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संघ के 100 वर्ष पर लिखी पुस्तक का विमोचन- आरएसएस ‘सिविलाइजेशनल फोर्स’, किसी सर्टिफिकेशन या वैलिडेशन की आवश्यकता नहीं

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संघ के 100 वर्ष पर लिखी पुस्तक का विमोचन- आरएसएस ‘सिविलाइजेशनल फोर्स’, किसी सर्टिफिकेशन या वैलिडेशन की आवश्यकता नहीं


नई दिल्ली, 17 जुलाई (हि.स.)। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने शुक्रवार को श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी की लिखित पुस्तक “आरएसएस @100: ए सेंचुरी ऑफ सर्विस, यूनिटी एंड सैक्रिफाइस” का विमोचन किया।

उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में सभा को संबोधित करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि आरएसएस ने भारत की सभ्यतागत विरासत, विविध परंपराओं, भाषाओं और आध्यात्मिक विचारों में गौरव की भावना को बढ़ावा देकर सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना को निरंतर प्रोत्साहित किया है। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आरएसएस एक ‘सिविलाइजेशनल फोर्स’ है, जिसे किसी सर्टिफिकेशन या वैलिडेशन की आवश्यकता नहीं है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की शताब्दी वर्षगांठ पर प्रकाशित पुस्तक के विमोचन समारोह में भाग लेना उनके लिए व्यक्तिगत सम्मान की बात है, जिसके साथ उनका लंबे समय से जुड़ाव रहा है।

संघ पर लिखी एक तमिल कविता का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह कविता संगठन की तुलना पवित्र गंगा नदी से करती है, जो निस्वार्थ भाव से दूसरों के कल्याण के लिए बहती है, और यह सेवा भावना का प्रतीक है जिसने संघ को उसकी शताब्दी यात्रा में मार्गदर्शन दिया है।

राधाकृष्णन ने आरएसएस की भावना को बखूबी दर्शाने के लिए लेखकों की सराहना करते हुए कहा कि संघ की यात्रा भारत की सांस्कृतिक जड़ों, विरासत और परंपराओं को पुनर्जीवित करने, सुदृढ़ करने और पुनर्निर्माण करने की रही है। पुस्तक के शीर्षक: “आरएसएस @100: ए सेंचुरी ऑफ सर्विस, यूनिटी एंड सैक्रिफाइस” का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इन आदर्शों ने स्वयंसेवकों की कई पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

उन्होंने कहा कि सेवा समाज के प्रति निस्वार्थ समर्पण को दर्शाती है; एकता उन बंधनों को मजबूत करती है जो भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता से परे हैं; और त्याग हमें याद दिलाता है कि स्थायी संस्थान समर्पण, दृढ़ता और निस्वार्थ प्रयासों से ही बनते हैं।

उपराष्ट्रपति ने आरएसएस द्वारा अपनी दैनिक शाखाओं के माध्यम से चरित्र निर्माण और नेतृत्व विकास पर दिए जाने वाले जोर को भी रेखांकित किया। पुस्तक से उद्धृत करते हुए उन्होंने शाखा को आत्मा की कार्यशाला बताया, जहाँ युवाओं की कच्ची ऊर्जा को राष्ट्रीय चरित्र में ढाला जाता है। उन्होंने आगे कहा कि स्वयंसेवक का सार प्रत्येक व्यक्ति को सौंपी गई जिम्मेदारी की गरिमा को समर्पण और उत्कृष्टता के साथ निभाकर उसे बढ़ाना है।

उन्होंने कहा कि शताब्दी समारोह लाखों स्वयंसेवकों के समर्पण को स्वीकार करने का अवसर है, और यह भी कहा कि संस्थाएं तभी कायम रहती हैं जब उनमें दृढ़ विश्वास, प्रतिबद्धता और आम लोगों की अपने से बड़े उद्देश्यों के लिए काम करने की इच्छाशक्ति हो।

एक स्वयंसेवक प्रधानमंत्री: मोदी युग नामक अध्याय का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह पुस्तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वयंसेवक से प्रधानमंत्री बनने तक के सफर को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने निरंतर सेवा और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत को शासन के केंद्र में रखा है, जो आरएसएस के निस्वार्थ सेवा और राष्ट्र निर्माण पर अटूट जोर को प्रतिबिंबित करता है।

इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि 100 वर्षों से राष्ट्र और समाज की सेवा में समर्पित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में अनेक मिथक फैलाए गए हैं। लेकिन सत्य यह है कि संघ की विचारधारा भेदभाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता और राष्ट्रीय एकता पर आधारित है। संघ का विचार 'सहिष्णुतावाद' से भी आगे 'सम्मानवाद' का है।

उन्होंने कहा कि संघ ने हमेशा ‘राष्ट्र प्रथम, सदैव प्रथम’ के भाव से कार्य किया है। यही कारण है कि आज आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्वयंसेवी संगठन बन चुका है।

केंद्रीय मंत्री ने कांग्रेस के एक बड़े नेता के सवाल कि ‘आरएसएस रजिस्टर्ड क्यों नहीं है’ को अनावश्यक बताया और कहा कि इनका उत्तर देना जरूरी नहीं है। संविधान प्रत्येक नागरिक को संगठन बनाने का अधिकार देता है।

उन्होंने कहा, “मैं केवल इतना कहना चाहता हूँ कि माँ के प्रेम का कोई लाइसेंस नहीं होता। गुरु के संस्कार किसी सरकारी मुहर के मोहताज नहीं होते। माँ गंगा को बहने के लिए लाइसेंस नहीं चाहिए और सूर्य को प्रकाश देने के लिए रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं होती। आरएसएस एक ‘सिविलाइजेशनल फोर्स’ है, जिसे किसी सर्टिफिकेशन या वैलिडेशन की आवश्यकता नहीं है।”

उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति का मूल्यांकन उसके धर्म से नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति उसके समर्पण से करता है। उसका विचार एकरूपता का नहीं, बल्कि एकात्मता का है। यही भावना 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' और 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के आदर्शों के साथ सामंजस्य, सद्भाव और राष्ट्रीय एकता को सशक्त बनाती है। देश के विभाजन की विभीषिका से लेकर 1962-65 के युद्ध, कश्मीर, गोवा, दादरा-नगर हवेली और 1975 के आपातकाल तक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने हर विषम परिस्थिति में राष्ट्रहित, सेवा और लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस कार्यक्रम में दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय, आरएसएस क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल, सह-लेखक श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी तथा प्रभात प्रकाशन के प्रबंध निदेशक प्रभात कुमार सहित अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनूप शर्मा