागिता ने इस मंच को व्यापक सांस्कृतिक विमर्श का स्वरूप दिया।

‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता’ बना मार्गदर्शक सूत्र

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की व्यापक थीम ‘लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण’ रही। संस्कृति ट्रैक में इस विचार को व्यावहारिक पहलों, संस्थागत सहयोग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से आगे बढ़ाया गया। इसका लक्ष्य ऐसा सांस्कृतिक सहयोग तंत्र विकसित करना है, जो बदलती वैश्विक परिस्थितियों में भी निरंतर बना रहे और सदस्य देशों के बीच संबंधों को मजबूत करता रहे।

भोपाल में संस्कृति बनी कूटनीति का जीवंत माध्यम

6 और 7 अगस्त को आयोजित ब्रिक्स संस्कृति महोत्सव ने औपचारिक बैठकों को कला और जन-सहभागिता से जोड़ा। बेलारूस, ब्राजील, इंडोनेशिया, रूस और संयुक्त अरब अमीरात के कलाकारों ने अपनी-अपनी सांस्कृतिक परंपराओं की प्रस्तुतियां दीं। भारत की ओर से राजस्थान की लोक परंपरा को ‘मारू के रंग’ के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

मध्य प्रदेश की ओर से ‘अमृतसया’ नामक 35 मिनट की नृत्य-नाटिका प्रस्तुत की गई, जिसमें 125 से अधिक कलाकारों ने भाग लिया। इसमें मध्य प्रदेश की शास्त्रीय, लोक और जनजातीय परंपराओं के माध्यम से राज्य की आध्यात्मिक और ऐतिहासिक यात्रा को प्रस्तुत किया गया। ओंकार से लेकर मां नर्मदा और मध्य प्रदेश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं तक इस प्रस्तुति ने राज्य को भारत की सांस्कृतिक विविधता के जीवंत प्रतीक के रूप में सामने रखा।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि राजा भोज की नगरी में संस्कृति मंत्रियों की यह बैठक मध्य प्रदेश के लिए गौरव का अवसर है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक सोच में निहित ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना को रेखांकित किया। उनका कहना था कि भोपाल घोषणा के नाम में भोपाल का नाम जुड़ना मध्य प्रदेश के लिए विशेष उपलब्धि है। भविष्य में जब ब्रिक्स संस्कृति ट्रैक के परिणाम आधारित दस्तावेज पर चर्चा होगी, तब भोपाल का उल्लेख भी उसके साथ होगा।

सांची और भीमबेटका के जरिए दुनिया देखेगी मध्य प्रदेश

बैठक के बाद विदेशी प्रतिनिधिमंडलों ने मध्य प्रदेश की विश्व धरोहरों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। प्रतिनिधिमंडलों के सांची और भीमबेटका जाने का कार्यक्रम रखा गया था। इन यात्राओं के माध्यम से मध्य प्रदेश की संस्कृति, पर्यटन, हस्तकला, जनजातीय परंपराओं और बहुविध विरासत को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों तक पहुंचाने का अवसर मिला।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी