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लोकतंत्र की रक्षा में संघ और सामान्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अतुलनीय: सुनील आंबेकर

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लोकतंत्र की रक्षा में संघ और सामान्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अतुलनीय: सुनील आंबेकर


लोकतंत्र की रक्षा में संघ और सामान्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अतुलनीय: सुनील आंबेकर


लोकतंत्र की रक्षा में संघ और सामान्य कार्यकर्ताओं की भूमिका अतुलनीय: सुनील आंबेकर


-सुनील आंबेकर ने कहा-आपातकाल लोकतंत्र पर सबसे बड़ा हमला था, जनसंघर्ष ने 19 माह में तानाशाही को किया परास्त

पटना, 24 जून (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि वर्ष 1975 में लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय था। यह केवल राजनीतिक असहमति को दबाने का प्रयास नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक स्वतंत्रताओं और संवैधानिक मूल्यों पर सीधा हमला था। उन्होंने कहा कि राष्ट्रव्यापी जनसंघर्ष, जन-जागरण और लोकतंत्र के प्रति जनता की प्रतिबद्धता के कारण मात्र 19 महीनों में तानाशाही प्रवृत्तियों को परास्त कर देश में लोकतंत्र की पुनर्स्थापना संभव हो सकी।

आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर बुधवार को पटना में 'हिन्दुस्थान समाचार समूह' द्वारा आयोजित ‘बिहार आंदोलन और आपातकाल’ विषयक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए आंबेकर ने कहा कि देश में भविष्य में कभी भी आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न न हो, इसके लिए उन कारणों और शक्तियों की पहचान करना आवश्यक है जो राष्ट्र की स्वतंत्रता तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरा बन सकती हैं।

उन्होंने कहा कि देश को स्वतंत्र हुए उस समय मात्र 25 वर्ष ही हुए थे। वर्ष 1947 में आजादी मिलने, 1950 में संविधान लागू होने और 1952 में पहले आम चुनाव संपन्न होने के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था अभी पूरी तरह मजबूत भी नहीं हो पाई थी कि तानाशाही प्रवृत्तियों ने लोकतंत्र को चुनौती दे दी। इसका परिणाम 25 जून, 1975 को लगाए गए आपातकाल के रूप में सामने आया।

आंबेकर ने कहा कि दुनिया के अनेक देशों में जब भी तानाशाही शासन स्थापित हुआ, वह दो से ढाई दशकों तक बना रहा। भारत में भी आपातकाल लागू करने वालों की सोच और योजना दीर्घकालिक थी, लेकिन भारतीय समाज की लोकतांत्रिक चेतना और जनता के व्यापक प्रतिरोध ने उनके मंसूबों को सफल नहीं होने दिया।

उन्होंने कहा कि आपातकाल के विरुद्ध हुआ संघर्ष भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय है। इसमें समाज के सभी वर्गों, विचारधाराओं और संगठनों के लोगों ने भागीदारी निभाई। यह किसी एक दल या संगठन का आंदोलन नहीं था, बल्कि लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए पूरे राष्ट्र का सामूहिक संघर्ष था।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगाए गए प्रतिबंध का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रश्न उठाया कि एक गैर-राजनीतिक संगठन होने के बावजूद संघ को निशाना क्यों बनाया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही तत्कालीन सरकार की गतिविधियों और दृष्टिकोण से यह स्पष्ट था कि वह संघ को राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखती थी, जबकि संघ स्वयं को एक सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन के रूप में संचालित करता रहा है।

उन्होंने कहा कि सरकार को आशंका थी कि संघ की उपस्थिति में उसकी मनमानी नहीं चल सकेगी। इसी कारण संघ को समाप्त करने की मानसिकता पहले से मौजूद थी और राजनीतिक कारणों से संगठन पर प्रतिबंध लगाया गया। हालांकि प्रतिबंध, गिरफ्तारियों और दमनात्मक कार्रवाइयों के बावजूद संघ के कार्यकर्ताओं ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखा।

आंबेकर ने कहा कि पिछले 25 वर्षों में संघ ने देशभर में जो वैचारिक आधार और संगठनात्मक तंत्र विकसित किया था, उसी के कारण आपातकाल के दौरान व्यापक जन-जागरण संभव हो सका। जब विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेता जेलों में बंद थे, तब संघ के हजारों सामान्य कार्यकर्ताओं ने आंदोलन और जनसंपर्क की जिम्मेदारी संभाली।

उन्होंने बताया कि ऐसे अनेक कार्यकर्ता थे जिन्हें सार्वजनिक जीवन में बहुत कम लोग जानते थे, लेकिन उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोकतंत्र की रक्षा का संदेश पहुंचाया। बिना किसी व्यक्तिगत पहचान, पद या राजनीतिक महत्वाकांक्षा के इन कार्यकर्ताओं ने आपातकाल का विरोध किया और जनता को जागरूक बनाने का कार्य किया। यही जमीनी संघर्ष आगे चलकर एक व्यापक जन-आंदोलन में परिवर्तित हुआ।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुए इसी राष्ट्रव्यापी संघर्ष का परिणाम था कि मात्र 19 महीनों के भीतर आपातकाल समाप्त हुआ और भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों तथा संवैधानिक व्यवस्था की गौरवपूर्ण पुनर्स्थापना सुनिश्चित हो सकी।

कार्यक्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने बिहार आंदोलन, लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व और आपातकाल विरोधी संघर्ष के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार चौबे, बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग तथा खान एवं भूतत्व विभाग के मंत्री डॉ. प्रमोद कुमार सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। वक्ताओं ने आपातकाल के अनुभवों से सीख लेते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति सतत सजग रहने का आह्वान किया।-----------------

हिन्दुस्थान समाचार / धनंजय कुमार